उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी
उल्हासनगर, जो कभी अपनी व्यापारिक गतिविधियों और छोटे उद्योगों के लिए जाना जाता था, अब अवैध प्लास्टिक थैलियों के निर्माण का केंद्र बनता जा रहा है। जबकि प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध होने के बावजूद, यहाँ के कई कारखाने धड़ल्ले से इनका उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन अवैध कारखानों को आखिर किसका आशीर्वाद प्राप्त है, जो ये बगैर किसी डर के अपने धंधे को फैला रहे हैं?
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह सब कुछ प्रशासनिक मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं हो सकता। जहाँ एक तरफ पर्यावरण और स्वच्छता की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर इन कारखानों को बंद करने के नाम पर मात्र दिखावे की कार्रवाई हो रही है।
कई स्थानीय नागरिक और पर्यावरण प्रेमी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब प्रशासन इस ओर ध्यान देगा और इन अवैध गतिविधियों पर लगाम कसने का असली प्रयास करेगा। क्या यह केवल प्रशासन की लापरवाही है, या फिर इसमें शामिल कुछ बड़े नाम इन अवैध कारखानों को संरक्षण दे रहे हैं?
उल्हासनगर में प्लास्टिक प्रदूषण का बढ़ता खतरा
प्लास्टिक थैलियों का उत्पादन न सिर्फ पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि यह स्थानीय जल स्रोतों को भी दूषित कर रहा है। इन थैलियों का कचरा शहर की सड़कों और नालियों में बिखरा रहता है, जिससे जल निकासी की समस्या उत्पन्न हो रही है।
सरकार ने भले ही प्लास्टिक पर बैन लगाया हो, लेकिन जब तक इन कारखानों को रोकने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए जाते, तब तक उल्हासनगर में यह समस्या यूं ही बनी रहेगी।
अब देखना यह है कि स्थानीय प्रशासन और कानून व्यवस्था कब इन अवैध कारखानों पर लगाम लगाते हैं, और जनता के हितों की रक्षा करते हैं।
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