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‘पहले कानून, फिर प्रक्रिया’—महापौर अश्विनी निकम ने 7 मनोनीत सदस्यों के चुनाव पर लगाया विराम।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में 7 मनोनीत (नामनिर्देशित) सदस्यों के चुनाव को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। महापौर अधिवक्ता अश्विनी कमलेश निकम ने मनोनीत सदस्यों के फॉर्म भरने सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया है।

महापौर द्वारा 4 सितंबर 2026 को आयुक्त/महापालिका सचिव को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि 31 अगस्त 2026 को विशेष महासभा की सूचना जारी कर 7 मनोनीत सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके तहत 7 सितंबर को नामनिर्देशन फॉर्म भरने तथा 11 सितंबर 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया था।

हालांकि, इस मामले से संबंधित न्यायालयीन संदर्भ सामने आने के बाद महापौर ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले पूरे मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट करने और शासन से आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त करने की आवश्यकता व्यक्त की है।

‘न्यायालयीन मामला लंबित, इसलिए जल्दबाजी उचित नहीं’

अपने पत्र में महापौर निकम ने उल्लेख किया है कि उन्हें 3 सितंबर को अधिवक्ता रामचंद्र मंदाडकर तथा 4 सितंबर को अधिवक्ता विनोद वी. पाटिल द्वारा संबंधित पत्रों के माध्यम से मामले की न्यायालयीन स्थिति से अवगत कराया गया है।

महापौर ने कहा कि जब मामला न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, ऐसे में चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने अथवा नहीं बढ़ाने के संबंध में शासन से स्पष्ट निर्देश प्राप्त करना आवश्यक है। इसी कारण उन्होंने 31 अगस्त को बुलाई गई विशेष महासभा के आधार पर शुरू की गई आगे की चुनाव प्रक्रिया को फिलहाल रोकने का निर्णय लिया है।

उन्होंने प्रशासन को निर्देश दिया है कि संबंधित विषय पर सक्षम स्तर से राय एवं अभिप्राय प्राप्त होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया लागू की जाए। तब तक मनोनीत सदस्यों के चुनाव से संबंधित पूरी प्रक्रिया स्थगित रहेगी।

कानून और संवैधानिक व्यवस्था को प्राथमिकता

महापौर अधिवक्ता अश्विनी कमलेश निकम के इस निर्णय को महानगरपालिका की प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों के बीच महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनके निर्णय से यह संदेश गया है कि किसी भी संवेदनशील चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले कानूनी एवं संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी है।

उनके समर्थकों का कहना है कि महापौर ने इस मामले में जल्दबाजी करने के बजाय न्यायालयीन स्थिति और शासन के मार्गदर्शन को प्राथमिकता देकर कानून की मर्यादा तथा संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान किया है।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब उल्हासनगर महानगरपालिका में मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज थी। अब शासन से मिलने वाले मार्गदर्शन और न्यायालयीन प्रक्रिया के अगले घटनाक्रम पर सभी की नजरें रहेंगी।

‘संविधान और कानून सर्वोपरि’ का संदेश

महापौर अधिवक्ता अश्विनी कमलेश निकम के इस फैसले को उनके समर्थकों द्वारा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के संविधानवादी विचारों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून की सर्वोच्चता के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, उनके समर्थकों का कहना है कि वे छत्रपति शिवाजी महाराज के न्याय, प्रशासन और जनहित के आदर्शों को भी महत्व देती हैं।

हालांकि, इस निर्णय का अंतिम प्रभाव शासन के निर्देश और न्यायालयीन प्रक्रिया के आगे के परिणाम पर निर्भर करेगा। फिलहाल उल्हासनगर महानगरपालिका के 7 मनोनीत सदस्यों के चुनाव की पूरी प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए रोक दी गई है।


















टी.ओ.के./शिंदे गुट में मनोनीत नगरसेवक पद को लेकर खींचतान, संतोष पांडे के दावे की अग्निपरीक्षा।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

मनोनीत नगरसेवक पदों के चयन को लेकर उल्हासनगर की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। भाजपा के साथ-साथ टीम ओमी कालानी (टी.ओ.के.) और शिवसेना शिंदे गुट के हिस्से में आने वाले मनोनीत नगरसेवक पद को लेकर भी राजनीतिक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। खास तौर पर कालानी परिवार के साथ लंबे समय से सक्रिय रूप से जुड़े संतोष पांडे के नाम को लेकर राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा है।

संतोष पांडे को उत्तर भारतीय समाज की आवाज के रूप में देखा जाता है और बताया जाता है कि वह पिछले करीब 17 वर्षों से कालानी परिवार और संगठन के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी वर्षों की निष्ठा, संगठन के प्रति समर्पण और राजनीतिक योगदान को इस बार मनोनीत नगरसेवक पद के रूप में सम्मान मिलेगा या फिर बदलते राजनीतिक समीकरण किसी दूसरे नाम के पक्ष में जाएंगे।

चार-चार पदों के समीकरण से बदली पूरी तस्वीर

बताया जाता है कि शुरुआत में भाजपा और शिवसेना शिंदे गुट के हिस्से में चार-चार मनोनीत नगरसेवक पद जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक गणित तैयार किया जा रहा था। लेकिन शिवसेना शिंदे गुट से जुड़े पूजा भोईर और विक्की लबाना के जाति प्रमाणपत्र से संबंधित मामले में उनके पद निरस्त होने के बाद मनोनीत नगरसेवक पदों का पूरा समीकरण बदल गया है।

इसी बदले हुए राजनीतिक गणित के बीच अब विभिन्न नामों को लेकर अंदरखाने चर्चा तेज हो गई है।

 पूर्व महापौर पंचम कालानी ओर संतोष पांडे के नाम चर्चा में?

सूत्रों के हवाले से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी सामने आ रही है कि संतोष पांडे या पूर्व महापौर पंचम कालानी सूत्रों के अनुसार मनोनीत नगरसेवक बनाने की पंचम कालानी की तैयारी रहा है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और अंतिम निर्णय सामने आना बाकी है।

यदि वास्तव में ऐसा निर्णय लिया जाता है, तो लंबे समय से संगठन के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं और कालानी समर्थक खेमे के भीतर राजनीतिक असंतोष पैदा होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। खासकर 17 वर्षों से संगठन के लिए सक्रिय रहे संतोष पांडे के समर्थक इस निर्णय को किस रूप में लेते हैं, यह भी आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होगा।

भाजपा में भी दावेदारों की लंबी कतार

दूसरी ओर भाजपा के कोटे से मनोनीत नगरसेवक पद के लिए भी कई नामों को लेकर जोरदार लॉबिंग की चर्चा है। सूत्रों के अनुसार धनंजय बोड़ारे, हेमा पिंजानी, मनु खेमचंदानी और प्रदीप रामचंदानी और प्रमुख दावेदारों में बताए जा रहे हैं।

इन प्रमुख नामों के अलावा करीब 20 भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी मनोनीत नगरसेवक पद के लिए अपनी इच्छा शीर्ष नेतृत्व के समक्ष व्यक्त की है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व के सामने भी अंतिम नाम तय करना आसान नहीं माना जा रहा है।

11 सितंबर पर टिकी सभी की निगाहें

अब इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण दिन 11 सितंबर माना जा रहा है। इसी दिन होने वाले चयन से स्पष्ट होगा कि भाजपा अपने संभावित दावेदारों में से किसे अवसर देती है और टी.ओ.के./शिवसेना शिंदे गुट संतोष पांडे की करीब 17 वर्षों की राजनीतिक निष्ठा एवं संगठनात्मक योगदान को सम्मान देता है या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते किसी अन्य नाम पर मुहर लगती है।

मनोनीत नगरसेवक पद को लेकर फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस बार निष्ठा और संगठनात्मक योगदान की जीत होगी या राजनीतिक समीकरण भारी पड़ेंगे?

11 सितंबर को होने वाला फैसला न केवल नए मनोनीत नगरसेवकों के नाम तय करेगा, बल्कि स्थानीय राजनीति में आने वाले दिनों के नए समीकरणों के संकेत भी दे सकता है।



















उल्हासनगर में CHM कॉलेज के बैंक खाते से ₹16.69 लाख की ऑनलाइन धोखाधड़ी, UPI के जरिए रकम उड़ाने का आरोप।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 स्थित मध्यवर्ती पुलिस स्टेशन में ऑनलाइन बैंकिंग और UPI के माध्यम से लाखों रुपये की कथित धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में अज्ञात आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 318(4) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(C) और 66(D) के तहत अपराध दर्ज किया गया है।

पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता डॉ. मंजू निशीकांत लालवाणी/पाठक (53) पेशे से प्रिंसिपल हैं और अंबरनाथ पूर्व के रॉयल पार्क क्षेत्र में रहती हैं। शिकायत के मुताबिक, उनके CHM कॉलेज के कैनरा बैंक स्थित करंट अकाउंट से बिना अनुमति के UPI के माध्यम से कथित तौर पर अनधिकृत लेनदेन किए गए।

ऑनलाइन बैंकिंग सुविधा शुरू नहीं होने के बावजूद खाते में सेंध

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 15 अगस्त 2025 से 13 अगस्त 2026 के बीच किसी अज्ञात व्यक्ति ने बैंक खाते से संबंधित UPI प्रणाली में अनधिकृत रूप से प्रवेश किया। बताया गया है कि संबंधित खाते में ऑनलाइन बैंकिंग अथवा UPI सुविधा शुरू नहीं की गई थी और कॉलेज के शिकायतकर्ता या किसी अधिकृत व्यक्ति ने भी इस प्रकार के लेनदेन की अनुमति नहीं दी थी।

इसके बावजूद आरोपी ने कथित तौर पर ऑनलाइन UPI के जरिए कई अनधिकृत लेनदेन किए। इन लेनदेन के दौरान शिकायतकर्ता के मोबाइल नंबर पर OTP संदेश प्राप्त होने की बात भी सामने आई है।

OTP का कथित रूप से किया गया दुरुपयोग

शिकायत के अनुसार, अज्ञात आरोपी ने शिकायतकर्ता की जानकारी और अनुमति के बिना प्राप्त OTP का कथित रूप से अनधिकृत इस्तेमाल किया। इसके माध्यम से बैंक खाते से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणीकरण प्रक्रिया का दुरुपयोग कर UPI प्रणाली के जरिए लेनदेन किए गए।

पुलिस शिकायत में दावा किया गया है कि इस कथित साइबर धोखाधड़ी के जरिए कुल ₹16,69,229 की राशि खाते से निकाल ली गई, जिससे शिकायतकर्ता को आर्थिक नुकसान हुआ।

अज्ञात आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज

मामले में आरोपी की पहचान फिलहाल सामने नहीं आई है। मध्यवर्ती पुलिस स्टेशन में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस अब कथित ऑनलाइन लेनदेन, OTP के इस्तेमाल, UPI गतिविधियों और बैंक खाते से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है।

इस मामले की जांच पुलिस निरीक्षक (अपराध) तुकाराम पाटिल, मध्यवर्ती पुलिस स्टेशन, उल्हासनगर-3 द्वारा की जा रही है। जांच के दौरान आरोपी की पहचान और कथित लेनदेन से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

















कल्याण-उल्हासनगर क्षेत्र के चर्चित बिल्डर जयराम नेहलानी के कथित अपहरण से सनसनी, पुलिस और क्राइम ब्रांच की जांच तेज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

कल्याण-उल्हासनगर क्षेत्र के चर्चित बिल्डर एवं एस्टेट एजेंट जयराम नेहलानी के कथित अपहरण की खबर सामने आने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, सोमवार सुबह करीब 10:30 बजे गोलमैदान परिसर से कुछ अज्ञात लोगों द्वारा जयराम नेहलानी को कथित तौर पर जबरन अपने साथ ले जाने की घटना सामने आई है। हालांकि, मामले की पूरी पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी।

घटना की जानकारी मिलते ही उल्हासनगर पुलिस के साथ क्राइम ब्रांच की टीमें भी सक्रिय हो गई हैं। पुलिस द्वारा घटना से जुड़े संभावित सुरागों की जांच की जा रही है तथा कथित तौर पर वारदात में इस्तेमाल किए गए सफेद और काले रंग की स्कॉर्पियो वाहनों की भी तलाश एवं ट्रेसिंग की जा रही है।

🔎 कई सवालों के बीच जांच जारी

घटना के पीछे क्या कारण है, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं हो पाया है। पुलिस विभिन्न संभावित पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच कर रही है। मामला किसी व्यक्तिगत या व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है अथवा इसके पीछे कोई अन्य कारण है, इसका खुलासा जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, जयराम नेहलानी की सुरक्षित तलाश और घटना में शामिल लोगों की पहचान को प्राथमिकता दी जा रही है। संभावित मार्गों, संदिग्ध वाहनों और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों की जांच की जा रही है।

🚔 वरिष्ठ अधिकारी मामले पर रख रहे नजर

मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी सचिन गोरे, एसीपी शंकर अवताड़े और सीनियर पीआई सुभाष आहवाड जांच की निगरानी कर रहे हैं। पुलिस की अलग-अलग टीमें संभावित ठिकानों और संदिग्ध वाहनों की जानकारी जुटाने में लगी हुई हैं।

📹 CCTV व्यवस्था को लेकर भी उठे सवाल

इस घटना ने उल्हासनगर, अंबरनाथ और बदलापुर क्षेत्र की CCTV निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। क्षेत्र के प्रमुख चौराहों और मार्गों पर CCTV कैमरे लगे होने के बावजूद कथित रूप से इस्तेमाल किए गए वाहन और उसके रूट की पहचान में कितना समय लगा तथा तकनीकी जांच में क्या सामने आया, यह पुलिस की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

क्या वाहन की नंबर प्लेट बदली गई थी, क्या आरोपियों ने CCTV से बचने के लिए कोई रणनीति अपनाई थी या फिर वाहन की पहचान में कोई तकनीकी अड़चन सामने आई—इन सभी पहलुओं की जांच किए जाने की संभावना है।

⚠️ पुलिस पुष्टि का इंतजार

फिलहाल मामले को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं, लेकिन बिना आधिकारिक पुलिस पुष्टि के किसी व्यक्ति, गिरोह या संगठन को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

पुलिस और क्राइम ब्रांच की जांच जारी है। जयराम नेहलानी की स्थिति, घटना की वास्तविक परिस्थितियां और इसमें शामिल लोगों के संबंध में आधिकारिक जानकारी जांच के बाद ही सामने आने की उम्मीद है।

दिनदहाड़े सामने आई इस कथित घटना ने शहर की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। अब सभी की नजर पुलिस जांच के अगले अपडेट और आधिकारिक बयान पर है।


















6 करोड़ के गार्डन टेंडर के बाद छोटे टेंडरों पर उठे सवाल, उल्हासनगर मनपा की टेंडर प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के PWD विभाग की ओर से कुछ दिन पहले शहर में एक बड़े गार्डन के विकास कार्य के लिए करीब 6 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया गया था। बताया जा रहा है कि यह महत्वपूर्ण टेंडर शहर की एक नामी कंपनी को मिला। इसके बाद महानगरपालिका की ओर से विभिन्न छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी कई टेंडर जारी किए गए।

इसी टेंडर प्रक्रिया को लेकर अब उल्हासनगर की जनता के बीच सवाल उठने लगे हैं। नागरिकों का कहना है कि जब संबंधित कंपनी को करीब 6 करोड़ रुपये के बड़े टेंडर में पात्र किया गया, तो बाद में जारी किए गए छोटे टेंडरों में उसे अपात्र कर टेन्डर को साठ गाँठ कर के किसी पसंदीदा कंपनी को फायदा पहुंचाया जा रहा है? आखिर छोटे टेंडरों की पात्रता और प्रक्रिया के पीछे क्या नियम और मापदंड अपनाए गए थे?

🔎 टेंडर प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता की मांग

नागरिकों का सवाल है कि क्या सभी टेंडरों में समान और पारदर्शी नियम लागू किए गए हैं? यदि किसी कंपनी को बड़े प्रोजेक्ट में काम करने का अवसर दिया गया है, तो छोटे टेंडरों में उसकी भागीदारी को लेकर अलग नियम क्यों लागू किए गए? इस पूरे मामले में टेंडर की शर्तों, पात्रता मानदंड और प्रक्रिया की निष्पक्षता को स्पष्ट किए जाने की मांग की जा रही है।

जनता के बीच यह भी चर्चा है कि कहीं इन छोटे टेंडरों की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार तो नहीं हुआ है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक मानी जा रही है।

📢 आयुक्त मनीषा आव्हाले से जनता का सीधा सवाल

उल्हासनगर की जनता अब महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग कर रही है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। जांच के दौरान संबंधित टेंडरों की शर्तों, कंपनियों की पात्रता, प्राप्त निविदाओं, तकनीकी एवं वित्तीय प्रक्रिया तथा टेंडर मंजूर करने की पूरी प्रक्रिया की जांच की जाए।

नागरिकों का कहना है कि महानगरपालिका के करोड़ों रुपये के विकास कार्यों से जुड़े टेंडरों में किसी भी प्रकार का संदेह या सवाल नहीं रहना चाहिए। यदि जांच में कोई अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों या जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

अब देखना होगा कि 6 करोड़ रुपये के गार्डन टेंडर और उसके बाद जारी किए गए छोटे टेंडरों को लेकर उठ रहे सवालों पर मनपा प्रशासन क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए जाते हैं।



















विवाह प्रमाणपत्र के लिए इलेक्शन कार्ड अनिवार्य बताए जाने पर सवाल, उल्हासनगर मनपा के CFC विभाग की प्रक्रिया पर उठी जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के CFC विभाग में विवाह प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पहुंचने वाले कुछ दंपतियों को कथित तौर पर इलेक्शन कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) लाने के लिए कहा जा रहा है। साथ ही, उन्हें कथित रूप से यह बताया जा रहा है कि आधार कार्ड स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस प्रक्रिया को लेकर अब नागरिकों के बीच कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।

नागरिकों का कहना है कि यदि विवाह प्रमाणपत्र के लिए किसी विशेष पहचान दस्तावेज को अनिवार्य किया गया है, तो उसके संबंध में स्पष्ट एवं आधिकारिक नियम, शासनादेश या विभागीय निर्देश सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

वहीं, स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि महाराष्ट्र की अन्य महानगरपालिकाओं में विवाह प्रमाणपत्र की प्रक्रिया के दौरान पहचान संबंधी दस्तावेजों को लेकर ऐसी कोई समान व्यवस्था दिखाई नहीं देती, जिसमें केवल इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य बताया जाए और आधार कार्ड को स्वीकार न किया जाए। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक नियम और वर्तमान प्रक्रिया की पुष्टि संबंधित विभाग से किया जाना आवश्यक है।

नागरिकों ने उठाए सवाल

यदि CFC विभाग में वास्तव में इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य किया गया है, तो नागरिकों का सवाल है कि

इसका आधार क्या है?

क्या इसके संबंध में कोई आधिकारिक शासनादेश या मनपा का लिखित आदेश जारी किया गया है?

आधार कार्ड को स्वीकार नहीं करने का कारण क्या है?

क्या सभी नागरिकों को इस संबंध में समान और स्पष्ट जानकारी दी जा रही है?

इन सवालों के कारण नागरिकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

आयुक्त से निष्पक्ष जांच की मांग

नागरिकों ने उल्हासनगर महानगरपालिका की आयुक्त मनीषा आव्हाले से इस मामले को गंभीरता से लेते हुए CFC विभाग की विवाह प्रमाणपत्र संबंधी प्रक्रिया की जांच कराने की मांग की है।

साथ ही, यदि इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य करने का कोई आधिकारिक नियम या आदेश मौजूद है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए और नागरिकों को स्पष्ट जानकारी दी जाए। वहीं, यदि ऐसी कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है, तो कथित रूप से अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की प्रक्रिया पर भी आवश्यक कार्रवाई की जाए।

फिलहाल, यह मामला नागरिकों द्वारा उठाई गई शिकायत और आरोपों पर आधारित है। संबंधित विभाग या महानगरपालिका प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

















उल्हासनगर में नशे के नेटवर्क को लेकर चिंता, बैंकॉक-थाईलैंड कनेक्शन की चर्चाओं से बढ़ी सतर्कता।

(फाइल इमेज) 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में युवाओं और बच्चों को नशे से दूर रखने को लेकर चिंता के बीच बैंकॉक और थाईलैंड से नशीले पदार्थों की कथित तस्करी को लेकर चर्चाएं सामने आ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, उल्हासनगर से जुड़े कुछ लोग कथित तौर पर कैरियर के रूप में विदेश यात्रा कर रहे हैं और उनके जरिए गांजा या अन्य प्रतिबंधित नशीले पदार्थ भारत लाए जाने की आशंका जताई जा रही है।

सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) की नजर कुछ संदिग्ध गतिविधियों और संभावित कैरियर्स पर हो सकती है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।

बच्चों और युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता

नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक विषय भी है। यदि किसी संगठित नेटवर्क के जरिए नशीले पदार्थ शहर तक पहुंच रहे हैं, तो संबंधित एजेंसियों द्वारा इसकी गहन जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई बेहद जरूरी है।

क्या जांच एजेंसियां करेंगी कार्रवाई?

सूत्रों के अनुसार, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय यात्राओं, संपर्कों और कथित कैरियर नेटवर्क की जांच की आवश्यकता है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, बैंकॉक-थाईलैंड से कथित तौर पर गांजा व अन्य नशीले पदार्थ लाने वाले कई कैरियर्स गिरफ्तार किए गए हैं। कुछ आरोपी देश की अलग-अलग जेलों में बंद बताए जा रहे हैं। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

हालांकि, फिलहाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जब तक जांच एजेंसियों की ओर से आधिकारिक पुष्टि या कानूनी कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इन दावों को केवल सूत्रों पर आधारित जानकारी और जांच का विषय माना जाना चाहिए।

उल्हासनगर के नागरिकों की मांग है कि यदि शहर में नशीले पदार्थों की तस्करी का कोई नेटवर्क सक्रिय है, तो संबंधित केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियां इसकी निष्पक्ष जांच कर युवाओं को नशे के खतरे से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।




















 

उल्हासनगर मनपा के PWD में पदोन्नति को लेकर विवाद, संदीप जाधव पर लगे मिलीभगत के आरोप।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के PWD विभाग में अधिकारियों की पदोन्नति और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विभाग में कार्यरत उप अभियंता संदीप जाधव पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने मनपा से जुड़े एक कथित दलाल के साथ मिलीभगत कर श्रीमती रमाबाई नारायण पाटिल (विवाह के बाद: मनाली मनील भोईर) को आगे कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) के पद पर नियुक्त अथवा पदोन्नत कराने के लिए कथित रूप से प्रयास किए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्रीमती रमाबाई नारायण पाटिल इ.मा.व. यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी से संबंधित हैं और उनका क्षेत्र कोंकण-2 बताया गया है। उन्हें महाराष्ट्र सरकार की ओर से उप अभियंता (सिविल/स्थापत्य) के रिक्त पद पर नियुक्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब इसी नियुक्ति के बाद उन्हें कार्यकारी अभियंता के पद तक पहुंचाने के लिए कथित रूप से कुछ अधिकारियों और मनपा से जुड़े लोगों द्वारा प्रयास किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

🔴 पदोन्नति प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति उप अभियंता पद पर हुई है, तो उसे कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नत करने के लिए नियम, पात्रता, वरिष्ठता, विभागीय प्रक्रिया और शासन के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है या नहीं।

आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में संदीप जाधव की कथित भूमिका महत्वपूर्ण है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में संबंधित नियुक्ति एवं पदोन्नति से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच आवश्यक मानी जा रही है।

🔎 ACB जांच को लेकर भी सवाल

संदीप जाधव को लेकर यह भी आरोप सामने आया है कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से संबंधित जांच पहले से चल रही है। यदि यह जानकारी आधिकारिक दस्तावेजों से सत्यापित होती है, तो ऐसी स्थिति में उनके प्रशासनिक निर्णयों और पदोन्नति प्रक्रिया में कथित भूमिका की भी निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग उठ रही है।

💰 PWD में कथित बोगस बिलों का मामला

इसके अलावा, PWD विभाग में संदीप जाधव के कार्यकाल को लेकर कथित बोगस बिलों के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे बिल तैयार किए गए, जिनकी जांच किए जाने की आवश्यकता है।

यह भी आरोप है कि संदीप जाधव पिछले करीब 20 वर्षों से PWD विभाग में कार्यरत हैं और इस दौरान शंकर नामक व्यक्ति के साथ मिलकर कथित रूप से कई अनियमितताएं की गईं।

हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, बिलों, टेंडर दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही हो सकती है।

📌 उच्चस्तरीय जांच की मांग

मामले को लेकर मांग की जा रही है कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और महाराष्ट्र सरकार द्वारा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। विशेष रूप से—

उप अभियंता से कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नति की प्रक्रिया की जांच हो।

संबंधित अधिकारी की पात्रता और वरिष्ठता की जांच की जाए।

नियुक्ति एवं पदोन्नति से संबंधित शासनादेश और विभागीय रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं।

PWD विभाग के पिछले वर्षों के कथित बोगस बिलों का विशेष ऑडिट कराया जाए।

संबंधित ठेकेदारों एवं मध्यस्थों की भूमिका की जांच की जाए।

यदि ACB जांच वास्तव में लंबित है, तो उसकी वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जाए।

उल्हासनगर महानगरपालिका की आयुक्त मनीषा आव्हाले से उल्हासनगर की जनता की विनम्र अपील है कि संदीप जाधव को उप अभियंता अथवा कार्यकारी अभियंता का पद न दिया जाए, बल्कि उन्हें केवल कनिष्ठ अभियंता (Junior Engineer) के पद पर ही नियुक्त/तैनात किया जाए।

अब देखना यह होगा कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और महाराष्ट्र सरकार इन गंभीर आरोपों को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाई जाती है।

नोट: उपरोक्त रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। संबंधित अधिकारियों/व्यक्तियों का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।




















उल्हासनगर में 1 जनवरी 2006 के बाद बने निर्माणों की वैधता पर बड़ा सवाल! RTI के जवाब ने बढ़ाई जांच की मांग।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में अवैध निर्माणों का मुद्दा एक बार फिर गंभीर चर्चा में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की PIL क्रमांक 105/2003 से जुड़े निर्देशों और हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि 1 जनवरी 2006 के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में मंजूर किए गए निर्माणों, प्लान, CC और OC की वैधता का रिकॉर्ड किस स्तर पर उपलब्ध है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात नगर रचना विभाग ने RTI के जवाब में कही है। यह जवाब श्री अर्जुनसिंग आहूजा द्वारा 17 मार्च 2026 को दायर किए गए RTI आवेदन के संदर्भ में 30 अप्रैल 2026 को जारी किया गया।

RTI जवाब में क्या कहा गया?

उल्हासनगर महानगरपालिका के नगर रचना विभाग की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं (Legal Structures) से संबंधित जानकारी इस विभाग में उपलब्ध नहीं है।

यह जवाब ऐसे समय सामने आया है जब शहर में पुराने और नए निर्माणों की वैधता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

PIL 105/2003 का संदर्भ

उल्हासनगर के निर्माणों से संबंधित न्यायिक मामलों के संदर्भ में PIL No. 105/2003 का उल्लेख किया जाता रहा है। इस मामले में 2005 से पहले के निर्माणों के नियमितीकरण और उसके बाद अवैध निर्माणों पर नियंत्रण से जुड़े निर्देशों का संदर्भ सामने आता है।

इसी पृष्ठभूमि में अब यह सवाल उठ रहा है कि 1 जनवरी 2006 के बाद शहर में हुए निर्माणों की निगरानी, मंजूर प्लान, Commencement Certificate (CC) और Occupation Certificate (OC) का रिकॉर्ड किस प्रकार संधारित किया गया है।

क्या सभी मंजूर निर्माणों की जांच होनी चाहिए?

RTI के जवाब के बाद अब एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है—यदि नगर रचना विभाग के पास 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र की कानूनी संरचनाओं से संबंधित समेकित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो क्या इस अवधि में मंजूर किए गए सभी प्रमुख भवन प्लान, CC और OC की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए?

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध RTI पत्र और उसमें दर्ज जानकारी पर आधारित है। किसी व्यक्ति, अधिकारी, बिल्डर या संस्था पर अवैध निर्माण अथवा न्यायालय के आदेश की अवमानना का आरोप तथ्यात्मक जांच और सक्षम न्यायिक/प्रशासनिक निष्कर्ष के बिना अंतिम रूप से नहीं माना जाना चाहिए।






















मल्हार वॉटरफ्रंट पर निर्माण व दस्तावेजों को लेकर सवाल, जांच की मांग; प्लॉट 63, सेक्शन 4/A और CTS 9113 से जुड़ी जानकारी पर खरीदारों को सतर्क रहने की अपील।

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 क्षेत्र में उल्हासनगर महानगरपालिका के समीप स्थित ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ नामक इमारत से संबंधित दस्तावेजों और निर्माण प्रक्रिया को लेकर कुछ गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इमारत प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A, शीट नंबर 51 तथा सी.टी.एस. नंबर 9113 से संबंधित बताई जा रही है। इमारत के लिए नक्शा/खाका क्रमांक UMC/BP/46/24/148 का उल्लेख किया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित संपत्ति के दस्तावेजों में कथित तौर पर वायलेशन अथवा नियमों से संबंधित विसंगतियां होने की बात सामने आई है। साथ ही, निर्माण कार्य से जुड़ी कुछ कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह संपत्ति विकास योजना (Development Plan—DP) के प्रावधानों से प्रभावित होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, स्वीकृत भवन योजना, विकास अनुमति, निर्माण अनुमति, ऑक्युपेंसी/कम्प्लीशन संबंधी दस्तावेज तथा अन्य आवश्यक मंजूरियों की सक्षम प्राधिकरण से जांच किया जाना जरूरी है।

टाउन प्लानिंग विभाग के रिकॉर्ड की जांच अहम

सूत्रों के अनुसार, उल्हासनगर महानगरपालिका के टाउन प्लानिंग विभाग से संबंधित रिकॉर्ड में इस संपत्ति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो सकती है। यदि किसी प्रकार का निर्माण या दस्तावेजी उल्लंघन पाया जाता है, तो उसकी वास्तविक स्थिति केवल सक्षम प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है।

‘मंत्रालय टाइम्स’ को यह भी जानकारी मिली है कि उल्हासनगर शहर में ऐसी कई अन्य इमारतों और संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनके संबंध में Development Plan के प्रावधानों, स्वीकृत योजनाओं अथवा निर्माण अनुमति की स्थिति की जांच आवश्यक हो सकती है।

आगे भी सामने आएगी जानकारी

‘मंत्रालय टाइम्स’ द्वारा उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल के आधार पर ऐसी संपत्तियों से जुड़ी जानकारी एक-एक कर सार्वजनिक करने का प्रयास किया जाएगा। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, बिल्डर या संस्था पर बिना आधिकारिक प्रमाण के आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित में दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की स्थिति को सामने लाना है।

फ्लैट खरीदारों के लिए जरूरी सावधानी

‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ अथवा किसी भी अन्य निर्माण परियोजना में फ्लैट खरीदने से पहले संभावित खरीदारों को केवल विज्ञापन या मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहते हुए संबंधित स्वीकृत प्लान, बिल्डिंग परमिशन, भूमि रिकॉर्ड, DP स्थिति, RERA संबंधी जानकारी (जहां लागू हो), कंप्लीशन/ऑक्युपेंसी दस्तावेज और अन्य वैधानिक मंजूरियों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।

महत्वपूर्ण: इस समाचार में उल्लेखित वायलेशन, अनियमितता और DP से प्रभावित होने संबंधी बातें उपलब्ध जानकारी/सूत्रों पर आधारित आरोप या दावे हैं। अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और आदेश से ही स्पष्ट होगी। संबंधित पक्ष का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

















शाम 6 बजे के बाद उल्हासनगर मनपा में गतिविधियों को लेकर उठे सवाल, एंटी चैंबर के इस्तेमाल की जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद भी कुछ गतिविधियां जारी रहने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर के एक एंटी चैंबर में एक प्रभावशाली नेता की कथित मौजूदगी रहती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

महानगरपालिका से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कार्यालयीन समय के बाद भी कुछ लोगों की आवाजाही बनी रहती है। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान कथित तौर पर बड़े ठेकेदारों, बिल्डरों और शहर के कुछ व्यापारियों से संबंधित कार्यों को लेकर मुलाकातें और चर्चाएं होती हैं।

इन दावों के सामने आने के बाद सवाल यह उठ रहा है कि यदि महानगरपालिका का नियमित कामकाज शाम 6 बजे समाप्त हो जाता है, तो उसके बाद परिसर में किन लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है और किन अधिकारियों अथवा जनप्रतिनिधियों से उनकी मुलाकात होती है।

जनता ने आयुक्त से की जांच की मांग

उल्हासनगर की जनता ने महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद सभी चैंबर और एंटी चैंबर को नियमानुसार लॉक किया जाए तथा अनधिकृत प्रवेश और बैठकों पर रोक सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही महानगरपालिका परिसर की CCTV फुटेज की जांच किए जाने की मांग भी उठ रही है। जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर में कौन-कौन लोग मौजूद रहे, किस समय प्रवेश और निकास हुआ तथा किन लोगों से मुलाकात हुई।

आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी

यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के बजाय महानगरपालिका की प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यालयीन व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। यदि लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं, तो CCTV फुटेज और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि जिस नेता के संबंध में आरोप लगाए जा रहे हैं, वह कौन है। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम बिना आधिकारिक पुष्टि के सामने रखना उचित नहीं होगा। मामले में महानगरपालिका प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

अब सवाल यही है—क्या उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन शाम 6 बजे के बाद की गतिविधियों की CCTV और प्रवेश रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष जांच करेगा?


















उल्हासनगर मनपा में ऑनलाइन टेंडरिंग को लेकर सवाल, छोटे ठेकेदारों के हितों और पारदर्शिता पर उठी चिंता।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में निविदा प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। मनपा आयुक्त मनीषा आव्हाले की ओर से ऑनलाइन टेंडरिंग प्रक्रिया के संबंध में पत्र जारी किए जाने के बाद ठेकेदारों और प्रशासनिक स्तर पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

ऑनलाइन टेंडरिंग को पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। हालांकि, कुछ छोटे ठेकेदारों की ओर से यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि नई प्रक्रिया में तकनीकी और आर्थिक शर्तों के कारण उनके लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में छोटे और स्थानीय ठेकेदारों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट नियम और समान अवसर सुनिश्चित करने की मांग उठ रही है।

मैनुअल टेंडरिंग के बाद अब ऑनलाइन प्रक्रिया पर नजर

मनपा में पूर्व में अपनाई जाने वाली मैनुअल टेंडरिंग प्रक्रिया को लेकर भी समय-समय पर अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अब ऑनलाइन प्रणाली लागू होने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि नई व्यवस्था वास्तव में सभी योग्य ठेकेदारों को समान अवसर देती है या नहीं।

ठेकेदारों से जुड़े कुछ वर्गों का कहना है कि ऑनलाइन प्रक्रिया में तकनीकी पात्रता, दस्तावेजी शर्तों, टेंडर की जानकारी और समयसीमा जैसी सभी व्यवस्थाएं स्पष्ट एवं समान होनी चाहिए, ताकि किसी विशेष समूह या चुनिंदा ठेकेदारों को अनुचित लाभ मिलने की संभावना न रहे।

चुनिंदा ठेकेदारों को काम मिलने के आरोप

उल्हासनगर मनपा में कुछ ठेकेदारों को बार-बार काम मिलने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पूरी निविदा प्रक्रिया, पात्रता मानदंड, तकनीकी मूल्यांकन और वर्क ऑर्डर जारी करने की प्रक्रिया को सार्वजनिक एवं पारदर्शी रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या पक्षपात हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग भी सामने आ सकती है।

PWD विभाग की भूमिका पर भी चर्चा

पूरे मामले के बीच मनपा के PWD विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी और एक महिला कर्मचारी की भूमिका को लेकर चर्चाएं सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि, किसी भी कर्मचारी के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों की फिलहाल आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और बिना ठोस दस्तावेज या जांच के किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

ऑनलाइन टेंडरिंग की असली परीक्षा पारदर्शिता

जानकारों के अनुसार, ऑनलाइन टेंडरिंग का उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धात्मक और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना है। इसलिए यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि सभी योग्य ठेकेदारों को समान अवसर मिले, टेंडर की शर्तें स्पष्ट हों और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड के आधार पर संचालित की जाए।

अब सवाल यह है कि क्या उल्हासनगर महानगरपालिका की नई ऑनलाइन टेंडरिंग व्यवस्था छोटे ठेकेदारों को भी समान अवसर देगी और क्या इससे निविदा प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित होगी?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब आने वाले दिनों में निविदाओं की प्रक्रिया और प्रशासन की ओर से जारी होने वाली जानकारी से ही सामने आएगा।
















12 करोड़ के उल्हासनगर मनपा विकास कार्यों को लेकर विवाद गहराया कथित फर्जी बिलों की जांच और संबंधित भुगतान तत्काल रोकने की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में करीब 12 करोड़ रुपये के विकास कार्यों से संबंधित निविदाओं और कथित बिल भुगतान को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। बताया जा रहा है कि ये कार्य ठाणे जिला प्रशासन तथा मूलभूत सुविधाओं से संबंधित योजनाओं के अंतर्गत महानगरपालिका क्षेत्र में प्रस्तावित किए गए थे। इन कार्यों में से कई कार्य चुनाव से पहले के बताए जा रहे हैं। हालांकि, संबंधित कार्य वास्तव में किस स्तर तक पूरे हुए हैं और उनके नाम पर तैयार किए गए बिल वास्तविक कार्यों के अनुरूप हैं या नहीं, इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इस मामले में स्थानीय स्तर पर कथित तौर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ विकास कार्य मौके पर हुए बिना ही कागजों पर पूर्ण दिखाए गए और उनके आधार पर बिल तैयार किए गए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है। इसी कारण पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

भुगतान रोककर जांच कराने की मांग

उल्हासनगर की जनता की ओर से मांग उठाई जा रही है कि करीब 12 करोड़ रुपये के इन सभी विकास कार्यों की तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर विस्तृत जांच कराई जाए। प्रत्येक कार्य की मौके पर जाकर जांच की जाए तथा कार्य की वास्तविक स्थिति, माप पुस्तिका, कार्यादेश, ठेकेदारों के बिल और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों का मिलान किया जाए।

मांग की गई है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित कार्यों के लंबित बिलों का भुगतान रोक दिया जाए। साथ ही, यदि किसी कार्य में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

पीडब्ल्यूडी विभाग की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में उल्हासनगर महानगरपालिका के पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ आरोपों में विभाग के उपअभियंता संदीप जाधव की भूमिका की जांच किए जाने की मांग की गई है। उनके संबंध में कथित फर्जी बिल तैयार करने तथा ठेकेदारों से कथित रूप से आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं।

हालांकि, ये गंभीर आरोप फिलहाल आरोपों के स्तर पर हैं और उनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारी या अन्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजी एवं स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

‘मास्टरमाइंड’ होने के दावे की भी जांच जरूरी

कथित फर्जी बिलों के मामले में ‘शंकर'’ नामक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होने और उसे कथित तौर पर पूरे मामले का ‘मास्टरमाइंड’ बताए जाने की चर्चा भी सामने आई है। लेकिन इस दावे की भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों द्वारा संबंधित दस्तावेजों, बिल प्रक्रिया, स्वीकृतियों, माप पुस्तिकाओं, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों व ठेकेदारों की भूमिका की जांच करना महत्वपूर्ण होगा।

आयुक्त से उच्चस्तरीय जांच की मांग

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उल्हासनगर महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाळे से मांग की गई है कि पूरे मामले की तत्काल निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही, जांच पूरी होने तक विवादित अथवा संदिग्ध बिलों का भुगतान रोकने, प्रत्येक कार्य का स्थल निरीक्षण कराने और दोष सिद्ध होने पर संबंधितों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि महानगरपालिका प्रशासन इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है और क्या 12 करोड़ रुपये के कथित विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति तथा बिलों की सत्यता की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।

नोट: इस खबर में लगाए गए आरोप संबंधित शिकायत/दावों पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि का दावा नहीं किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों का पक्ष जांच के दौरान सामने आना आवश्यक है।


















उल्हासनगर-4 में बच्चों की पुरानी दफनभूमि की जमीन पर कथित कब्जे की कोशिश नाकाम, शिकायत के बाद प्रशासन हरकत में।


 







उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-4 स्थित मुक्तिधाम श्मशानभूमि के सामने पुराने हिंदू बच्चों की दफनभूमि से जुड़ी जमीन को लेकर कथित कब्जे की कोशिश का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर उठे इस मुद्दे के बाद जमीन की स्थिति और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि उक्त जमीन को लेकर विवाद के दौरान वहां स्थित काल भैरव मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने/तोड़ने की बात भी सामने आई थी। इस घटनाक्रम को लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी जताई गई और जमीन के संरक्षण तथा वास्तविक मालिकाना हक की जांच की मांग उठी।

इस मामले में राजेश नागदेव द्वारा की गई शिकायत के बाद संबंधित प्रशासनिक स्तर पर मामले को गंभीरता से लिए जाने की बात सामने आई है। शिकायत में जमीन के रिकॉर्ड, उपयोग, सीमांकन तथा कथित कब्जे के प्रयास से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

स्थानीय स्तर पर इस मामले को उठाने में राजेश नागदेव, अर्जुन सिंह आहूजा और निर्मल मखीजा की सक्रियता का भी उल्लेख किया जा रहा है। उनके प्रयासों के चलते संबंधित जमीन को कथित रूप से कब्जे में जाने से बचाने में सफलता मिलने का दावा किया गया है।

इस जमीन पर अब उल्हासनगर महानगरपालिका का बोर्ड लगा दिया गया है और मनपा ने जमीन को अपने आधिकारिक कब्जे में ले लिया है।















उल्हासनगर मनपा में ACB कार्रवाई के बावजूद महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती का मामला गरमाया,उपमुखमंत्री एकनाथ शिंदे ने दिए जांच के निर्देश।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की कार्रवाई में पकड़े गए अधिकारी-कर्मचारियों को कथित तौर पर महत्वपूर्ण एवं प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने का मामला अब उच्च स्तर तक पहुंच गया है। इस मामले को लेकर आंदोलन कर रहे राष्ट्रीय कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी, छावा संगठन के निखिल गोळे तथा समाजसेवी प्रकाश तलरेजा ने संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों को प्रभारी पदों से हटाने की मांग को लेकर 15 अगस्त 2026 से ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर आमरण अनशन शुरू करने की घोषणा की थी।

उपमुख्यमंत्री ने लिया मामले का संज्ञान

आंदोलनकारियों की शिकायत और मांगों का संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ठाणे जिलाधिकारी को लिखित निर्देश जारी किए हैं। निर्देश में मामले की गंभीरता से जांच करने तथा जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने को कहा गया है।

उपमुख्यमंत्री ने आंदोलनकारियों से अपना प्रस्तावित अनशन समाप्त करने का भी अनुरोध किया है। वहीं, ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से आंदोलनकारियों को आगे की कार्रवाई से अवगत कराने के लिए अगले सप्ताह पुनः बुलाए जाने की जानकारी सामने आई है।

एक महीने से चल रहा था आंदोलन

बताया गया है कि उल्हासनगर महानगरपालिका में पिछले कई वर्षों के दौरान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा कार्रवाई कर पकड़े गए कुछ अधिकारी-कर्मचारियों को बाद में महत्वपूर्ण पदों और प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने का आरोप लगाया गया है।

इन अधिकारियों-कर्मचारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटाने की मांग को लेकर पिछले करीब एक महीने से आंदोलन चल रहा था। राष्ट्रीय कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी और छावा संगठन के निखिल गोळे के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन के माध्यम से संबंधित प्रशासन से कार्रवाई की मांग की जा रही थी।

गणेश शिंपी सहित कई नाम चर्चा में

मामले में जिन अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, उनमें गणेश शिंपी का नाम प्रमुख रूप से बताया गया है। शिंपी पूर्व में लघुलेखक वर्ग-3 के पद पर कार्यरत थे और वर्तमान में उपआयुक्त (प्रभाग समिति क्रमांक-2), कर निर्धारक एवं संकलक, कर विभाग तथा चुनाव विभाग प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों का कार्यभार संभाल रहे हैं, ऐसा आरोप लगाया गया है।

इसके अलावा अजीत गोवारी (वरिष्ठ लिपिक), संजय पवार (कनिष्ठ अभियंता, नगररचना विभाग), अनिल खतुराणी (वरिष्ठ लिपिक, कर विभाग), अंकुश कदम (लिपिक, भंडार विभाग), राजा बुलानी (लिपिक, विधि विभाग), छाया डगळे (लिपिक, विधि विभाग), भानु परमार (लिपिक, कर विभाग), संजय पवार (लिपिक), बलराम गिधवा (लिपिक) और जगदीश परमार (लिपिक) सहित कुल 23 कर्मचारियों के ACB कार्रवाई में पकड़े जाने का उल्लेख किया गया है।

विभागीय और न्यायालयीन जांच का भी उल्लेख

आंदोलनकारियों का दावा है कि संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों में से कुछ के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, जबकि कुछ मामलों में न्यायालयीन प्रक्रिया भी जारी है। ऐसे में उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

अब उपमुख्यमंत्री के निर्देश के बाद ठाणे जिलाधिकारी स्तर पर इस पूरे मामले की जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ गई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका और वर्तमान पदों पर उनकी नियुक्ति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

उधर, जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा अगले सप्ताह आंदोलनकारियों को आगे की कार्रवाई की जानकारी देने के लिए बुलाए जाने के बाद अब सभी की निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है और उन्हें उनके वर्तमान प्रभारी पदों से हटाया जाता है या नहीं।



















‘जनप्रतिनिधि का कार्यालय या रिश्तेदारों का अड्डा?’ 2016 में ही उठे थे सवाल, अरजुन सिंह आहूजा की शिकायत पर उल्हासनगर मनपा ने कार्रवाई का दिया था आश्वासन।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में जनप्रतिनिधियों के लिए निर्धारित कार्यालयों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा कोई नया नहीं है। उपलब्ध पुराने पत्राचार के अनुसार, करीब एक दशक पहले वर्ष 2016 में ही इस संबंध में मनपा प्रशासन के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए सवाल उठाए गए थे कि क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों का इस्तेमाल उनके रिश्तेदारों द्वारा किया जा सकता है?

इस मामले को लेकर अरजुन सिंह आहूजा ने 6 सितंबर 2016 को उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त से मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की थी। इसके अगले दिन, 7 सितंबर 2016 को ई-मेल के माध्यम से लिखित शिकायत/निवेदन भी भेजा गया था। उपलब्ध ई-मेल रिकॉर्ड में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल और उनके रिश्तेदारों की कथित भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे।

महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों को लेकर विशेष आपत्ति

7 सितंबर 2016 को भेजे गए ई-मेल में विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ मामलों में महिला जनप्रतिनिधियों के पति अथवा भाई उनके कार्यालयों में बैठकर कार्यालय का उपयोग करते हैं।

शिकायतकर्ता ने प्रशासन से मांग की थी कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम और व्यवस्था तय की जाए, ताकि पद एवं कार्यालय के संभावित दुरुपयोग को रोका जा सके।

कार्यालय में अतिरिक्त कुर्सियों पर भी उठाया गया सवाल

शिकायत में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों में रखी जाने वाली अतिरिक्त कुर्सियों का मुद्दा भी उठाया गया था। ई-मेल में उल्लेख किया गया था कि कुछ कार्यालयों में मुख्य टेबल के आजु- बाजू दो अतिरिक्त कुर्सियां रखी जाती हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या इन कुर्सियों का इस्तेमाल जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों के बैठने के लिए किया जाता है।

आहूजा ने मांग की थी कि संबंधित जनप्रतिनिधि अथवा अध्यक्ष के कार्यालय में उपस्थित होने पर ही कार्यालय खोला जाए। साथ ही, जनप्रतिनिधि की कुर्सी के आसपास रखी गई अतिरिक्त कुर्सियों को हटाने की व्यवस्था की जाए, ताकि कार्यालय का इस्तेमाल केवल अधिकृत व्यक्ति द्वारा ही किया जा सके।

मीरा-भायंदर मनपा की व्यवस्था का उदाहरण

शिकायत में मीरा-भायंदर महानगरपालिका की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया था। ई-मेल में प्रशासन से आग्रह किया गया था कि वहां लागू व्यवस्था की पुष्टि की जाए और यदि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट नियम या प्रक्रिया लागू है, तो उसका अध्ययन कर उल्हासनगर महानगरपालिका में भी उचित व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जाए।

तत्कालीन आयुक्त कार्यालय ने दिया था जवाब

उपलब्ध पत्राचार के अनुसार, शिकायत के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त कार्यालय के स्वीय सहायक की ओर से शिकायतकर्ता को ई-मेल के माध्यम से जवाब दिया गया था।

जवाब में शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए बताया गया था कि माननीय आयुक्त के निर्देशानुसार मामले को उचित कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग को भेजा जाएगा।

इस प्रकार, वर्ष 2016 में उठाए गए इस मुद्दे पर मनपा प्रशासन की ओर से शिकायत को संबंधित विभाग तक भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आती है।

करीब एक दशक बाद फिर चर्चा में आया पुराना पत्राचार

अब करीब दस वर्ष पुराने इस पत्राचार के सामने आने से यह सवाल फिर चर्चा में है कि उस समय उठाई गई शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई हुई थी? क्या संबंधित विभाग ने मामले की जांच की थी? क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई नियम या दिशा-निर्देश जारी किए गए थे? और यदि कार्रवाई हुई थी, तो उसका रिकॉर्ड क्या है?

उपलब्ध ई-मेल और पत्राचार में शिकायत को संबंधित विभाग के पास भेजने की बात तो स्पष्ट रूप से सामने आती है, लेकिन आगे की जांच, कार्रवाई के निष्कर्ष या किसी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि के खिलाफ की गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।

इसलिए वर्ष 2016 में लगाए गए आरोपों को उस समय की शिकायत के रूप में ही देखा जाना चाहिए और उनके तथ्यात्मक सत्यापन के लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड तथा तत्कालीन विभागीय कार्रवाई की जानकारी सामने आना आवश्यक है।

सवाल वही, जवाब आज भी जरूरी

करीब एक दशक पुराने इस पत्राचार से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित दुरुपयोग और रिश्तेदारों द्वारा कार्यालय के इस्तेमाल का सवाल वर्ष 2016 में ही उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन के सामने उठाया जा चुका था।

उस समय शिकायत पर कार्रवाई के लिए मामला संबंधित विभाग को भेजने का आश्वासन दिया गया था। ऐसे में अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उस शिकायत का अंतिम नतीजा क्या निकला और क्या उस समय उठाए गए सवालों के आधार पर कोई स्थायी व्यवस्था लागू की गई थी?

जनप्रतिनिधि का कार्यालय आखिर जनसेवा के लिए है या उनके रिश्तेदारों के इस्तेमाल के लिए? वर्ष 2016 के इस पुराने पत्राचार ने इस सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है।


















उल्हासनगर में फ्लैट सौदे में ₹35.50 लाख की कथित धोखाधड़ी, जमीन मालिक-डेवलपर समेत 4 के खिलाफ FIR दर्ज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में अधूरे प्रोजेक्ट के नाम पर फ्लैट खरीदने के सौदे में कथित आर्थिक धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता अनिल सीतलदास मंगतानी की शिकायत के आधार पर FIR क्रमांक 382/2026 उल्हासनगर-1 पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है। शिकायत में जमीन मालिक, डेवलपर और दो एजेंटों पर आपसी मिलीभगत कर कथित रूप से ₹35.50 लाख की आर्थिक धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया है।

शिकायत के अनुसार, वर्ष 2023 में अनिल मंगतानी ने अपने मित्र एवं रियल एस्टेट ब्रोकर मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी के माध्यम से उल्हासनगर-2 स्थित ‘सेवन हेवन’ अपार्टमेंट में फ्लैट खरीदने की जानकारी प्राप्त की। इसके बाद जमीन मालिक रजनी अर्जुनदास रामसिंधानी और उनके कथित डेवलपर मनोज कुल्लूमल पंजवानी से संपर्क हुआ।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, सेवन हेवन की तीसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 301, करीब 1100 वर्ग फुट क्षेत्रफल के फ्लैट का सौदा ₹37.50 लाख में तय हुआ। सौदे के तहत शिकायतकर्ता का मौजूदा 780 वर्ग फुट का फ्लैट ₹17.50 लाख में देने तथा शेष ₹20 लाख का भुगतान करने की बात तय हुई।

शिकायत में बताया गया है कि 19 अगस्त 2023 को ₹50,000, इसके बाद 21 अगस्त 2023 को ₹5.50 लाख और 1 नवंबर 2023 को कुल ₹10 लाख विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से रजनी रामसिंधानी को भुगतान किए गए। इस प्रकार फ्लैट सौदे के लिए कुल ₹16 लाख की बैंकिंग लेनदेन का उल्लेख शिकायत में किया गया है। इसके अलावा, शिकायतकर्ता के पुराने फ्लैट के बदले ₹17.50 लाख का सौदा भी किया गया था।

रजिस्ट्रेशन के बाद भी नहीं मिला कब्जा

शिकायत के अनुसार, 7 नवंबर 2023 को शिकायतकर्ता, उनकी पत्नी और बेटे के नाम पर सेवन हेवन के फ्लैट नंबर 301 का पंजीकरण कराया गया। रजिस्ट्रेशन के समय कथित तौर पर 15 महीने के भीतर फ्लैट का कब्जा देने का आश्वासन दिया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि तय अवधि बीतने के बावजूद इमारत का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ और उन्हें फ्लैट का कब्जा भी नहीं मिला।

जब शिकायतकर्ता ने बार-बार फ्लैट के बारे में जानकारी मांगी, तो कथित तौर पर उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि उनका पैसा डेवलपर मनोज पंजवानी को दिया जा चुका है और उनसे संपर्क किया जाए।

दो एजेंटों को ब्रोकरेज देने का भी आरोप

शिकायत में मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी और सुनील चुन्नीलाल लालवानी पर भी ब्रोकरेज के नाम पर ₹1-1 लाख लेने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, थावरानी को ₹1 लाख Google Pay के माध्यम से तथा सुनील लालवानी को ₹1 लाख नकद दिए गए।

चार लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत

अनिल मंगतानी ने अपनी शिकायत में रजनी अर्जुनदास रामसिंधानी, मनोज कुल्लूमल पंजवानी, मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी और सुनील चुन्नीलाल लालवानी को नामजद किया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि चारों ने कथित रूप से आपसी मिलीभगत कर उनका विश्वास हासिल किया और फ्लैट सौदे के नाम पर धनराशि प्राप्त करने के बाद न तो निर्धारित फ्लैट का कब्जा दिया और न ही उनका पैसा वापस किया।

शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले में कुल ₹35.50 लाख की आर्थिक धोखाधड़ी एवं गबन का आरोप लगाया है। मामले में पुलिस द्वारा शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच की जा रही है। आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।



















उल्हासनगर में ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ में फ्लैट खरीदने से पहले दस्तावेजों की गहन जांच जरूरी, प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A और सी.टी.एस. नंबर 9113 से जुड़ी संपत्ति का मामला; खरीदारों से जल्दबाजी से बचने और सभी सरकारी मंजूरियों की पुष्टि करने की अपील।

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 क्षेत्र में उल्हासनगर महानगरपालिका के पास स्थित ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ नामक इमारत में फ्लैट खरीदने की योजना बना रहे नागरिकों के लिए संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की विस्तृत जांच करना महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उक्त परियोजना प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A, शीट नंबर 51 और सी.टी.एस. नंबर 9113 से संबंधित बताई जा रही है।

इस संपत्ति से संबंधित नक्शा/खाका क्रमांक UMC/BP/46/24/148 के रूप में उल्लेखित है। ऐसे में संभावित खरीदारों के लिए जरूरी है कि वे केवल बिल्डिंग के नाम, प्रचार सामग्री, मौखिक जानकारी या ब्रोकर द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर फ्लैट खरीदने का निर्णय न लें।

हर दस्तावेज की करें स्वतंत्र जांच

फ्लैट खरीदना किसी भी व्यक्ति के लिए बड़ा आर्थिक निर्णय होता है। इसलिए बुकिंग या भुगतान करने से पहले संबंधित संपत्ति के टाइटल दस्तावेज, भूमि रिकॉर्ड, सी.टी.एस. रिकॉर्ड, मंजूर बिल्डिंग प्लान, निर्माण अनुमति, विकास संबंधी अनुमतियां, ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट (OC), कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC), रेरा पंजीकरण जहां लागू हो तथा अन्य आवश्यक सरकारी मंजूरियों की जांच करना बेहद जरूरी है।

खरीदार संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त कर उन्हें संबंधित सरकारी विभागों और सक्षम प्राधिकरणों के रिकॉर्ड से मिलान कर सकते हैं। दस्तावेजों में किसी प्रकार की विसंगति, अंतर या अस्पष्टता दिखाई देने पर उसका स्पष्टीकरण प्राप्त किए बिना आर्थिक लेन-देन करना उचित नहीं होगा।

महानगरपालिका के रिकॉर्ड से करें पुष्टि

संभावित खरीदार संबंधित निर्माण योजना और मंजूरियों की जानकारी उल्हासनगर महानगरपालिका के संबंधित विभाग से प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, जहां आवश्यक हो वहां भूमि एवं संपत्ति रिकॉर्ड की भी स्वतंत्र रूप से जांच की जा सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी संपत्ति को खरीदने से पहले दस्तावेजों की केवल सतही जांच के बजाय संपत्ति कानून के अनुभवी वकील या योग्य प्रॉपर्टी लीगल एक्सपर्ट से टाइटल और अन्य कानूनी दस्तावेजों की जांच कराना खरीदार के हित में हो सकता है।

बुकिंग और भुगतान में जल्दबाजी से बचें

‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ में फ्लैट खरीदने की तैयारी कर रहे नागरिकों से अपील है कि वे किसी भी प्रकार के दबाव या जल्दबाजी में बुकिंग राशि अथवा अन्य भुगतान न करें। पहले सभी आवश्यक दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की पुष्टि करें और उसके बाद ही खरीदारी की प्रक्रिया आगे बढ़ाएं।

खरीदारों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि फ्लैट से संबंधित कारपेट एरिया, कीमत, पार्किंग, सुविधाएं, रखरखाव, कब्जा देने की समयसीमा और अन्य शर्तें लिखित रूप में स्पष्ट हों तथा संबंधित करार और दस्तावेजों में उनका उल्लेख हो।

सतर्कता ही सबसे सुरक्षित कदम

किसी भी आवासीय परियोजना में निवेश करने से पहले दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच खरीदार को भविष्य में संभावित कानूनी या आर्थिक परेशानी से बचाने में मदद कर सकती है। इसलिए नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे “पहले दस्तावेजों की जांच, फिर निवेश” के सिद्धांत को अपनाएं।

यह खबर उपलब्ध जानकारी के आधार पर खरीदारों को जागरूक और सतर्क करने के उद्देश्य से प्रकाशित की जा रही है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, बिल्डर, संस्था या परियोजना पर कोई आरोप लगाना या उसकी वैधता के संबंध में अंतिम निष्कर्ष देना नहीं है। किसी भी परियोजना की वास्तविक कानूनी स्थिति संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकरण की आधिकारिक जानकारी से ही निर्धारित की जानी चाहिए।

यदि संबंधित बिल्डर, संस्था या अन्य पक्ष इस विषय में कोई आधिकारिक दस्तावेज, स्पष्टीकरण या अपना पक्ष प्रस्तुत करता है, तो उसे भी तथ्यात्मक रूप से उचित स्थान दिया जा सकता है।




















उल्हासनगर में पुनर्बांधणी विवाद पर मनपा का अंतिम स्मरणपत्र; 7 दिन में जवाब नहीं दिया तो होगी एकतरफा कार्रवाई।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के नगररचना विभाग ने उल्हासनगर-3 स्थित एक पुनर्बांधणी परियोजना को लेकर संबंधित संस्था को अंतिम स्मरणपत्र जारी किया है। मनपा ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि शिकायत में उठाए गए मुद्दों पर निर्धारित समय के भीतर लिखित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया तो संबंधित पक्ष का कोई पक्ष नहीं है, ऐसा मानते हुए एकतरफा निर्णय लेकर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

मनपा नगररचना विभाग की ओर से यह पत्र 5 अगस्त 2026 को जारी किया गया है। पत्र के अनुसार, CTS नंबर 9113, प्लॉट नंबर 63, सेक्शन-4ए, शीट नंबर 51, उल्हासनगर-3 स्थित संपत्ति पर मल्हार को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की ओर से पुनर्बांधणी निर्माण की अनुमति प्रदान की गई है।

इस परियोजना के लिए मनपा ने 9 जनवरी 2025 को पुनर्बांधणी निर्माण कार्य शुरू करने की अनुमति प्रमाणपत्र जारी किया था। इसी अनुमति के आधार पर वर्तमान में इमारत का निर्माण कार्य चल रहा है।

निर्माण कार्य को लेकर शिकायत

मनपा के पत्र में बताया गया है कि शिकायतकर्ता अमित किशिनचंद पमनानी की ओर से अधिवक्ता निखिल एच. टेकवाणी ने 15 मई 2026 को नगररचना विभाग में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में मंजूर पुनर्बांधणी निर्माण अनुमति के आधार पर चल रहे निर्माण कार्य को लेकर विभिन्न मुद्दे उठाए गए हैं।

शिकायत के बाद नगररचना विभाग ने संबंधित संस्था को 10 जुलाई 2026 के पत्र के माध्यम से शिकायत में उठाए गए मुद्दों पर सात दिनों के भीतर लिखित स्पष्टीकरण और अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

निर्धारित समय बीतने के बावजूद जवाब नहीं

मनपा के अनुसार, निर्धारित सात दिनों की अवधि बीत जाने के बावजूद संबंधित पक्ष की ओर से अब तक कोई लिखित खुलासा या स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसी कारण नगररचना विभाग ने अब अंतिम स्मरणपत्र जारी करते हुए दोबारा सात दिनों की मोहलत दी है।

मनपा ने पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि शिकायत में उठाए गए मुद्दों के संबंध में 7 दिनों के भीतर लिखित स्पष्टीकरण/कहना प्रस्तुत नहीं किया गया, तो यह माना जाएगा कि संबंधित पक्ष को इस मामले में कुछ नहीं कहना है। इसके बाद विभाग द्वारा एकतरफा निर्णय लेकर नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

यह अंतिम स्मरणपत्र उल्हासनगर महानगरपालिका के प्रभारी सहायक संचालक, नगररचना चेतन पाटील के हस्ताक्षर से जारी किया गया है। पत्र की एक प्रति शिकायतकर्ता अमित किशिनचंद पमनानी को भी जानकारी के लिए भेजी गई है।

निर्माण परियोजना पर बढ़ी नजर

मनपा के इस अंतिम नोटिस के बाद उल्हासनगर-3 की उक्त पुनर्बांधणी परियोजना को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, पत्र में शिकायत के आरोपों को सही ठहराने संबंधी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है। फिलहाल संबंधित पक्ष को अपना लिखित पक्ष रखने का अवसर दिया गया है और आगे की कार्रवाई उसके जवाब तथा मनपा के नियमानुसार निर्णय पर निर्भर करेगी।
























उल्हासनगर-2 के राशन वितरण कार्यालय क्रमांक 40-एफ (उप) में कथित अनियमितताओं के आरोप, गरीब लाभार्थियों को पूरा राशन न मिलने की शिकायत; राशन दुकानदारों और RO-ARO अधिकारियों की भूमिका पर सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-2 के राशन वितरण कार्यालय क्रमांक 40-एफ (उप) में अंतर्गत आने वाली विभिन्न राशन दुकानों में राशन वितरण को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं। आरोप है कि राशन दुकानदारों को उनके अंतर्गत दर्ज राशन कार्डों की संख्या के आधार पर निर्धारित मात्रा में राशन उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन इसके बावजूद पात्र गरीब लाभार्थियों तक पूरा राशन नहीं पहुंच रहा है।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि राशन वितरण व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के चलते कई जरूरतमंद परिवार अपने निर्धारित राशन से वंचित रह जाते हैं। वहीं, क्षेत्र के RO और ARO अधिकारियों की कथित मिलीभगत के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राशन दुकानों में उपलब्ध स्टॉक, राशन कार्डधारकों की संख्या और वास्तविक वितरण की निष्पक्ष जांच की जाए तो कथित गड़बड़ियों की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सरकार की ओर से मिलने वाला राशन उनका अधिकार है। ऐसे में नागरिकों ने संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से उल्हासनगर-2 के राशन वितरण कार्यालय क्रमांक 40-एफ (उप) में अंतर्गत आने वाली सभी राशन दुकानों की जांच, स्टॉक का सत्यापन और वितरण व्यवस्था का ऑडिट कराने की मांग की है।

अब देखना होगा कि इन शिकायतों और आरोपों को लेकर खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की ओर से क्या कार्रवाई की जाती है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों एवं राशन दुकानदारों की भूमिका की जांच होती है।