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उल्हासनगर में 1 जनवरी 2006 के बाद बने निर्माणों की वैधता पर बड़ा सवाल! RTI के जवाब ने बढ़ाई जांच की मांग।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में अवैध निर्माणों का मुद्दा एक बार फिर गंभीर चर्चा में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की PIL क्रमांक 105/2003 से जुड़े निर्देशों और हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि 1 जनवरी 2006 के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में मंजूर किए गए निर्माणों, प्लान, CC और OC की वैधता का रिकॉर्ड किस स्तर पर उपलब्ध है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात नगर रचना विभाग ने RTI के जवाब में कही है। यह जवाब श्री अर्जुनसिंग आहूजा द्वारा 17 मार्च 2026 को दायर किए गए RTI आवेदन के संदर्भ में 30 अप्रैल 2026 को जारी किया गया।

RTI जवाब में क्या कहा गया?

उल्हासनगर महानगरपालिका के नगर रचना विभाग की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं (Legal Structures) से संबंधित जानकारी इस विभाग में उपलब्ध नहीं है।

यह जवाब ऐसे समय सामने आया है जब शहर में पुराने और नए निर्माणों की वैधता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

PIL 105/2003 का संदर्भ

उल्हासनगर के निर्माणों से संबंधित न्यायिक मामलों के संदर्भ में PIL No. 105/2003 का उल्लेख किया जाता रहा है। इस मामले में 2005 से पहले के निर्माणों के नियमितीकरण और उसके बाद अवैध निर्माणों पर नियंत्रण से जुड़े निर्देशों का संदर्भ सामने आता है।

इसी पृष्ठभूमि में अब यह सवाल उठ रहा है कि 1 जनवरी 2006 के बाद शहर में हुए निर्माणों की निगरानी, मंजूर प्लान, Commencement Certificate (CC) और Occupation Certificate (OC) का रिकॉर्ड किस प्रकार संधारित किया गया है।

क्या सभी मंजूर निर्माणों की जांच होनी चाहिए?

RTI के जवाब के बाद अब एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है—यदि नगर रचना विभाग के पास 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र की कानूनी संरचनाओं से संबंधित समेकित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो क्या इस अवधि में मंजूर किए गए सभी प्रमुख भवन प्लान, CC और OC की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए?

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध RTI पत्र और उसमें दर्ज जानकारी पर आधारित है। किसी व्यक्ति, अधिकारी, बिल्डर या संस्था पर अवैध निर्माण अथवा न्यायालय के आदेश की अवमानना का आरोप तथ्यात्मक जांच और सक्षम न्यायिक/प्रशासनिक निष्कर्ष के बिना अंतिम रूप से नहीं माना जाना चाहिए।






















मल्हार वॉटरफ्रंट पर निर्माण व दस्तावेजों को लेकर सवाल, जांच की मांग; प्लॉट 63, सेक्शन 4/A और CTS 9113 से जुड़ी जानकारी पर खरीदारों को सतर्क रहने की अपील।

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 क्षेत्र में उल्हासनगर महानगरपालिका के समीप स्थित ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ नामक इमारत से संबंधित दस्तावेजों और निर्माण प्रक्रिया को लेकर कुछ गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इमारत प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A, शीट नंबर 51 तथा सी.टी.एस. नंबर 9113 से संबंधित बताई जा रही है। इमारत के लिए नक्शा/खाका क्रमांक UMC/BP/46/24/148 का उल्लेख किया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित संपत्ति के दस्तावेजों में कथित तौर पर वायलेशन अथवा नियमों से संबंधित विसंगतियां होने की बात सामने आई है। साथ ही, निर्माण कार्य से जुड़ी कुछ कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह संपत्ति विकास योजना (Development Plan—DP) के प्रावधानों से प्रभावित होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, स्वीकृत भवन योजना, विकास अनुमति, निर्माण अनुमति, ऑक्युपेंसी/कम्प्लीशन संबंधी दस्तावेज तथा अन्य आवश्यक मंजूरियों की सक्षम प्राधिकरण से जांच किया जाना जरूरी है।

टाउन प्लानिंग विभाग के रिकॉर्ड की जांच अहम

सूत्रों के अनुसार, उल्हासनगर महानगरपालिका के टाउन प्लानिंग विभाग से संबंधित रिकॉर्ड में इस संपत्ति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो सकती है। यदि किसी प्रकार का निर्माण या दस्तावेजी उल्लंघन पाया जाता है, तो उसकी वास्तविक स्थिति केवल सक्षम प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है।

‘मंत्रालय टाइम्स’ को यह भी जानकारी मिली है कि उल्हासनगर शहर में ऐसी कई अन्य इमारतों और संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनके संबंध में Development Plan के प्रावधानों, स्वीकृत योजनाओं अथवा निर्माण अनुमति की स्थिति की जांच आवश्यक हो सकती है।

आगे भी सामने आएगी जानकारी

‘मंत्रालय टाइम्स’ द्वारा उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल के आधार पर ऐसी संपत्तियों से जुड़ी जानकारी एक-एक कर सार्वजनिक करने का प्रयास किया जाएगा। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, बिल्डर या संस्था पर बिना आधिकारिक प्रमाण के आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित में दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की स्थिति को सामने लाना है।

फ्लैट खरीदारों के लिए जरूरी सावधानी

‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ अथवा किसी भी अन्य निर्माण परियोजना में फ्लैट खरीदने से पहले संभावित खरीदारों को केवल विज्ञापन या मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहते हुए संबंधित स्वीकृत प्लान, बिल्डिंग परमिशन, भूमि रिकॉर्ड, DP स्थिति, RERA संबंधी जानकारी (जहां लागू हो), कंप्लीशन/ऑक्युपेंसी दस्तावेज और अन्य वैधानिक मंजूरियों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।

महत्वपूर्ण: इस समाचार में उल्लेखित वायलेशन, अनियमितता और DP से प्रभावित होने संबंधी बातें उपलब्ध जानकारी/सूत्रों पर आधारित आरोप या दावे हैं। अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और आदेश से ही स्पष्ट होगी। संबंधित पक्ष का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

















शाम 6 बजे के बाद उल्हासनगर मनपा में गतिविधियों को लेकर उठे सवाल, एंटी चैंबर के इस्तेमाल की जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद भी कुछ गतिविधियां जारी रहने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर के एक एंटी चैंबर में एक प्रभावशाली नेता की कथित मौजूदगी रहती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

महानगरपालिका से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कार्यालयीन समय के बाद भी कुछ लोगों की आवाजाही बनी रहती है। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान कथित तौर पर बड़े ठेकेदारों, बिल्डरों और शहर के कुछ व्यापारियों से संबंधित कार्यों को लेकर मुलाकातें और चर्चाएं होती हैं।

इन दावों के सामने आने के बाद सवाल यह उठ रहा है कि यदि महानगरपालिका का नियमित कामकाज शाम 6 बजे समाप्त हो जाता है, तो उसके बाद परिसर में किन लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है और किन अधिकारियों अथवा जनप्रतिनिधियों से उनकी मुलाकात होती है।

जनता ने आयुक्त से की जांच की मांग

उल्हासनगर की जनता ने महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद सभी चैंबर और एंटी चैंबर को नियमानुसार लॉक किया जाए तथा अनधिकृत प्रवेश और बैठकों पर रोक सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही महानगरपालिका परिसर की CCTV फुटेज की जांच किए जाने की मांग भी उठ रही है। जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर में कौन-कौन लोग मौजूद रहे, किस समय प्रवेश और निकास हुआ तथा किन लोगों से मुलाकात हुई।

आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी

यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के बजाय महानगरपालिका की प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यालयीन व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। यदि लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं, तो CCTV फुटेज और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि जिस नेता के संबंध में आरोप लगाए जा रहे हैं, वह कौन है। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम बिना आधिकारिक पुष्टि के सामने रखना उचित नहीं होगा। मामले में महानगरपालिका प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

अब सवाल यही है—क्या उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन शाम 6 बजे के बाद की गतिविधियों की CCTV और प्रवेश रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष जांच करेगा?


















उल्हासनगर मनपा में ऑनलाइन टेंडरिंग को लेकर सवाल, छोटे ठेकेदारों के हितों और पारदर्शिता पर उठी चिंता।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में निविदा प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। मनपा आयुक्त मनीषा आव्हाले की ओर से ऑनलाइन टेंडरिंग प्रक्रिया के संबंध में पत्र जारी किए जाने के बाद ठेकेदारों और प्रशासनिक स्तर पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

ऑनलाइन टेंडरिंग को पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। हालांकि, कुछ छोटे ठेकेदारों की ओर से यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि नई प्रक्रिया में तकनीकी और आर्थिक शर्तों के कारण उनके लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में छोटे और स्थानीय ठेकेदारों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट नियम और समान अवसर सुनिश्चित करने की मांग उठ रही है।

मैनुअल टेंडरिंग के बाद अब ऑनलाइन प्रक्रिया पर नजर

मनपा में पूर्व में अपनाई जाने वाली मैनुअल टेंडरिंग प्रक्रिया को लेकर भी समय-समय पर अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अब ऑनलाइन प्रणाली लागू होने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि नई व्यवस्था वास्तव में सभी योग्य ठेकेदारों को समान अवसर देती है या नहीं।

ठेकेदारों से जुड़े कुछ वर्गों का कहना है कि ऑनलाइन प्रक्रिया में तकनीकी पात्रता, दस्तावेजी शर्तों, टेंडर की जानकारी और समयसीमा जैसी सभी व्यवस्थाएं स्पष्ट एवं समान होनी चाहिए, ताकि किसी विशेष समूह या चुनिंदा ठेकेदारों को अनुचित लाभ मिलने की संभावना न रहे।

चुनिंदा ठेकेदारों को काम मिलने के आरोप

उल्हासनगर मनपा में कुछ ठेकेदारों को बार-बार काम मिलने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पूरी निविदा प्रक्रिया, पात्रता मानदंड, तकनीकी मूल्यांकन और वर्क ऑर्डर जारी करने की प्रक्रिया को सार्वजनिक एवं पारदर्शी रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या पक्षपात हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग भी सामने आ सकती है।

PWD विभाग की भूमिका पर भी चर्चा

पूरे मामले के बीच मनपा के PWD विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी और एक महिला कर्मचारी की भूमिका को लेकर चर्चाएं सामने आने की बात कही जा रही है। हालांकि, किसी भी कर्मचारी के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों की फिलहाल आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और बिना ठोस दस्तावेज या जांच के किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

ऑनलाइन टेंडरिंग की असली परीक्षा पारदर्शिता

जानकारों के अनुसार, ऑनलाइन टेंडरिंग का उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धात्मक और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना है। इसलिए यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि सभी योग्य ठेकेदारों को समान अवसर मिले, टेंडर की शर्तें स्पष्ट हों और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड के आधार पर संचालित की जाए।

अब सवाल यह है कि क्या उल्हासनगर महानगरपालिका की नई ऑनलाइन टेंडरिंग व्यवस्था छोटे ठेकेदारों को भी समान अवसर देगी और क्या इससे निविदा प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित होगी?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब आने वाले दिनों में निविदाओं की प्रक्रिया और प्रशासन की ओर से जारी होने वाली जानकारी से ही सामने आएगा।
















12 करोड़ के उल्हासनगर मनपा विकास कार्यों को लेकर विवाद गहराया कथित फर्जी बिलों की जांच और संबंधित भुगतान तत्काल रोकने की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में करीब 12 करोड़ रुपये के विकास कार्यों से संबंधित निविदाओं और कथित बिल भुगतान को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। बताया जा रहा है कि ये कार्य ठाणे जिला प्रशासन तथा मूलभूत सुविधाओं से संबंधित योजनाओं के अंतर्गत महानगरपालिका क्षेत्र में प्रस्तावित किए गए थे। इन कार्यों में से कई कार्य चुनाव से पहले के बताए जा रहे हैं। हालांकि, संबंधित कार्य वास्तव में किस स्तर तक पूरे हुए हैं और उनके नाम पर तैयार किए गए बिल वास्तविक कार्यों के अनुरूप हैं या नहीं, इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इस मामले में स्थानीय स्तर पर कथित तौर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ विकास कार्य मौके पर हुए बिना ही कागजों पर पूर्ण दिखाए गए और उनके आधार पर बिल तैयार किए गए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है। इसी कारण पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

भुगतान रोककर जांच कराने की मांग

उल्हासनगर की जनता की ओर से मांग उठाई जा रही है कि करीब 12 करोड़ रुपये के इन सभी विकास कार्यों की तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर विस्तृत जांच कराई जाए। प्रत्येक कार्य की मौके पर जाकर जांच की जाए तथा कार्य की वास्तविक स्थिति, माप पुस्तिका, कार्यादेश, ठेकेदारों के बिल और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों का मिलान किया जाए।

मांग की गई है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित कार्यों के लंबित बिलों का भुगतान रोक दिया जाए। साथ ही, यदि किसी कार्य में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

पीडब्ल्यूडी विभाग की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में उल्हासनगर महानगरपालिका के पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ आरोपों में विभाग के उपअभियंता संदीप जाधव की भूमिका की जांच किए जाने की मांग की गई है। उनके संबंध में कथित फर्जी बिल तैयार करने तथा ठेकेदारों से कथित रूप से आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं।

हालांकि, ये गंभीर आरोप फिलहाल आरोपों के स्तर पर हैं और उनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारी या अन्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजी एवं स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

‘मास्टरमाइंड’ होने के दावे की भी जांच जरूरी

कथित फर्जी बिलों के मामले में ‘शंकर'’ नामक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होने और उसे कथित तौर पर पूरे मामले का ‘मास्टरमाइंड’ बताए जाने की चर्चा भी सामने आई है। लेकिन इस दावे की भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों द्वारा संबंधित दस्तावेजों, बिल प्रक्रिया, स्वीकृतियों, माप पुस्तिकाओं, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों व ठेकेदारों की भूमिका की जांच करना महत्वपूर्ण होगा।

आयुक्त से उच्चस्तरीय जांच की मांग

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उल्हासनगर महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाळे से मांग की गई है कि पूरे मामले की तत्काल निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही, जांच पूरी होने तक विवादित अथवा संदिग्ध बिलों का भुगतान रोकने, प्रत्येक कार्य का स्थल निरीक्षण कराने और दोष सिद्ध होने पर संबंधितों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि महानगरपालिका प्रशासन इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है और क्या 12 करोड़ रुपये के कथित विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति तथा बिलों की सत्यता की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।

नोट: इस खबर में लगाए गए आरोप संबंधित शिकायत/दावों पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि का दावा नहीं किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों का पक्ष जांच के दौरान सामने आना आवश्यक है।


















ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और बेबाक कार्यशैली की पहचान: समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे भारत देश की शान।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

देश की प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसे अधिकारियों का विशेष महत्व है, जो अपने पद की जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ निभाने को प्राथमिकता देते हैं। IRS अधिकारी समीर वानखेड़े और IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और बेबाक कार्यशैली के लिए अलग पहचान रखते हैं।

दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में जनहित को प्राथमिकता, नियमों के पालन के प्रति प्रतिबद्धता और अपने दायित्वों के प्रति गंभीरता देखने को मिलती है। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के दौरान चुनौतियों का सामना करते हुए दृढ़ता के साथ काम करने की उनकी शैली ने उन्हें लोगों के बीच चर्चा का विषय बनाया है।

समीर वानखेड़े अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान सख्त और प्रभावी कार्रवाई के लिए चर्चित रहे हैं, वहीं तुकाराम मुंडे भी अपने स्पष्ट निर्णयों, अनुशासनप्रियता और कर्तव्य के प्रति समर्पित कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में एक समान बात यह है कि वे अपने दायित्वों को गंभीरता से लेने और व्यवस्था में जवाबदेही को महत्व देने के लिए पहचाने जाते हैं।

आज के दौर में प्रशासनिक सेवाओं में ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूत करना बेहद आवश्यक है। ऐसे में कर्तव्य के प्रति समर्पित अधिकारियों का कार्य आम नागरिकों में प्रशासन के प्रति विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की कार्यशैली उन युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है, जो देश की सेवा के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में आने का सपना देखते हैं। उनकी निष्ठा, अनुशासन और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

देश के प्रति समर्पण और कर्तव्य के प्रति निष्ठा रखने वाले ऐसे कर्मठ अधिकारियों पर हर भारतीय को गर्व है। समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारी निश्चित रूप से भारत की शान हैं।


















उल्हासनगर-4 में बच्चों की पुरानी दफनभूमि की जमीन पर कथित कब्जे की कोशिश नाकाम, शिकायत के बाद प्रशासन हरकत में।


 







उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-4 स्थित मुक्तिधाम श्मशानभूमि के सामने पुराने हिंदू बच्चों की दफनभूमि से जुड़ी जमीन को लेकर कथित कब्जे की कोशिश का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर उठे इस मुद्दे के बाद जमीन की स्थिति और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि उक्त जमीन को लेकर विवाद के दौरान वहां स्थित काल भैरव मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने/तोड़ने की बात भी सामने आई थी। इस घटनाक्रम को लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी जताई गई और जमीन के संरक्षण तथा वास्तविक मालिकाना हक की जांच की मांग उठी।

इस मामले में राजेश नागदेव द्वारा की गई शिकायत के बाद संबंधित प्रशासनिक स्तर पर मामले को गंभीरता से लिए जाने की बात सामने आई है। शिकायत में जमीन के रिकॉर्ड, उपयोग, सीमांकन तथा कथित कब्जे के प्रयास से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

स्थानीय स्तर पर इस मामले को उठाने में राजेश नागदेव, अर्जुन सिंह आहूजा और निर्मल मखीजा की सक्रियता का भी उल्लेख किया जा रहा है। उनके प्रयासों के चलते संबंधित जमीन को कथित रूप से कब्जे में जाने से बचाने में सफलता मिलने का दावा किया गया है।

इस जमीन पर अब उल्हासनगर महानगरपालिका का बोर्ड लगा दिया गया है और मनपा ने जमीन को अपने आधिकारिक कब्जे में ले लिया है।