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12 करोड़ के उल्हासनगर मनपा विकास कार्यों को लेकर विवाद गहराया कथित फर्जी बिलों की जांच और संबंधित भुगतान तत्काल रोकने की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में करीब 12 करोड़ रुपये के विकास कार्यों से संबंधित निविदाओं और कथित बिल भुगतान को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। बताया जा रहा है कि ये कार्य ठाणे जिला प्रशासन तथा मूलभूत सुविधाओं से संबंधित योजनाओं के अंतर्गत महानगरपालिका क्षेत्र में प्रस्तावित किए गए थे। इन कार्यों में से कई कार्य चुनाव से पहले के बताए जा रहे हैं। हालांकि, संबंधित कार्य वास्तव में किस स्तर तक पूरे हुए हैं और उनके नाम पर तैयार किए गए बिल वास्तविक कार्यों के अनुरूप हैं या नहीं, इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इस मामले में स्थानीय स्तर पर कथित तौर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ विकास कार्य मौके पर हुए बिना ही कागजों पर पूर्ण दिखाए गए और उनके आधार पर बिल तैयार किए गए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है। इसी कारण पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

भुगतान रोककर जांच कराने की मांग

उल्हासनगर की जनता की ओर से मांग उठाई जा रही है कि करीब 12 करोड़ रुपये के इन सभी विकास कार्यों की तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर विस्तृत जांच कराई जाए। प्रत्येक कार्य की मौके पर जाकर जांच की जाए तथा कार्य की वास्तविक स्थिति, माप पुस्तिका, कार्यादेश, ठेकेदारों के बिल और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों का मिलान किया जाए।

मांग की गई है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित कार्यों के लंबित बिलों का भुगतान रोक दिया जाए। साथ ही, यदि किसी कार्य में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

पीडब्ल्यूडी विभाग की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में उल्हासनगर महानगरपालिका के पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ आरोपों में विभाग के उपअभियंता संदीप जाधव की भूमिका की जांच किए जाने की मांग की गई है। उनके संबंध में कथित फर्जी बिल तैयार करने तथा ठेकेदारों से कथित रूप से आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं।

हालांकि, ये गंभीर आरोप फिलहाल आरोपों के स्तर पर हैं और उनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारी या अन्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजी एवं स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

‘मास्टरमाइंड’ होने के दावे की भी जांच जरूरी

कथित फर्जी बिलों के मामले में ‘शंकर'’ नामक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका होने और उसे कथित तौर पर पूरे मामले का ‘मास्टरमाइंड’ बताए जाने की चर्चा भी सामने आई है। लेकिन इस दावे की भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों द्वारा संबंधित दस्तावेजों, बिल प्रक्रिया, स्वीकृतियों, माप पुस्तिकाओं, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों व ठेकेदारों की भूमिका की जांच करना महत्वपूर्ण होगा।

आयुक्त से उच्चस्तरीय जांच की मांग

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उल्हासनगर महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाळे से मांग की गई है कि पूरे मामले की तत्काल निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही, जांच पूरी होने तक विवादित अथवा संदिग्ध बिलों का भुगतान रोकने, प्रत्येक कार्य का स्थल निरीक्षण कराने और दोष सिद्ध होने पर संबंधितों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि महानगरपालिका प्रशासन इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है और क्या 12 करोड़ रुपये के कथित विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति तथा बिलों की सत्यता की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।

नोट: इस खबर में लगाए गए आरोप संबंधित शिकायत/दावों पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अथवा किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि का दावा नहीं किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों का पक्ष जांच के दौरान सामने आना आवश्यक है।


















ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और बेबाक कार्यशैली की पहचान: समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे भारत देश की शान।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

देश की प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसे अधिकारियों का विशेष महत्व है, जो अपने पद की जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ निभाने को प्राथमिकता देते हैं। IRS अधिकारी समीर वानखेड़े और IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और बेबाक कार्यशैली के लिए अलग पहचान रखते हैं।

दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में जनहित को प्राथमिकता, नियमों के पालन के प्रति प्रतिबद्धता और अपने दायित्वों के प्रति गंभीरता देखने को मिलती है। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के दौरान चुनौतियों का सामना करते हुए दृढ़ता के साथ काम करने की उनकी शैली ने उन्हें लोगों के बीच चर्चा का विषय बनाया है।

समीर वानखेड़े अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दौरान सख्त और प्रभावी कार्रवाई के लिए चर्चित रहे हैं, वहीं तुकाराम मुंडे भी अपने स्पष्ट निर्णयों, अनुशासनप्रियता और कर्तव्य के प्रति समर्पित कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। दोनों अधिकारियों की कार्यशैली में एक समान बात यह है कि वे अपने दायित्वों को गंभीरता से लेने और व्यवस्था में जवाबदेही को महत्व देने के लिए पहचाने जाते हैं।

आज के दौर में प्रशासनिक सेवाओं में ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूत करना बेहद आवश्यक है। ऐसे में कर्तव्य के प्रति समर्पित अधिकारियों का कार्य आम नागरिकों में प्रशासन के प्रति विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों की कार्यशैली उन युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है, जो देश की सेवा के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में आने का सपना देखते हैं। उनकी निष्ठा, अनुशासन और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

देश के प्रति समर्पण और कर्तव्य के प्रति निष्ठा रखने वाले ऐसे कर्मठ अधिकारियों पर हर भारतीय को गर्व है। समीर वानखेड़े और तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारी निश्चित रूप से भारत की शान हैं।


















मल्हार वॉटरफ्रंट पर निर्माण व दस्तावेजों को लेकर सवाल, जांच की मांग; प्लॉट 63, सेक्शन 4/A और CTS 9113 से जुड़ी जानकारी पर खरीदारों को सतर्क रहने की अपील।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 क्षेत्र में उल्हासनगर महानगरपालिका के समीप स्थित ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ नामक इमारत से संबंधित दस्तावेजों और निर्माण प्रक्रिया को लेकर कुछ गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इमारत प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A, शीट नंबर 51 तथा सी.टी.एस. नंबर 9113 से संबंधित बताई जा रही है। इमारत के लिए नक्शा/खाका क्रमांक UMC/BP/46/24/148 का उल्लेख किया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित संपत्ति के दस्तावेजों में कथित तौर पर वायलेशन अथवा नियमों से संबंधित विसंगतियां होने की बात सामने आई है। साथ ही, निर्माण कार्य से जुड़ी कुछ कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह संपत्ति विकास योजना (Development Plan—DP) के प्रावधानों से प्रभावित होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, स्वीकृत भवन योजना, विकास अनुमति, निर्माण अनुमति, ऑक्युपेंसी/कम्प्लीशन संबंधी दस्तावेज तथा अन्य आवश्यक मंजूरियों की सक्षम प्राधिकरण से जांच किया जाना जरूरी है।

टाउन प्लानिंग विभाग के रिकॉर्ड की जांच अहम

सूत्रों के अनुसार, उल्हासनगर महानगरपालिका के टाउन प्लानिंग विभाग से संबंधित रिकॉर्ड में इस संपत्ति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो सकती है। यदि किसी प्रकार का निर्माण या दस्तावेजी उल्लंघन पाया जाता है, तो उसकी वास्तविक स्थिति केवल सक्षम प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है।

‘मंत्रालय टाइम्स’ को यह भी जानकारी मिली है कि उल्हासनगर शहर में ऐसी कई अन्य इमारतों और संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनके संबंध में Development Plan के प्रावधानों, स्वीकृत योजनाओं अथवा निर्माण अनुमति की स्थिति की जांच आवश्यक हो सकती है।

आगे भी सामने आएगी जानकारी

‘मंत्रालय टाइम्स’ द्वारा उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल के आधार पर ऐसी संपत्तियों से जुड़ी जानकारी एक-एक कर सार्वजनिक करने का प्रयास किया जाएगा। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, बिल्डर या संस्था पर बिना आधिकारिक प्रमाण के आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित में दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की स्थिति को सामने लाना है।

फ्लैट खरीदारों के लिए जरूरी सावधानी

‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ अथवा किसी भी अन्य निर्माण परियोजना में फ्लैट खरीदने से पहले संभावित खरीदारों को केवल विज्ञापन या मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहते हुए संबंधित स्वीकृत प्लान, बिल्डिंग परमिशन, भूमि रिकॉर्ड, DP स्थिति, RERA संबंधी जानकारी (जहां लागू हो), कंप्लीशन/ऑक्युपेंसी दस्तावेज और अन्य वैधानिक मंजूरियों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।

महत्वपूर्ण: इस समाचार में उल्लेखित वायलेशन, अनियमितता और DP से प्रभावित होने संबंधी बातें उपलब्ध जानकारी/सूत्रों पर आधारित आरोप या दावे हैं। अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और आदेश से ही स्पष्ट होगी। संबंधित पक्ष का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


















उल्हासनगर-4 में बच्चों की पुरानी दफनभूमि की जमीन पर कथित कब्जे की कोशिश नाकाम, शिकायत के बाद प्रशासन हरकत में।


 







उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-4 स्थित मुक्तिधाम श्मशानभूमि के सामने पुराने हिंदू बच्चों की दफनभूमि से जुड़ी जमीन को लेकर कथित कब्जे की कोशिश का मामला सामने आया है। स्थानीय स्तर पर उठे इस मुद्दे के बाद जमीन की स्थिति और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि उक्त जमीन को लेकर विवाद के दौरान वहां स्थित काल भैरव मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने/तोड़ने की बात भी सामने आई थी। इस घटनाक्रम को लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी जताई गई और जमीन के संरक्षण तथा वास्तविक मालिकाना हक की जांच की मांग उठी।

इस मामले में राजेश नागदेव द्वारा की गई शिकायत के बाद संबंधित प्रशासनिक स्तर पर मामले को गंभीरता से लिए जाने की बात सामने आई है। शिकायत में जमीन के रिकॉर्ड, उपयोग, सीमांकन तथा कथित कब्जे के प्रयास से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

स्थानीय स्तर पर इस मामले को उठाने में राजेश नागदेव, अर्जुन सिंह आहूजा और निर्मल मखीजा की सक्रियता का भी उल्लेख किया जा रहा है। उनके प्रयासों के चलते संबंधित जमीन को कथित रूप से कब्जे में जाने से बचाने में सफलता मिलने का दावा किया गया है।

इस जमीन पर अब उल्हासनगर महानगरपालिका का बोर्ड लगा दिया गया है और मनपा ने जमीन को अपने आधिकारिक कब्जे में ले लिया है।















उल्हासनगर मनपा में ACB कार्रवाई के बावजूद महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती का मामला गरमाया,उपमुखमंत्री एकनाथ शिंदे ने दिए जांच के निर्देश।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की कार्रवाई में पकड़े गए अधिकारी-कर्मचारियों को कथित तौर पर महत्वपूर्ण एवं प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने का मामला अब उच्च स्तर तक पहुंच गया है। इस मामले को लेकर आंदोलन कर रहे राष्ट्रीय कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी, छावा संगठन के निखिल गोळे तथा समाजसेवी प्रकाश तलरेजा ने संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों को प्रभारी पदों से हटाने की मांग को लेकर 15 अगस्त 2026 से ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर आमरण अनशन शुरू करने की घोषणा की थी।

उपमुख्यमंत्री ने लिया मामले का संज्ञान

आंदोलनकारियों की शिकायत और मांगों का संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ठाणे जिलाधिकारी को लिखित निर्देश जारी किए हैं। निर्देश में मामले की गंभीरता से जांच करने तथा जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने को कहा गया है।

उपमुख्यमंत्री ने आंदोलनकारियों से अपना प्रस्तावित अनशन समाप्त करने का भी अनुरोध किया है। वहीं, ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से आंदोलनकारियों को आगे की कार्रवाई से अवगत कराने के लिए अगले सप्ताह पुनः बुलाए जाने की जानकारी सामने आई है।

एक महीने से चल रहा था आंदोलन

बताया गया है कि उल्हासनगर महानगरपालिका में पिछले कई वर्षों के दौरान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा कार्रवाई कर पकड़े गए कुछ अधिकारी-कर्मचारियों को बाद में महत्वपूर्ण पदों और प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने का आरोप लगाया गया है।

इन अधिकारियों-कर्मचारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटाने की मांग को लेकर पिछले करीब एक महीने से आंदोलन चल रहा था। राष्ट्रीय कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी और छावा संगठन के निखिल गोळे के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन के माध्यम से संबंधित प्रशासन से कार्रवाई की मांग की जा रही थी।

गणेश शिंपी सहित कई नाम चर्चा में

मामले में जिन अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, उनमें गणेश शिंपी का नाम प्रमुख रूप से बताया गया है। शिंपी पूर्व में लघुलेखक वर्ग-3 के पद पर कार्यरत थे और वर्तमान में उपआयुक्त (प्रभाग समिति क्रमांक-2), कर निर्धारक एवं संकलक, कर विभाग तथा चुनाव विभाग प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों का कार्यभार संभाल रहे हैं, ऐसा आरोप लगाया गया है।

इसके अलावा अजीत गोवारी (वरिष्ठ लिपिक), संजय पवार (कनिष्ठ अभियंता, नगररचना विभाग), अनिल खतुराणी (वरिष्ठ लिपिक, कर विभाग), अंकुश कदम (लिपिक, भंडार विभाग), राजा बुलानी (लिपिक, विधि विभाग), छाया डगळे (लिपिक, विधि विभाग), भानु परमार (लिपिक, कर विभाग), संजय पवार (लिपिक), बलराम गिधवा (लिपिक) और जगदीश परमार (लिपिक) सहित कुल 23 कर्मचारियों के ACB कार्रवाई में पकड़े जाने का उल्लेख किया गया है।

विभागीय और न्यायालयीन जांच का भी उल्लेख

आंदोलनकारियों का दावा है कि संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों में से कुछ के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, जबकि कुछ मामलों में न्यायालयीन प्रक्रिया भी जारी है। ऐसे में उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं प्रभारी पदों पर जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

अब उपमुख्यमंत्री के निर्देश के बाद ठाणे जिलाधिकारी स्तर पर इस पूरे मामले की जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ गई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका और वर्तमान पदों पर उनकी नियुक्ति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

उधर, जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा अगले सप्ताह आंदोलनकारियों को आगे की कार्रवाई की जानकारी देने के लिए बुलाए जाने के बाद अब सभी की निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है और उन्हें उनके वर्तमान प्रभारी पदों से हटाया जाता है या नहीं।



















‘जनप्रतिनिधि का कार्यालय या रिश्तेदारों का अड्डा?’ 2016 में ही उठे थे सवाल, अरजुन सिंह आहूजा की शिकायत पर उल्हासनगर मनपा ने कार्रवाई का दिया था आश्वासन।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में जनप्रतिनिधियों के लिए निर्धारित कार्यालयों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा कोई नया नहीं है। उपलब्ध पुराने पत्राचार के अनुसार, करीब एक दशक पहले वर्ष 2016 में ही इस संबंध में मनपा प्रशासन के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए सवाल उठाए गए थे कि क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों का इस्तेमाल उनके रिश्तेदारों द्वारा किया जा सकता है?

इस मामले को लेकर अरजुन सिंह आहूजा ने 6 सितंबर 2016 को उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त से मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की थी। इसके अगले दिन, 7 सितंबर 2016 को ई-मेल के माध्यम से लिखित शिकायत/निवेदन भी भेजा गया था। उपलब्ध ई-मेल रिकॉर्ड में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल और उनके रिश्तेदारों की कथित भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे।

महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों को लेकर विशेष आपत्ति

7 सितंबर 2016 को भेजे गए ई-मेल में विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ मामलों में महिला जनप्रतिनिधियों के पति अथवा भाई उनके कार्यालयों में बैठकर कार्यालय का उपयोग करते हैं।

शिकायतकर्ता ने प्रशासन से मांग की थी कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम और व्यवस्था तय की जाए, ताकि पद एवं कार्यालय के संभावित दुरुपयोग को रोका जा सके।

कार्यालय में अतिरिक्त कुर्सियों पर भी उठाया गया सवाल

शिकायत में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों में रखी जाने वाली अतिरिक्त कुर्सियों का मुद्दा भी उठाया गया था। ई-मेल में उल्लेख किया गया था कि कुछ कार्यालयों में मुख्य टेबल के आजु- बाजू दो अतिरिक्त कुर्सियां रखी जाती हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या इन कुर्सियों का इस्तेमाल जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों के बैठने के लिए किया जाता है।

आहूजा ने मांग की थी कि संबंधित जनप्रतिनिधि अथवा अध्यक्ष के कार्यालय में उपस्थित होने पर ही कार्यालय खोला जाए। साथ ही, जनप्रतिनिधि की कुर्सी के आसपास रखी गई अतिरिक्त कुर्सियों को हटाने की व्यवस्था की जाए, ताकि कार्यालय का इस्तेमाल केवल अधिकृत व्यक्ति द्वारा ही किया जा सके।

मीरा-भायंदर मनपा की व्यवस्था का उदाहरण

शिकायत में मीरा-भायंदर महानगरपालिका की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया था। ई-मेल में प्रशासन से आग्रह किया गया था कि वहां लागू व्यवस्था की पुष्टि की जाए और यदि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट नियम या प्रक्रिया लागू है, तो उसका अध्ययन कर उल्हासनगर महानगरपालिका में भी उचित व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जाए।

तत्कालीन आयुक्त कार्यालय ने दिया था जवाब

उपलब्ध पत्राचार के अनुसार, शिकायत के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त कार्यालय के स्वीय सहायक की ओर से शिकायतकर्ता को ई-मेल के माध्यम से जवाब दिया गया था।

जवाब में शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए बताया गया था कि माननीय आयुक्त के निर्देशानुसार मामले को उचित कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग को भेजा जाएगा।

इस प्रकार, वर्ष 2016 में उठाए गए इस मुद्दे पर मनपा प्रशासन की ओर से शिकायत को संबंधित विभाग तक भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आती है।

करीब एक दशक बाद फिर चर्चा में आया पुराना पत्राचार

अब करीब दस वर्ष पुराने इस पत्राचार के सामने आने से यह सवाल फिर चर्चा में है कि उस समय उठाई गई शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई हुई थी? क्या संबंधित विभाग ने मामले की जांच की थी? क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई नियम या दिशा-निर्देश जारी किए गए थे? और यदि कार्रवाई हुई थी, तो उसका रिकॉर्ड क्या है?

उपलब्ध ई-मेल और पत्राचार में शिकायत को संबंधित विभाग के पास भेजने की बात तो स्पष्ट रूप से सामने आती है, लेकिन आगे की जांच, कार्रवाई के निष्कर्ष या किसी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि के खिलाफ की गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।

इसलिए वर्ष 2016 में लगाए गए आरोपों को उस समय की शिकायत के रूप में ही देखा जाना चाहिए और उनके तथ्यात्मक सत्यापन के लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड तथा तत्कालीन विभागीय कार्रवाई की जानकारी सामने आना आवश्यक है।

सवाल वही, जवाब आज भी जरूरी

करीब एक दशक पुराने इस पत्राचार से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित दुरुपयोग और रिश्तेदारों द्वारा कार्यालय के इस्तेमाल का सवाल वर्ष 2016 में ही उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन के सामने उठाया जा चुका था।

उस समय शिकायत पर कार्रवाई के लिए मामला संबंधित विभाग को भेजने का आश्वासन दिया गया था। ऐसे में अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उस शिकायत का अंतिम नतीजा क्या निकला और क्या उस समय उठाए गए सवालों के आधार पर कोई स्थायी व्यवस्था लागू की गई थी?

जनप्रतिनिधि का कार्यालय आखिर जनसेवा के लिए है या उनके रिश्तेदारों के इस्तेमाल के लिए? वर्ष 2016 के इस पुराने पत्राचार ने इस सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है।


















उल्हासनगर में फ्लैट सौदे में ₹35.50 लाख की कथित धोखाधड़ी, जमीन मालिक-डेवलपर समेत 4 के खिलाफ FIR दर्ज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में अधूरे प्रोजेक्ट के नाम पर फ्लैट खरीदने के सौदे में कथित आर्थिक धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता अनिल सीतलदास मंगतानी की शिकायत के आधार पर FIR क्रमांक 382/2026 उल्हासनगर-1 पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है। शिकायत में जमीन मालिक, डेवलपर और दो एजेंटों पर आपसी मिलीभगत कर कथित रूप से ₹35.50 लाख की आर्थिक धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया गया है।

शिकायत के अनुसार, वर्ष 2023 में अनिल मंगतानी ने अपने मित्र एवं रियल एस्टेट ब्रोकर मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी के माध्यम से उल्हासनगर-2 स्थित ‘सेवन हेवन’ अपार्टमेंट में फ्लैट खरीदने की जानकारी प्राप्त की। इसके बाद जमीन मालिक रजनी अर्जुनदास रामसिंधानी और उनके कथित डेवलपर मनोज कुल्लूमल पंजवानी से संपर्क हुआ।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, सेवन हेवन की तीसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 301, करीब 1100 वर्ग फुट क्षेत्रफल के फ्लैट का सौदा ₹37.50 लाख में तय हुआ। सौदे के तहत शिकायतकर्ता का मौजूदा 780 वर्ग फुट का फ्लैट ₹17.50 लाख में देने तथा शेष ₹20 लाख का भुगतान करने की बात तय हुई।

शिकायत में बताया गया है कि 19 अगस्त 2023 को ₹50,000, इसके बाद 21 अगस्त 2023 को ₹5.50 लाख और 1 नवंबर 2023 को कुल ₹10 लाख विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से रजनी रामसिंधानी को भुगतान किए गए। इस प्रकार फ्लैट सौदे के लिए कुल ₹16 लाख की बैंकिंग लेनदेन का उल्लेख शिकायत में किया गया है। इसके अलावा, शिकायतकर्ता के पुराने फ्लैट के बदले ₹17.50 लाख का सौदा भी किया गया था।

रजिस्ट्रेशन के बाद भी नहीं मिला कब्जा

शिकायत के अनुसार, 7 नवंबर 2023 को शिकायतकर्ता, उनकी पत्नी और बेटे के नाम पर सेवन हेवन के फ्लैट नंबर 301 का पंजीकरण कराया गया। रजिस्ट्रेशन के समय कथित तौर पर 15 महीने के भीतर फ्लैट का कब्जा देने का आश्वासन दिया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि तय अवधि बीतने के बावजूद इमारत का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ और उन्हें फ्लैट का कब्जा भी नहीं मिला।

जब शिकायतकर्ता ने बार-बार फ्लैट के बारे में जानकारी मांगी, तो कथित तौर पर उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि उनका पैसा डेवलपर मनोज पंजवानी को दिया जा चुका है और उनसे संपर्क किया जाए।

दो एजेंटों को ब्रोकरेज देने का भी आरोप

शिकायत में मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी और सुनील चुन्नीलाल लालवानी पर भी ब्रोकरेज के नाम पर ₹1-1 लाख लेने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, थावरानी को ₹1 लाख Google Pay के माध्यम से तथा सुनील लालवानी को ₹1 लाख नकद दिए गए।

चार लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत

अनिल मंगतानी ने अपनी शिकायत में रजनी अर्जुनदास रामसिंधानी, मनोज कुल्लूमल पंजवानी, मनोजकुमार गोरघनदास थावरानी और सुनील चुन्नीलाल लालवानी को नामजद किया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि चारों ने कथित रूप से आपसी मिलीभगत कर उनका विश्वास हासिल किया और फ्लैट सौदे के नाम पर धनराशि प्राप्त करने के बाद न तो निर्धारित फ्लैट का कब्जा दिया और न ही उनका पैसा वापस किया।

शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले में कुल ₹35.50 लाख की आर्थिक धोखाधड़ी एवं गबन का आरोप लगाया है। मामले में पुलिस द्वारा शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच की जा रही है। आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।