BREAKING NEWS
national

Slider

national

Slider Right

Maharashtra

उल्हासनगर

Ulhasnagar/block-2

कल्याण-डोंबिवली

Kalyan-Dombivli/block-2

ठाणे

Thane/block-3

क्राइम

Crime/block-7

महाराष्ट्र

Maharashtra/block-8

मुंबई

Mumbai/block-9

मनोरंजन

entertainment/block-4

राष्ट्रीय खबर

national/block-1

खेल

sports/block-6

बिजनेस

Business/block-6

लाइफस्टाइल

lifestyle/block-5

सियासत

politics

Latest Articles

उल्हासनगर के रिहायशी इलाकों में छोटे कारखानों के संचालन पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बीच उल्हासनगर-5 जींस मार्केट, उल्हासनगर-2 समेत अन्य क्षेत्रों में भूमि उपयोग और वैध अनुमतियों की जांच की मांग।


उल्हासनगर: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

आवासीय क्षेत्रों में स्वीकृत उपयोग के विपरीत व्यावसायिक अथवा औद्योगिक गतिविधियों के संचालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और मौजूदा नगर नियोजन नियमों की पृष्ठभूमि में अब उल्हासनगर में भी इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। शहर के विभिन्न हिस्सों में आवासीय परिसरों के भीतर छोटे सिलाई कारखाने, जींस से संबंधित कामकाज तथा अन्य प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने की चर्चा सामने आती रही है।

विशेष रूप से उल्हासनगर-5 के जींस मार्केट, उल्हासनगर-2 तथा शहर के अन्य इलाकों में छोटे स्तर पर सिलाई एवं अन्य प्रकार के उत्पादन/व्यावसायिक कार्य संचालित होने की बात कही जाती रही है। हालांकि, किसी विशेष परिसर या प्रतिष्ठान के संबंध में यह निष्कर्ष निकालने से पहले उसके स्वीकृत भूमि उपयोग, मंजूर नक्शे, जोनिंग तथा संबंधित विभागों से प्राप्त अनुमतियों की आधिकारिक जांच आवश्यक है।

क्या Residential Property में Commercial या Industrial Activity की अनुमति है?

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन परिसरों का मूल या स्वीकृत उपयोग आवासीय है, वहां संचालित होने वाली व्यावसायिक अथवा उत्पादन संबंधी गतिविधियों के लिए क्या सक्षम प्राधिकरण से आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई है?

क्या संबंधित परिसरों में Change of User की अनुमति ली गई है? क्या वहां संचालित गतिविधि स्थानीय Development Plan और लागू Development Control Regulations के अनुरूप है? क्या संबंधित प्रतिष्ठानों के पास आवश्यक लाइसेंस अथवा अन्य वैधानिक अनुमतियां उपलब्ध हैं?

इन सवालों का जवाब केवल स्थल निरीक्षण से नहीं, बल्कि महानगरपालिका के आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वीकृत दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।

उल्हासनगर में व्यापक सर्वे की जरूरत?

यदि किसी आवासीय क्षेत्र में स्वीकृत उपयोग से अलग गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो संबंधित महानगरपालिका विभागों द्वारा क्षेत्रवार सर्वेक्षण कर वास्तविक स्थिति सामने लाने की आवश्यकता हो सकती है।

ऐसे सर्वेक्षण में प्रत्येक परिसर के Sanctioned Plan, Occupancy/Completion Certificate, Property Use, Zoning, Trade Licence, Change of User Permission तथा अन्य लागू अनुमतियों की जांच की जा सकती है।

इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-सी गतिविधियां नियमों के तहत अनुमेय हैं और किन मामलों में अतिरिक्त अनुमति अथवा नियमानुसार कार्रवाई की आवश्यकता है।

सिर्फ सिलाई कारखाने ही नहीं, अन्य गतिविधियों की भी जांच का सवाल

यह मुद्दा केवल सिलाई कारखानों तक सीमित नहीं माना जा सकता। यदि आवासीय परिसरों में अन्य प्रकार की उत्पादन इकाइयां, गोदाम, वर्कशॉप अथवा बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो उनके मामले में भी स्वीकृत उपयोग और वास्तविक उपयोग के बीच अंतर की जांच की जा सकती है।

हालांकि, प्रत्येक गतिविधि की वैधानिकता अलग-अलग नियमों और स्थानीय प्रावधानों पर निर्भर करेगी। इसलिए किसी भी प्रतिष्ठान को केवल उसके बाहरी स्वरूप या गतिविधि के आधार पर अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा।

महानगरपालिका से स्पष्टता की अपेक्षा

अब मुख्य सवाल उल्हासनगर महानगरपालिका से जुड़ा है—क्या शहर के आवासीय क्षेत्रों में संचालित छोटे कारखानों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों का कोई व्यापक सर्वेक्षण या रिकॉर्ड-आधारित जांच की गई है? यदि की गई है, तो कितने परिसरों को नियमों के अनुरूप पाया गया और कितने मामलों में नोटिस या अन्य वैधानिक कार्रवाई की गई?

नागरिकों की अपेक्षा है कि इस विषय पर कानून और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर पारदर्शी कार्रवाई की जाए, ताकि वैध रूप से संचालित व्यवसायों और नियमों के विपरीत संचालित गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।

महत्वपूर्ण: किसी भी विशेष क्षेत्र, दुकान, कारखाने या व्यक्ति के संबंध में अवैधता का निष्कर्ष संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, निरीक्षण और सक्षम प्राधिकरण की आधिकारिक कार्रवाई के बिना नहीं निकाला जा सकता। इस संबंध में उल्हासनगर महानगरपालिका की आधिकारिक प्रतिक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।

















अंबरनाथ MIDC में ‘Cluster-2’ की कथित प्लॉटिंग पर सवाल; 400 KV लाइन के सुरक्षा क्षेत्र की जांच की मांग।


अंबरनाथ: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

अंबरनाथ के अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्र स्थित आनंदनगर MIDC परिसर में हाई-वोल्टेज विद्युत लाइन और टावरों के आसपास प्रस्तावित औद्योगिक विकास को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत एवं RTI आवेदन में आरोप लगाया गया है कि 400 KV अतिरिक्त उच्चदाब विद्युत लाइन के कथित सुरक्षा क्षेत्र के आसपास औद्योगिक भूखंडों के आवंटन तथा ‘Cluster-2’ के नाम पर लगभग 100 से 120 प्लॉट विकसित किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

मामले में अब मुख्य सवाल यह है कि संबंधित भूखंडों और प्रस्तावित औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देते समय विद्युत सुरक्षा मानकों, लागू नियमों, स्वीकृत लेआउट और संबंधित NOC की तकनीकी वैधता की जांच किस स्तर पर की गई।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। उपलब्ध शिकायत/RTI मसौदे के आधार पर उठाए गए सवालों का वास्तविक उत्तर संबंधित मंजूरी फाइल, NOC, तकनीकी रिपोर्ट, स्थल निरीक्षण और अधिकृत विभागीय रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

400 KV लाइन के पास 200 वर्ग मीटर भूखंड आवंटन का दावा

शिकायत में दावा किया गया है कि महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) की ओर से M/s Arul Cluster Association को 200 वर्ग मीटर का भूखंड आवंटित किया गया है और इस प्रक्रिया में संबंधित विद्युत प्राधिकरण की NOC का महत्व बताया गया है।

अब यह जांच का विषय है कि उक्त भूखंड 400 KV अतिरिक्त उच्चदाब विद्युत लाइन के Right of Way अथवा निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र के भीतर या उसके निकट आता है या नहीं।

शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि यदि संबंधित क्षेत्र विद्युत सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है, तो NOC जारी करने से पहले क्या प्रत्यक्ष स्थल निरीक्षण किया गया था? क्या वास्तविक सुरक्षा दूरी मापी गई? क्या टावर की स्थिति और विद्युत लाइन का लेआउट स्वीकृत नक्शे से मिलाया गया? और क्या MIDC ने संबंधित NOC का स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन किया?

‘Cluster-2’ में 100 से 120 प्लॉट विकसित करने का आरोप

MIDC के चीफ इंजीनियर प्रकाश चव्हाण को दिए गए एक पत्र में अनिल लक्ष्मण भोईर की ओर से आरोप लगाया गया है कि एन्व्हेंशिया कंपनी के सामने से आर.आर. सर्कल तथा आर.आर. सर्कल से ठाकुरपाड़ा क्षेत्र तक हाई-वोल्टेज विद्युत लाइनों और टावरों के आसपास बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग किए जाने की जानकारी सामने आई है।

पत्र में दावा किया गया है कि ‘Cluster-2’ के नाम पर लगभग 100 से 120 प्लॉट विकसित किए जा रहे हैं और भविष्य में इन पर विभिन्न कंपनियों तथा औद्योगिक निर्माणों की संभावना है।

हालांकि, इस कथित प्लॉटिंग की आधिकारिक मंजूरी, स्वीकृत लेआउट, भूखंडों की वास्तविक संख्या और विद्युत सुरक्षा मानकों के अनुपालन की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

ऐसे में प्रमुख सवाल है कि यदि यह प्लॉटिंग अधिकृत है तो उसका स्वीकृत लेआउट क्या है और क्या उसे मंजूरी देते समय 400 KV लाइन के सुरक्षा क्षेत्र को ध्यान में रखा गया था?

GNP परियोजना पर भी उठे सवाल, लेकिन आरोपों की पुष्टि बाकी

मामले में GNP कंपनी, निखिल लटके और उदय ढाले की कथित भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में यह आरोप लगाया गया है कि संबंधित परियोजना को मंजूरी दिलाने में इनकी भूमिका रही तथा कुछ MIDC अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मंजूरी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

हालांकि, यह एक गंभीर आरोप है और बिना आधिकारिक रिकॉर्ड या जांच के इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

इसलिए अब जांच के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि—

- GNP परियोजना का प्रस्ताव किस संस्था या व्यक्ति ने प्रस्तुत किया?

- परियोजना की जांच किन अधिकारियों ने की?

- निखिल लटके और उदय ढाले की आधिकारिक भूमिका क्या थी?

- क्या उनके नाम किसी फाइल, प्रस्ताव, बैठक, अनुशंसा या मंजूरी रिकॉर्ड में दर्ज हैं?

- परियोजना को मंजूरी देते समय विद्युत सुरक्षा से संबंधित कौन-सी तकनीकी रिपोर्ट उपलब्ध थी?

- अंतिम मंजूरी किस अधिकारी ने और किस आधार पर दी?

इन सवालों का उत्तर संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।

‘MIDC अधिकारियों की मिलीभगत’ के आरोप की भी होगी दस्तावेजों से जांच

शिकायत में MIDC अधिकारियों की कथित मिलीभगत से परियोजना को मंजूरी देने का आरोप लगाया गया है। लेकिन किसी अधिकारी की भूमिका या कथित मिलीभगत स्थापित करने के लिए केवल शिकायत अथवा आरोप पर्याप्त नहीं हैं।

इसके लिए पूरी फाइल की जांच आवश्यक होगी—मसलन प्रस्ताव किस स्तर से शुरू हुआ, किस अधिकारी ने परीक्षण किया, किस तकनीकी विभाग ने रिपोर्ट दी, NOC किस अधिकारी ने स्वीकार की, स्थल निरीक्षण किसने किया और अंतिम मंजूरी किस स्तर पर दी गई।

यदि फाइल रिकॉर्ड में नियमों के अनुरूप प्रक्रिया का पालन पाया जाता है, तो प्रशासन की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि दस्तावेजों में गंभीर विसंगति या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित जिम्मेदारी तय करने का आधार बन सकता है।

RTI के जरिए मांगे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज

इस मामले में RTI के माध्यम से कथित रूप से पूरी मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज हासिल करने का प्रयास किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से—

- M/s Arul Cluster Association द्वारा प्रस्तुत NOC की प्रमाणित प्रति

- NOC के सत्यापन से संबंधित रिपोर्ट और फाइल नोटिंग

- भूखंड आवंटन की पूरी नोटशीट और मंजूरी फाइल

- संबंधित अधिकारियों की टिप्पणियां एवं अनुमोदन

- 24 नवंबर 2023 की बैठक के मिनट्स एवं रेजोल्यूशन

- Arul Cluster Association का पंजीकरण, संविधान और पदाधिकारियों की जानकारी

- सुरक्षा क्षेत्र में भूखंड आवंटन से संबंधित MIDC नियम, सरकारी आदेश एवं नीतिगत प्रावधान

- संबंधित लेआउट एवं तकनीकी दस्तावेज

- स्थल निरीक्षण और सुरक्षा जांच रिपोर्ट

मांगी गई हैं।

इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मंजूरी प्रक्रिया वास्तव में किस आधार पर पूरी की गई थी।

NOC की वैधता से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका तकनीकी आधार

इस पूरे मामले में NOC सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक बनकर सामने आ रही है।

सिर्फ NOC मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी आवश्यक है कि NOC किस अधिकारी ने जारी की, कब जारी की गई, किस स्थल निरीक्षण के आधार पर जारी हुई और क्या उस समय वास्तविक सुरक्षा दूरी का तकनीकी परीक्षण किया गया था।

विशेष रूप से यह जांच जरूरी होगी कि—

क्या टावर की वास्तविक स्थिति का सर्वे किया गया था?

क्या विद्युत लाइन की स्थिति और प्रस्तावित निर्माण के बीच दूरी मापी गई थी?

क्या स्वीकृत लेआउट में विद्युत सुरक्षा क्षेत्र दर्शाया गया है?

क्या संबंधित विद्युत प्राधिकरण की तकनीकी सहमति उपलब्ध है?

और क्या MIDC ने NOC का स्वतंत्र सत्यापन किया?

400 KV लाइन के सुरक्षा कॉरिडोर पर तकनीकी जांच जरूरी

शिकायत में Central Electricity Authority (CEA) Regulations, 2022 और संबंधित भारतीय मानकों का हवाला दिया गया है। मसौदे में 400 KV ट्रांसमिशन लाइन के संदर्भ में लगभग 46 से 52 मीटर के Right of Way/सुरक्षा कॉरिडोर का उल्लेख भी किया गया है।

हालांकि, वास्तविक लागू सुरक्षा दूरी केवल किसी एक आंकड़े के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती। यह संबंधित तकनीकी परिस्थितियों, टावर की संरचना, लाइन की व्यवस्था और उस समय लागू आधिकारिक नियमों के अनुसार संबंधित सक्षम तकनीकी प्राधिकरण द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

इसलिए इस मामले में कागजी दावे के बजाय संयुक्त स्थल सर्वेक्षण और आधिकारिक तकनीकी माप अधिक निर्णायक साबित होंगे।

BCC जारी करने से पहले संयुक्त स्थल निरीक्षण की मांग

अनिल भोईर की ओर से दिए गए पत्र में निर्माणों को Building Completion Certificate (BCC) देने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।

मांग की गई है कि कार्यकारी अभियंता, अंबरनाथ; चीफ इंजीनियर, अंधेरी तथा संबंधित विद्युत विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त स्थल निरीक्षण किया जाए।

इसके बाद—

1. विद्युत लाइन और टावर से वास्तविक दूरी मापी जाए।

2. स्वीकृत लेआउट से मौके की स्थिति का मिलान किया जाए।

3. संबंधित NOC की तकनीकी जांच की जाए।

4. सुरक्षा मानकों के अनुपालन की रिपोर्ट तैयार की जाए।

5. रिपोर्ट के आधार पर ही BCC पर आगे निर्णय लिया जाए।

“BCC जरूरी है या मजदूरों की सुरक्षा?”—उठाया गया सवाल

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि औद्योगिक विकास और रोजगार का विरोध नहीं है, लेकिन विकास के साथ श्रमिकों और आम नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पत्र में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि हाई-वोल्टेज लाइन के आसपास निर्माण कार्य चल रहे हैं तो किसी संभावित दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी।

इसी संदर्भ में पत्र का संदेश है कि कागजी मंजूरी, NOC या BCC किसी दुर्घटना के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते।

इसलिए मांग की गई है कि पहले वास्तविक सुरक्षा स्थिति का तकनीकी सत्यापन किया जाए और उसके बाद ही निर्माण संबंधी प्रमाणपत्रों पर निर्णय लिया जाए।

अनधिकृत प्लॉटिंग या नियम उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई की मांग

शिकायत में यह भी मांग की गई है कि यदि जांच में अनधिकृत प्लॉटिंग, नियम-विरुद्ध निर्माण अथवा विद्युत सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित भू-स्वामियों, डेवलपर्स, कंपनियों अथवा जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

यदि पहले से कोई NOC, लाइसेंस अथवा BCC जारी किया गया है, तो उसके आधार, निरीक्षण रिपोर्ट और तकनीकी अनुमोदन भी सार्वजनिक किए जाने की मांग की गई है।

दस्तावेज गलत पाए जाने पर कार्रवाई की मांग, लेकिन अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं

शिकायत के मसौदे में यह भी कहा गया है कि यदि जांच के दौरान कोई दस्तावेज फर्जी, गलत अथवा गलत जानकारी के आधार पर प्राप्त किया गया पाया जाता है, तो लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए।

लेकिन वर्तमान उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी दस्तावेज के आधिकारिक रूप से फर्जी घोषित किए जाने या इस संबंध में कोई अपराध सिद्ध होने की पुष्टि नहीं है।

इसलिए फिलहाल इसे केवल जांच की मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

15 दिनों में Action Taken Report की मांग

अनिल भोईर के पत्र में मामले की विस्तृत जांच कर 15 दिनों के भीतर लिखित Action Taken Report देने की मांग की गई है।

साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि संयुक्त स्थल निरीक्षण और सुरक्षा सत्यापन के बिना BCC देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है, तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा।

अब प्रशासन के सामने छह बड़े सवाल

इस पूरे मामले में दस्तावेज सामने आने तक निम्न सवाल महत्वपूर्ण बने हुए हैं—

1. ‘Cluster-2’ की आधिकारिक स्थिति और मंजूरी क्या है?

2. लगभग 100 से 120 प्लॉट की कथित प्लॉटिंग किस स्वीकृत लेआउट के आधार पर की गई है?

3. 400 KV विद्युत लाइन और प्रस्तावित निर्माणों के बीच वास्तविक सुरक्षा दूरी कितनी है?

4. संबंधित NOC किस स्थल निरीक्षण और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर जारी की गई?

5. GNP परियोजना की मंजूरी में किन अधिकारियों ने फाइल की जांच की और अंतिम मंजूरी किस स्तर पर दी गई?

6. निखिल लटके और उदय ढाले की परियोजना में आधिकारिक भूमिका क्या थी?

RTI से सामने आएगी मंजूरी प्रक्रिया की पूरी तस्वीर?

अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका RTI से मिलने वाले दस्तावेजों की हो सकती है।

राजनीतिक आरोप, शिकायतें या मौखिक दावे अपनी जगह हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति का आकलन मूल फाइल, नोटशीट, NOC, तकनीकी रिपोर्ट, स्वीकृत लेआउट, बैठक के प्रस्ताव और स्थल निरीक्षण रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।

यदि सभी मंजूरियां नियमानुसार हुई हैं, तो संबंधित प्रशासन के पास दस्तावेजों के जरिए स्थिति स्पष्ट करने का अवसर होगा। दूसरी ओर, यदि दस्तावेजों में नियमों के उल्लंघन, विसंगतियां या सुरक्षा संबंधी कमियां सामने आती हैं, तो आगे की जांच और जिम्मेदारी तय करने का आधार भी तैयार हो सकता है।

निष्कर्ष: औद्योगिक विकास जरूरी, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं

अंबरनाथ MIDC में औद्योगिक विकास रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन हाई-वोल्टेज विद्युत लाइन और टावरों के आसपास प्रस्तावित निर्माण के मामले में सार्वजनिक एवं श्रमिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

‘Cluster-2’ की कथित प्लॉटिंग से लेकर 400 KV विद्युत कॉरिडोर, NOC, भूखंड आवंटन, GNP परियोजना और BCC तक—हर स्तर पर दस्तावेजी और तकनीकी सत्यापन आवश्यक दिखाई देता है।

इस पूरे प्रकरण में फिलहाल किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने के बजाय यह जरूरी है कि MIDC और संबंधित विद्युत प्राधिकरण संयुक्त स्थल निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें और RTI के माध्यम से मांगे गए रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं।

आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि फाइल पर मंजूरी किसने दी, बल्कि यह भी है कि क्या मौके पर वास्तविक सुरक्षा मानकों का पालन हुआ?

कागज पर मंजूरी महत्वपूर्ण है या मजदूरों की सुरक्षा—इसका जवाब अब दस्तावेजों, तकनीकी जांच और प्रत्यक्ष स्थल निरीक्षण से ही सामने आना चाहिए।

















अंबरनाथ में दो युवकों से तलवारें मिलने का पुलिस का दावा; मनाही आदेश उल्लंघन का केस दर्ज, नोटिस देकर रिहाई पर सवाल—कार्रवाई में कथित खानापूर्ति को लेकर चर्चा तेज।


(फाइल इमेज) 

अंबरनाथ: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

अंबरनाथ पूर्व के शिवाजीनगर पुलिस थाना क्षेत्र में दो युवकों के कब्जे से लोहे की तलवारें बरामद किए जाने का मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई 5 अक्टूबर 2026 को हनुमान नगर चौक, समर्थ रिक्शा स्टैंड के पास, कानसाई-ओम दर्शन अपार्टमेंट परिसर के आसपास की गई।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, मामले में सिद्धेश हेमंत शिंदे (21) और अनिकेत अशोक कसारे (29) के खिलाफ अपराध क्रमांक I-425/2026 दर्ज किया गया है। मामला भारतीय हथियार कानून की धारा 4 व 25, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(5) तथा महाराष्ट्र पुलिस कानून की धारा 37(1) और 135 के तहत दर्ज किए जाने का उल्लेख दस्तावेज़ में है।

दो तलवारें जब्त किए जाने का उल्लेख

पुलिस द्वारा दर्ज विवरण के अनुसार, आरोपियों के कब्जे से दो लोहे की तलवारें बरामद की गईं। इनमें एक तलवार की अनुमानित कीमत ₹350 और दूसरी की ₹250 बताई गई है। दोनों तलवारों की कुल अनुमानित कीमत ₹600 दर्ज की गई है।

दस्तावेज़ के अनुसार, पहली तलवार की कुल लंबाई करीब 33 इंच और दूसरी की करीब 31 इंच बताई गई है। पुलिस रिकॉर्ड में दोनों हथियारों का विस्तृत माप भी दर्ज किया गया है।

मनाही आदेश लागू होने के दौरान हथियार रखने का आरोप

पुलिस के अनुसार, ठाणे शहर के पुलिस उपायुक्त (विशेष शाखा) द्वारा 28 सितंबर 2026 को जारी मनाही आदेश के तहत 2 अक्टूबर 2026 से 16 अक्टूबर 2026 तक तलवार, भाला, बंदूक, लाठी अथवा अन्य खतरनाक हथियार रखने पर प्रतिबंध लागू था।

पुलिस रिकॉर्ड में आरोप है कि इसी मनाही आदेश के प्रभावी रहने के दौरान दोनों युवकों के पास तलवारें पाई गईं। इसी आधार पर संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

BNSS 35(3) के तहत नोटिस

महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध पुलिस दस्तावेज़ के अनुसार दोनों आरोपियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि पुलिस ने जांच में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए नोटिस जारी किया है। यह अपने-आप में दोष सिद्ध होने या अंतिम न्यायिक निष्कर्ष का प्रमाण नहीं है।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, मामले की जांच सहायक पुलिस निरीक्षक राजकुमार नरुटे कर रहे हैं। घटनास्थल का दौरा पुलिस अधिकारी, डी.बी. स्टाफ तथा बीट मार्शल के कर्मचारियों द्वारा किए जाने का भी उल्लेख दस्तावेज़ में है।

मामले में ई-साक्ष्य संकलित कर लिंक किए जाने की जानकारी भी पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है।

नोट: यह समाचार उपलब्ध पुलिस दस्तावेज़ में दर्ज जानकारी पर आधारित है। आरोपों और पुलिस के दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होगी। संबंधित आरोपियों का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना उचित होगा।

















गारमेंट व्यापारियों के संगठन UGMA का 70वां वार्षिक उत्सव, तीन दिनों तक होंगे विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम।



 



उल्हासनगर: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

उल्हासनगर गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (UGMA) की ओर से संगठन के 70वें वार्षिक उत्सव के अवसर पर पूज्य चालिहा साहिब मंदिर, उल्हासनगर-5 में तीन दिवसीय अखंड पाठ साहिब का आयोजन किया जा रहा है। आयोजन को लेकर एसोसिएशन की ओर से दुकानदारों एवं व्यापारी भाइयों से इसमें सहभागी होकर सेवा कार्य में सहयोग करने और प्रसाद ग्रहण करने की अपील की गई है।

पोस्टर के अनुसार, कार्यक्रम की शुरुआत सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजे पूज्य चालिहा साहिब मंदिर में होगी। इस अवसर पर अखंड पाठ साहिब का आरंभ साई कालीराम साहिब (वसण शाह दरबार वाले) द्वारा किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके बाद प्रसाद एवं आम भंडारे का आयोजन रहेगा तथा रात में भी भंडारा जारी रहने की जानकारी दी गई है।

मंगलवार, 6 अक्टूबर को सुबह 11 बजे कन्याओं के भोजन की व्यवस्था रखी गई है। इसके पश्चात प्रसाद एवं भंडारे का आयोजन जारी रहेगा।

वहीं बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजे अखंड पाठ साहिब का भोग साई कालीराम साहिब द्वारा किए जाने का कार्यक्रम निर्धारित बताया गया है। इसके बाद उपस्थित दुकानदार भाइयों के लिए भोजन प्रसाद की व्यवस्था किए जाने की जानकारी पोस्टर में दी गई है।

UGMA की ओर से जारी कार्यक्रम सूचना में 5 और 6 अक्टूबर की रात विशेष खीर (खीरनी) का प्रसाद ग्रहण करने का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही व्यापारी भाइयों से अपनी यथाशक्ति के अनुसार सेवा कार्य में सहयोग करने की अपील की गई है।

एसोसिएशन की ओर से जारी संदेश में सभी दुकानदार भाइयों से तीनों दिन कार्यक्रम में उपस्थित होकर सेवा कार्य में सहभागी बनने, गुरु साहिब का आशीर्वाद लेने तथा भोजन-प्रसाद ग्रहण करने का अनुरोध किया गया है।

स्थान: पूज्य चालिहा साहिब मंदिर, उल्हासनगर-5

दिनांक: 5, 6 एवं 7 अक्टूबर 2026

आयोजक: उल्हासनगर गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (UGMA)

बताया जाता है कि गोपी वाधवानी, किशन गंगवानी, बाबू ताराचंदानी, नरेश अमरलाल मास्टर तथा उनके कुछ साथियों और दुकानदारों द्वारा मिलकर यह गतिविधि की जाती रही हैं।

नोट: कार्यक्रम से संबंधित उपरोक्त विवरण आयोजक संस्था द्वारा जारी पोस्टर/सूचना के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।


















‘बंशी-बिर्जू’ नाम से चर्चित कथित जुआ अड्डे पर पुलिस की कार्रवाई? अंबरनाथ शिवाजीनगर थाने के रिकॉर्ड में 7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज।


 

अंबरनाथ: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

अंबरनाथ पूर्व के शिवाजीनगर पुलिस थाना क्षेत्र में कथित मटका-जुआ गतिविधि के खिलाफ पुलिस द्वारा कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 4 अक्टूबर 2026 को शिवाजी चौक के पास, समुद्र बार के बगल की एक दुकान में कार्रवाई की गई। इस मामले में महाराष्ट्र जुआ प्रतिबंध अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत अपराध क्रमांक 424/2026 दर्ज किया गया है।

पुलिस दस्तावेज के मुताबिक, कार्रवाई के दौरान कुल ₹14,200 नकद तथा मटका-जुआ से संबंधित बताई गई सामग्री बरामद की गई। मामले में सात व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं। पुलिस के अनुसार इनमें कुछ व्यक्तियों पर जुआ खिलाने तथा अन्य पर जुआ खेलने के लिए मौजूद होने का आरोप है। सभी संबंधित आरोपियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिए जाने की जानकारी दस्तावेज में दर्ज है।

दो व्यक्तियों पर जुआ खिलाने का आरोप

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी क्रमांक 1 धरम रूपलाल गौर के कब्जे से ₹5,100 नकद तथा जुआ खेलने में इस्तेमाल होने वाली बताई गई सामग्री बरामद हुई। वहीं आरोपी क्रमांक 2 नादिर निअमतउल्ला खान के कब्जे से ₹4,300 नकद और मटका-जुआ से संबंधित बताई गई एक चकरी तथा अन्य सामग्री बरामद होने का उल्लेख है।

इसके अलावा सबीर हबीब शेख, अमर श्रीपति काले, मुरलीधर सुकण्या पाटिल, आकम अलीहुसैन शेख और संजय बाबू गरड के कब्जे से अलग-अलग रकम बरामद किए जाने की जानकारी पुलिस दस्तावेज में दी गई है।

कुल ₹14,200 की बरामदगी

दस्तावेज के अनुसार बरामद नकदी का विवरण इस प्रकार है:

- धरम रूपलाल गौर — ₹5,100

- नादिर निअमतउल्ला खान — ₹4,300

- आकम अलीहुसैन शेख — ₹1,350

- सबीर हबीब शेख — ₹1,200

- अमर श्रीपति काले — ₹900

- मुरलीधर सुकण्या पाटिल — ₹750

- संजय बाबू गरड — ₹600

कुल बरामदगी — ₹14,200।

पुलिस रिकॉर्ड में जुआ खेलने-खिलाने से संबंधित सामग्री, जिसमें पासे/गुड़गुड़ी, चकरी, अंक वाले प्लास्टिक बैनर और अन्य सामान शामिल होने का उल्लेख है। मामले में ई-साक्ष्य भी प्राप्त किए जाने की जानकारी दर्ज है।

वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी का भी उल्लेख

पुलिस दस्तावेज के अनुसार, घटनास्थल का दौरा करने वाले अधिकारियों में शिवाजीनगर पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रमोद पाटिल, पुलिस निरीक्षक गहिनीनाथ गमे तथा पुलिस उपनिरीक्षक नरूटे का उल्लेख है। घटनास्थल का दौरा 5 अक्टूबर 2026 को रात 00:05 बजे से आगे किए जाने की जानकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।

मामले की प्राथमिक जांच पुलिस उपनिरीक्षक नरूटे द्वारा किए जाने तथा अपराध दर्ज करने की कार्रवाई पुलिस हवलदार एस.एम. सालुंखे द्वारा किए जाने का उल्लेख दस्तावेज में है।

‘बंशी-बिर्जू’ अड्डे से जोड़ने की चर्चा, लेकिन आधिकारिक पुष्टि जरूरी

इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर इसे कथित रूप से ‘बंशी-बिर्जू’ नाम से चर्चित जुआ अड्डे से जोड़कर चर्चा किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। हालांकि, उपलब्ध पुलिस दस्तावेज में ‘बंशी-बिर्जू’ नाम को आरोपी के रूप में दर्ज किए जाने की पुष्टि नहीं होती। इसलिए इस नाम को किसी व्यक्ति या कथित जुआ अड्डे से जोड़कर निष्कर्ष निकालना फिलहाल उचित नहीं होगा।

इसी तरह, यह दावा कि संबंधित गतिविधि “वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक की नाक के नीचे” चल रही थी, एक आरोप/दावा है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। पुलिस रिकॉर्ड में वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रमोद पाटिल का घटनास्थल पर दौरा किए जाने का उल्लेख जरूर है।

आगे की जांच पर नजर

मामले में पुलिस द्वारा बरामद सामग्री, नकदी और ई-साक्ष्य के आधार पर आगे की जांच की जा रही है। कार्रवाई के पीछे कथित जुआ नेटवर्क का दायरा क्या था, क्या इसके पीछे कोई अन्य व्यक्ति या संगठित तंत्र सक्रिय था और ‘बंशी-बिर्जू’ नाम से की जा रही चर्चाओं का वास्तविकता से कोई संबंध है या नहीं—इन सभी सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

मंत्रालय टाइम्स की ओर से स्पष्ट किया जाता है कि इस समाचार में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा रहा है। संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध मामला दर्ज होना और आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। अंतिम निष्कर्ष सक्षम न्यायालय और जांच प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगा।

















अंबरनाथ के शिवजी नगर पुलिस स्टेशन के आहते से जब्त ट्रक ले जाने की कथित कोशिश! मौके पर पकड़े जाने के बाद कार्रवाई को लेकर उठे सवाल.!


अंबरनाथ: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

अंबरनाथ पूर्व के शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा में है। सरकारी पानी की पाइपों की कथित चोरी के मामले में जब्त किए गए ट्रक को पुलिस स्टेशन परिसर से बाहर ले जाने की कोशिश किए जाने के आरोप सामने आए हैं। दावा है कि यह प्रयास दिनदहाड़े किया गया और संबंधित व्यक्ति को मौके पर पकड़ भी लिया गया। हालांकि, उसके खिलाफ बाद में क्या कानूनी कार्रवाई की गई, इसे लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 1 अक्टूबर की शाम शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन के परिसर में खड़े सरकारी पानी की पाइपों से लदे जब्त ट्रक को कथित रूप से बाहर ले जाने का प्रयास किया गया। आरोप है कि संबंधित व्यक्ति ने किसी अधिकारी का नाम लेकर पुलिस पर प्रभाव डालने की कोशिश की। सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रमोद पाटील ने मौके पर पहुंचकर संबंधित व्यक्ति को पकड़ लिया।

हालांकि, इस कथित घटना के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ रॉबरी, चोरी के माल को हटाने के प्रयास अथवा अन्य लागू कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया या नहीं, इसे लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। इसी वजह से पुलिस की कार्रवाई और पूरे घटनाक्रम की जांच को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

27 सितंबर को कथित चोरी के मामले में ट्रक जब्त

इस मामले की पृष्ठभूमि 27 सितंबर की रात से जुड़ी बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, अंबरनाथ पूर्व क्षेत्र से सरकारी पानी की पाइपों की कथित चोरी के मामले में एक व्यक्ति को पुलिस ने पकड़ा था। एसीपी शैलेश काळे के मार्गदर्शन में पीएसआई केशव हसगोले की टीम द्वारा कार्रवाई किए जाने और पाइपों से लदे MH-01-EW-4252 नंबर के ट्रक को कब्जे में लेकर शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन परिसर में जमा किए जाने की जानकारी सामने आई है।

बताया जा रहा है कि ट्रक में मौजूद सामग्री की जांच तथा उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर पुलिस द्वारा पड़ताल की जा रही थी। ऐसे में जांच के दायरे में मौजूद वाहन को पुलिस स्टेशन परिसर से बाहर ले जाने की कथित कोशिश ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

BNSS की धारा 35(1)(e) का भी उल्लेख

मामले से जुड़ी जानकारी में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35(1)(e) का भी उल्लेख किया जा रहा है। इस प्रावधान के तहत पुलिस को ऐसी स्थिति में बिना वारंट कार्रवाई करने का अधिकार हो सकता है, जब किसी व्यक्ति के कब्जे में ऐसी वस्तु पाए जाने का उचित संदेह हो जो चोरी की संपत्ति हो।

हालांकि, इस प्रावधान का वास्तविक अनुप्रयोग मामले के उपलब्ध तथ्यों, पुलिस की जांच और संबंधित कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए इस मामले में धारा 35(1)(e) के तहत हुई कार्रवाई और उसके बाद की प्रक्रिया की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

जब्त ट्रक को पर्सनल बॉण्ड पर छोड़े जाने की भी चर्चा

मामले में यह भी दावा किया जा रहा है कि जांच के दौरान न्यायालय के समक्ष संबंधित आवेदन प्रस्तुत किया गया था और जब्त ट्रक को जांच के दायरे में रखा गया था। इसके बावजूद बाद में ट्रक को पर्सनल बॉण्ड पर छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है।

यदि ऐसा हुआ है, तो ट्रक को किस आदेश, किस प्रक्रिया और किन शर्तों के आधार पर छोड़ा गया, यह स्पष्ट होना आवश्यक है। साथ ही, पुलिस स्टेशन परिसर से उसी वाहन को दोबारा बाहर ले जाने के कथित प्रयास की स्थिति में पुलिस ने क्या कार्रवाई की, यह भी जांच का विषय हो सकता है।

₹1.70 लाख के कथित लेन-देन का आरोप

इस पूरे प्रकरण के बीच एक व्यक्ति द्वारा कथित तौर पर ₹1.70 लाख लिए जाने और बाद में रकम वापस किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। हालांकि, इस कथित आर्थिक लेन-देन की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

ऐसे आरोपों की सत्यता निर्धारित करने के लिए संबंधित व्यक्तियों के बयान, आर्थिक लेन-देन के रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल—पुलिस स्टेशन परिसर में सुरक्षा और जब्त माल की निगरानी पर

यदि पुलिस स्टेशन परिसर में जब्त वाहन को वास्तव में बाहर ले जाने का प्रयास किया गया था, तो यह केवल एक व्यक्ति की कथित हरकत तक सीमित मामला नहीं माना जा सकता। इससे जब्त संपत्ति की सुरक्षा, पुलिस स्टेशन की निगरानी व्यवस्था, सीसीटीवी रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी जैसे सवाल भी उठते हैं।

साथ ही यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि कथित प्रयास में कौन-कौन लोग शामिल थे, वाहन को बाहर ले जाने का उद्देश्य क्या था और घटना के बाद पुलिस ने कौन-सी कानूनी कार्रवाई की।

डीसीपी स्तर पर जांच की मांग

घटना से जुड़े आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अब निगाहें उल्हासनगर जोन-4 के डीसीपी सचिन गोरे की ओर हैं। यदि आरोपों में तथ्यात्मक आधार है, तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि जब्त वाहन को पुलिस स्टेशन परिसर से बाहर ले जाने का प्रयास कैसे हुआ और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

अब बड़ा सवाल यही है—पुलिस स्टेशन परिसर में जब्त वाहन को बाहर ले जाने की कथित कोशिश के मामले में आखिर आधिकारिक तौर पर क्या कार्रवाई हुई?





















उल्हासनगर के क्रिकेट टर्फ ग्राउंड को लेकर शिकायतें; कथित सट्टा-जुआ और बिजली चोरी के आरोप, प्रशासन की कार्रवाई का इंतजार।


उल्हासनगर: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

उल्हासनगर में संचालित कुछ क्रिकेट टर्फ ग्राउंड को लेकर स्थानीय स्तर पर गंभीर शिकायतें और सवाल सामने आने की जानकारी मिल रही है। टर्फ ग्राउंड के संचालन, आवश्यक अनुमतियों और व्यावसायिक गतिविधियों के साथ-साथ वहां कथित रूप से सट्टा-जुआ जैसी गतिविधियां चलने तथा बड़े पैमाने पर बिजली के अनधिकृत उपयोग की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है।

हालांकि, इन शिकायतों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए मामले में किसी व्यक्ति, संस्था या टर्फ ग्राउंड संचालक को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। शिकायतों की वास्तविकता संबंधित पुलिस प्रशासन, महानगरपालिका और बिजली वितरण कंपनी की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

सट्टा और जुआ को लेकर क्या है शिकायत?

स्थानीय स्तर पर सामने आ रही शिकायतों में दावा किया जा रहा है कि कुछ टर्फ ग्राउंड में क्रिकेट खेलने की गतिविधियों के अलावा कथित तौर पर सट्टेबाजी अथवा जुए से जुड़ी गतिविधियां भी संचालित हो सकती हैं।

यदि ऐसी गतिविधियों की शिकायत पुलिस प्रशासन के पास प्राप्त हुई है, तो मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायतों में कितनी वास्तविकता है। जांच में यदि किसी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि सामने आती है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

बिजली के कथित अनधिकृत उपयोग पर भी सवाल

इसी के साथ कुछ टर्फ ग्राउंड में बड़े पैमाने पर बिजली के कथित अनधिकृत उपयोग अथवा बिजली चोरी की शिकायतें भी सामने आने की चर्चा है।

टर्फ ग्राउंड में फ्लडलाइट, अन्य विद्युत उपकरण और रात के समय होने वाली गतिविधियों के कारण बिजली की खपत स्वाभाविक रूप से अधिक हो सकती है। ऐसे में यह जांच का विषय हो सकता है कि वहां वैध विद्युत कनेक्शन, मीटर और संबंधित अनुमति मौजूद है या नहीं तथा बिजली का उपयोग नियमों के अनुसार किया जा रहा है या नहीं।

यदि बिजली चोरी की शिकायत आधिकारिक रूप से प्राप्त हुई है, तो संबंधित बिजली वितरण कंपनी द्वारा मीटर और कनेक्शन की जांच किए जाने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

पुलिस और प्रशासन कब करेगा जांच?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन शिकायतों पर पुलिस प्रशासन, उल्हासनगर महानगरपालिका और संबंधित बिजली विभाग की ओर से कोई निरीक्षण या जांच की जाती है या नहीं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि शिकायतों में तथ्य हैं, तो संबंधित विभागों को नियमानुसार जांच करनी चाहिए और यदि शिकायतें निराधार हैं, तो आधिकारिक स्पष्टीकरण देकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

इसके अलावा टर्फ ग्राउंड के निर्माण, जमीन के उपयोग, व्यावसायिक संचालन, फायर सेफ्टी, आवश्यक परवाने और अन्य लागू नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी भी प्रशासनिक स्तर पर जांच किए जाने की मांग उठ सकती है।

शिकायतों की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

फिलहाल सट्टा-जुआ और बिजली चोरी से संबंधित दावों की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इन शिकायतों को फिलहाल शिकायत और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मंत्रालय टाइम्स का स्पष्ट मत है कि यदि किसी टर्फ ग्राउंड के खिलाफ गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई हैं, तो संबंधित विभागों को निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। जांच में आरोप सही पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई और आरोप गलत पाए जाने पर संबंधित पक्ष को क्लीन चिट—दोनों ही स्थितियों में आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

अब देखना होगा कि पुलिस प्रशासन और संबंधित विभाग इन शिकायतों पर कब संज्ञान लेते हैं और क्रिकेट टर्फ ग्राउंड के संचालन से जुड़े इन सवालों पर क्या कार्रवाई अथवा स्पष्टीकरण सामने आता है।