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उल्हासनगर-5 की प्रतिष्ठित ट्रस्ट पर करोड़ों की संपत्ति में कथित घोटाले का साया, पुणे की बहुमूल्य जमीन कौड़ियों के भाव बेचने के आरोप; फर्जी हस्ताक्षरों से सौदे की भी चर्चा।


(फाइल इमेज)

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित एक प्रतिष्ठित ट्रस्ट इन दिनों गंभीर विवादों के घेरे में है। ट्रस्ट की पुणे स्थित बहुमूल्य जमीन को कथित तौर पर बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत पर बेचने की चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों और स्थानीय नागरिकों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति का सौदा पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया, जिससे ट्रस्ट को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा।

सूत्रों के अनुसार, इस कथित सौदे में ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों, ट्रस्टियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जमीन के दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा दिखाया गया। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो मामला ट्रस्ट प्रशासन में गंभीर अनियमितताओं और धोखाधड़ी का रूप ले सकता है।

बताया जा रहा है कि ट्रस्ट की संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कुछ लोगों का दावा है कि वर्षों से ट्रस्ट की संपत्तियों और वित्तीय मामलों में कथित अनियमितताएं होती रही हैं, लेकिन अब पुणे की जमीन के सौदे ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इससे ट्रस्ट के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां जल्द ही सार्वजनिक हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो ट्रस्ट के कई वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच के दायरे में आने की संभावना है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे ट्रस्ट के अंदरूनी कामकाज पर नया विवाद खड़ा हो सकता है।

हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित ट्रस्ट या आरोपों के घेरे में आए किसी भी व्यक्ति की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि भविष्य में उनका पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।














मुंबई के गोरेगांव नेस्को ड्रग्स केस में बड़ा मोड़: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से जल्द मिल सकते हैं IRS अधिकारी समीर वानखेड़े, आरोपियों पर मकोका लगाने की करेंगे मांग।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

मुंबई के बहुचर्चित गोरेगांव स्थित नेस्को ड्रग्स मामले में जल्द ही बड़ा घटनाक्रम सामने आ सकता है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, IRS अधिकारी समीर वानखेड़े महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर मामले की गंभीरता से अवगत कराने के साथ-साथ आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत कार्रवाई करने का आग्रह कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि वानखेड़े का मानना है कि यदि जांच में यह स्पष्ट होता है कि ड्रग्स तस्करी किसी संगठित गिरोह या आपराधिक नेटवर्क के माध्यम से संचालित की जा रही थी, तो केवल सामान्य कानूनी धाराएं पर्याप्त नहीं होंगी। ऐसे में मकोका के तहत कार्रवाई से पूरे नेटवर्क की आर्थिक और आपराधिक गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा तथा मामले में शामिल सभी लोगों तक जांच का दायरा बढ़ाया जा सकेगा।

बताया जा रहा है कि प्रस्तावित मुलाकात के दौरान नेस्को ड्रग्स केस की जांच की वर्तमान स्थिति, ड्रग्स सिंडिकेट की कार्यप्रणाली, अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की संभावना तथा आगे की कानूनी रणनीति जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।

हालांकि, इस संभावित मुलाकात को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और समीर वानखेड़े की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन यदि यह बैठक होती है और मकोका लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो इसे महाराष्ट्र में संगठित ड्रग्स अपराध के खिलाफ सरकार के कड़े रुख के रूप में देखा जाएगा।

यह मामला पहले से ही काफी चर्चा में है और अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में सरकार और जांच एजेंसियां इस दिशा में क्या निर्णय लेती हैं।













उल्हासनगर के ऐतिहासिक स्विमिंग पूल पर बड़ा विवाद: तय शुल्क ₹51 प्रति घंटा, वसूले जा रहे ₹245? लीज, अतिक्रमण और अनुबंध पर उठे कई गंभीर सवाल।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) की स्वामित्व वाली ऐतिहासिक सार्वजनिक स्विमिंग पूल संपत्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों, समझौते (Agreement), पत्राचार और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया जा रहा है कि स्विमिंग शुल्क, अनुबंध की शर्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, कथित अतिक्रमण तथा लीज संबंधी कई मामलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।

समझौते के अनुसार कितना होना चाहिए स्विमिंग शुल्क?

समझौते के अनुसार वर्ष 2003 में स्विमिंग शुल्क ₹10 प्रति घंटा निर्धारित किया गया था। अनुबंध की शर्तों में यह भी उल्लेख है कि प्रत्येक 5 वर्ष में अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही शुल्क वृद्धि की जा सकती है।

इसी आधार पर शुल्क की गणना इस प्रकार बनती है—

2003 से 2008: ₹10 प्रति घंटा

2008 से 2013: ₹15 प्रति घंटा

2013 से 2018: ₹22.50 प्रति घंटा

2018 से 2023: ₹33.75 प्रति घंटा

2023 से 2028: ₹51 प्रति घंटा

इस गणना के अनुसार वर्तमान अवधि में अधिकतम वैध शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए।

फिर ₹245 प्रति घंटा कैसे वसूला जा रहा है?

आरोप है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब प्रा. लि. द्वारा उल्हासनगर तथा आसपास के नागरिकों से ₹245 प्रति घंटा स्विमिंग शुल्क लिया जा रहा है।

इस संबंध में क्लब के संचालक आसान बालानी द्वारा UMC को दिया गया एक पत्र भी सामने आया है। इस पत्र में दावा किया गया है कि क्लब ₹245 प्रति घंटा शुल्क लेने का पात्र है, हालांकि कम प्रतिसाद (Low Response) और लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से फिलहाल ₹200 प्रति घंटा शुल्क लिया जा रहा है।

शुल्क निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल

दस्तावेजों का अध्ययन करने वाले लोगों का दावा है कि ₹245 प्रति घंटा शुल्क का औचित्य प्रस्तुत करने में कई विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।

आरोपों के अनुसार—

जहाँ समझौते के अनुसार वर्तमान शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए, वहीं पत्र में इसे ₹102 प्रति घंटा दर्शाया गया है।

अनुबंध में लॉकर शुल्क ₹100 प्रति वर्ष निर्धारित है, लेकिन उसे भी शुल्क निर्धारण में अलग तरीके से जोड़कर अधिक राशि दर्शाने का प्रयास किया गया है।

अनुबंध की शर्तों के अनुसार लाइफगार्ड और फर्स्ट एड उपलब्ध कराना ठेकेदार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसके लिए नागरिकों से अलग से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

इन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि महानगरपालिका के समक्ष प्रस्तुत किया गया शुल्क संबंधी स्पष्टीकरण वास्तविक अनुबंध शर्तों से मेल नहीं खाता।

स्विमिंग पूल के सूचना बोर्ड पर भी उठे सवाल

स्विमिंग पूल परिसर में लगे सूचना बोर्ड और उपलब्ध वीडियो के आधार पर भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

बोर्ड के अनुसार—

पुरुषों के लिए केवल 2 घंटे का समय निर्धारित है।

महिलाओं के लिए भी केवल 2 घंटे का समय उपलब्ध है।

बच्चों के लिए कोई स्पष्ट समय-सारणी प्रदर्शित नहीं की गई है।

विजिटर्स से ₹200 प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

प्रत्येक बार एक घंटे की स्विमिंग के लिए डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाना अनिवार्य बताया गया है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्विमिंग स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक गतिविधि है और महानगरपालिका की सार्वजनिक संपत्ति होने के कारण यह सुविधा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक आम जनता के लिए पर्याप्त समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व वाली संपत्ति

यह केवल एक स्विमिंग पूल नहीं, बल्कि उल्हासनगर के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है। बताया जाता है कि 8 अगस्त 1949 को इसी स्थान पर उल्हासनगर शहर की आधारशिला रखी गई थी। ऐसे ऐतिहासिक स्थल के उपयोग और प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।

अतिरिक्त भूमि और कथित अतिक्रमण का मामला

आरोप है कि वर्ष 2014 में महानगरपालिका ने स्विमिंग पूल के पीछे 512 वर्गमीटर अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई थी।

इसके बावजूद यह भी आरोप लगाया गया है कि—

महानगरपालिका के दो कार्यालयों पर बिना अनुमति कब्जा कर वहाँ स्विमिंग पूल का काउंटर बनाया गया।

स्विमिंग पूल के समीप स्थित पुराने ऑक्ट्रॉय नाके की भूमि पर भी कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया।

यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर मामला माना जा सकता है।

कोरोना काल में किराया माफी और अनुबंध विस्तार पर भी सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार महानगरपालिका ने कोरोना काल के दौरान क्लब को दो वर्षों का किराया माफ किया तथा दो वर्षों का अनुबंध विस्तार भी प्रदान किया।

अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि—

क्या महानगरपालिका को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार था?

क्या इसके लिए राज्य शासन की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी?

यदि शासन की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई थी?

2055 तक लीज देने का दावा, जबकि अनुबंध 2044 तक?

सबसे गंभीर प्रश्न 25 सितंबर 2025 को किए गए एक कथित लीज समझौते को लेकर उठाया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब ने महानगरपालिका की इस संपत्ति को सिंघानिया स्कूल को 30 वर्षों के लिए, अर्थात 25 सितंबर 2055 तक, लीज पर देने का समझौता किया।

यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है।

यदि महानगरपालिका के साथ क्लब का अनुबंध केवल वर्ष 2044 तक ही प्रभावी है, तो फिर वह उसी संपत्ति को 2055 तक किसी तीसरे पक्ष को लीज पर कैसे दे सकता है?

क्या इसके लिए महानगरपालिका की अनुमति ली गई थी? यदि ली गई थी, तो किस नियम के तहत? और यदि नहीं, तो ऐसे समझौते की वैधानिक स्थिति क्या होगी?

अब उठ रही है निष्पक्ष जांच की मांग

इन सभी आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद नागरिकों द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। मांग की जा रही है कि स्विमिंग शुल्क निर्धारण, अनुबंध की शर्तों, कथित अतिक्रमण, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, किराया माफी, अनुबंध विस्तार तथा कथित लीज समझौते की विस्तृत जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।













विधायक श्रीकांत भारतीय की पहल रंग लाई, महाराष्ट्र में जल्द आएगी स्वतंत्र ई-स्पोर्ट्स नीति।


 

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र में तेजी से उभर रहे ई-स्पोर्ट्स क्षेत्र को लेकर राज्य सरकार जल्द ही एक स्वतंत्र और व्यापक नीति लेकर आएगी। यह महत्वपूर्ण घोषणा आज महाराष्ट्र विधान परिषद में ई-स्पोर्ट्स विषय पर हुई विस्तृत चर्चा के दौरान की गई। इस घोषणा को राज्य के लाखों युवाओं, डिजिटल उद्यमियों और गेमिंग उद्योग से जुड़े पेशेवरों के लिए एक बड़ी पहल माना जा रहा है।

विधान परिषद में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक श्रीकांत भारतीय ने कहा कि बदलते डिजिटल दौर में ई-स्पोर्ट्स केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक तेजी से विकसित हो रहा पेशेवर और रोजगारपुरक क्षेत्र बन चुका है। उन्होंने राज्य के युवाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए महाराष्ट्र के लिए एक अलग और स्पष्ट ई-स्पोर्ट्स नीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स में अंतर समझना जरूरी

चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण विषय यह भी रहा कि ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। सदन में स्पष्ट किया गया कि ऑनलाइन गेमिंग मुख्य रूप से व्यक्तिगत मनोरंजन और अवकाश से जुड़ी गतिविधि है, जबकि ई-स्पोर्ट्स एक कौशल आधारित, प्रतिस्पर्धात्मक और संगठित पेशेवर क्षेत्र है, जिसमें खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, रणनीति, टीमवर्क और उच्च स्तरीय प्रतिस्पर्धा के आधार पर अवसर प्राप्त होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ई-स्पोर्ट्स को खेल उद्योग का एक नया आयाम माना जा रहा है, जिसे विश्व स्तर पर तेजी से मान्यता मिल रही है। ऐसे में महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य के लिए इस क्षेत्र को संस्थागत समर्थन देना समय की मांग है।

सरकार बनाएगी विशेषज्ञ समिति

चर्चा का उत्तर देते हुए संबंधित मंत्री ने सदन को जानकारी दी कि आगामी अधिवेशन से पहले महाराष्ट्र सरकार ई-स्पोर्ट्स के लिए एक स्वतंत्र नीति की घोषणा करेगी। इसके लिए विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों और संबंधित क्षेत्र के जानकारों की एक समिति गठित की जाएगी।

यह समिति राज्य में ई-स्पोर्ट्स के विकास, खिलाड़ियों को प्रोत्साहन, प्रशिक्षण सुविधाओं, प्रतियोगिताओं के आयोजन, निवेश आकर्षित करने तथा रोजगार सृजन की संभावनाओं पर विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर अंतिम नीति तैयार की जाएगी।

रोजगार और स्टार्टअप के नए अवसर

ई-स्पोर्ट्स उद्योग केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। इसके साथ अनेक सहायक क्षेत्रों का विकास भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में कंटेंट क्रिएशन, लाइव स्ट्रीमिंग, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, इवेंट मैनेजमेंट, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, गेम एनालिटिक्स, साइकोलॉजिकल काउंसलिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और कानूनी परामर्श जैसी सेवाओं में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकते हैं।

राज्य सरकार की प्रस्तावित नीति से न केवल खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि डिजिटल स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी कंपनियों और युवा उद्यमियों के लिए भी नए रास्ते खुल सकते हैं।

महाराष्ट्र को डिजिटल स्पोर्ट्स हब बनाने की दिशा में कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार सुविचारित नीति लागू करती है तो महाराष्ट्र देश में ई-स्पोर्ट्स और डिजिटल प्रतिस्पर्धी खेलों का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे राज्य में निवेश बढ़ेगा, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के आयोजन का मार्ग प्रशस्त होगा और युवाओं को वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा।

विधायक श्रीकांत भारतीय ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पहल महाराष्ट्र के लाखों युवाओं को नई दिशा देने के साथ-साथ राज्य को डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधुनिक खेल संस्कृति के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का काम करेगी।

राज्य सरकार की इस घोषणा को ई-स्पोर्ट्स उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण नीति-निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत माना जा रहा है, जिस पर अब युवाओं और उद्योग जगत की निगाहें टिकी हुई हैं।













भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी 23 कर्मचारी आज भी सेवा में बरकरार! उल्हासनगर मनपा की जवाबदेही कटघरे में, आयुक्त मनीषा आव्हाले से जनता पूछ रही है सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) में प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर में चर्चा का विषय बना एक दावा यह है कि भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ACB) द्वारा विभिन्न मामलों में रंगे हाथों पकड़े गए लगभग 23 कर्मचारी और अधिकारी आज भी महानगरपालिका में कार्यरत हैं। इस मुद्दे ने प्रशासनिक जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारी नीति की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी को ACB ने रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है, तो ऐसे मामलों में विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई समयबद्ध तरीके से होना आवश्यक है। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया लंबित है, जिसके कारण संबंधित अधिकारी-कर्मचारी निर्भय होकर अपने पदों पर कार्य कर रहे हैं।

नागरिकों का सवाल: भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नारा?

शहर के जागरूक नागरिकों का कहना है कि राज्य सरकार और प्रशासन भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात करते हैं, लेकिन यदि रिश्वतखोरी के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी वर्षों तक सेवा में बने रहते हैं, तो इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जाता है।

नागरिकों का सवाल है कि—

ACB द्वारा पकड़े गए कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?

कितने कर्मचारियों को निलंबित किया गया?

कितनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुए?

कितनों पर अंतिम कार्रवाई हुई?

और कितने कर्मचारी आज भी संवेदनशील पदों पर कार्यरत हैं?

प्रशासन की भूमिका पर उठे प्रश्न

इस पूरे मामले में मनपा प्रशासन की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। आलोचकों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कठोर कार्रवाई न होने से कर्मचारियों में जवाबदेही की भावना कमजोर पड़ती है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अंतिम कार्रवाई कानूनन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होती है और प्रत्येक मामले को नियमों के अनुसार देखा जाता है।

सामाजिक संगठनों ने मांगी पारदर्शिता

कई सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि मनपा प्रशासन ACB मामलों से जुड़े सभी कर्मचारियों की स्थिति सार्वजनिक करे। उनका कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में पकड़े गए अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई और उनकी वर्तमान नियुक्ति की स्थिति क्या है।

जनता के बीच चर्चा का विषय बना मामला

शहर में यह मुद्दा सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं का विषय बना हुआ है। नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि यदि भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी बिना किसी कठोर कार्रवाई के सेवा में बने रहते हैं, तो भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का लक्ष्य कैसे हासिल होगा?

अब निगाहें उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और आयुक्त मनीषा आव्हाले पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि ACB के मामलों में फंसे कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है और भविष्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाने वाला है।

(नोट: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रसारित दावों और उठाए गए सवालों पर आधारित है। संबंधित कर्मचारियों अथवा प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)














लखनऊ अग्निकांड के बाद बड़ा सवाल: क्या उल्हासनगर के कोचिंग क्लासेस में भी मंडरा रहा है मौत का खतरा?


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में कई छात्रों की जान चली गई, जबकि दर्जनों छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। आग लगने के बाद भवन में फंसे छात्रों की चीख-पुकार, खिड़कियों और ऊपरी मंजिलों से जान बचाने के लिए छलांग लगाने के दृश्य ने देशभर के अभिभावकों को भयभीत कर दिया।

लखनऊ की इस त्रासदी के बाद अब सवाल उल्हासनगर की ओर भी उठने लगे हैं। शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुके उल्हासनगर में सैकड़ों कोचिंग क्लासेस, ट्यूशन सेंटर, लाइब्रेरी और प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन हजारों विद्यार्थी पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या इन संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं? क्या कोई बड़ा हादसा होने से पहले प्रशासन जागेगा?

संकरी गलियां, भीड़भाड़ वाली इमारतें और सुरक्षा पर सवाल

उल्हासनगर के कई कोचिंग क्लासेस ऐसी बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही सीढ़ी उपलब्ध है। कई जगहों पर पार्किंग क्षेत्र, कॉरिडोर और सीढ़ियां भी अतिक्रमण या सामान से भरी हुई दिखाई देती हैं। यदि ऐसी स्थिति में आग लग जाए या कोई अन्य आपातकालीन घटना हो जाए, तो सैकड़ों छात्रों की सुरक्षित निकासी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आग से अधिक जानें धुएं, घबराहट और भगदड़ के कारण जाती हैं। यदि भवन में पर्याप्त वेंटिलेशन, फायर एग्जिट और आपातकालीन व्यवस्था न हो तो कुछ ही मिनटों में स्थिति भयावह रूप ले सकती है।

फायर NOC है या सिर्फ कागजों में सुरक्षा?

शहर के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल सभी कोचिंग क्लासेस और शिक्षण संस्थानों का विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट कराए। यह जांच की जाए कि:

क्या सभी संस्थानों के पास वैध फायर NOC है?

क्या भवनों में पर्याप्त अग्निशमन यंत्र उपलब्ध हैं?

क्या फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर कार्यरत हैं?

क्या आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था है?

क्या छात्रों और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है?

क्या अग्निशमन विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण किया जाता है?

हजारों अभिभावकों की बढ़ी चिंता

लखनऊ हादसे के बाद उल्हासनगर के अभिभावकों में भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कोचिंग क्लासेस भेजते हैं, लेकिन यदि सुरक्षा व्यवस्था ही कमजोर हो तो यह किसी बड़े खतरे को न्योता देने जैसा है।

अभिभावकों का मानना है कि जिस तरह स्कूलों के लिए सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं, उसी प्रकार कोचिंग संस्थानों के लिए भी कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए और उनके पालन की नियमित निगरानी होनी चाहिए।

प्रशासन के लिए चेतावनी या इंतजार किसी हादसे का?

उल्हासनगर में अब तक किसी बड़े कोचिंग अग्निकांड की घटना सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में लापरवाही अक्सर हादसे के बाद ही उजागर होती है। ऐसे में प्रशासन, उल्हासनगर महानगरपालिका, अग्निशमन विभाग और संबंधित अधिकारियों को समय रहते व्यापक निरीक्षण अभियान चलाकर सुरक्षा मानकों की समीक्षा करनी चाहिए।

बड़ा सवाल

क्या उल्हासनगर में लखनऊ जैसी त्रासदी को रोकने के लिए प्रशासन अभी से सक्रिय होगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुलेगी?

लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई भी छोटी चूक बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।














सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल का जनहित अभियान: 29 जून 2026 को निःशुल्क मोतियाबिंद जांच, ऑपरेशन संबंधी परामर्श भी मिलेगा।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

समाज के प्रत्येक वर्ग तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल द्वारा 29 जून (सोमवार) को निःशुल्क मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक आयोजित होगा, जिसमें नेत्र रोगों से संबंधित समस्याओं का प्रारंभिक परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा।

हॉस्पिटल प्रशासन के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ मोतियाबिंद की समस्या आम होती जा रही है। समय पर जांच और उपचार न होने पर दृष्टि प्रभावित हो सकती है। इसी उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मनीष मिरानी द्वारा मरीजों की जांच की जाएगी तथा उन्हें उचित उपचार संबंधी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

शिविर के दौरान मरीजों की मोतियाबिंद की प्रारंभिक स्क्रीनिंग की जाएगी, जिससे रोग की स्थिति का पता लगाया जा सके। जिन मरीजों को ऑपरेशन की आवश्यकता होगी, उन्हें आधुनिक तकनीक से उपलब्ध उपचार और ऑपरेशन पैकेज की विस्तृत जानकारी भी दी जाएगी।

सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल ने बताया कि संस्थान हमेशा से गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। अस्पताल में सुरक्षित, आधुनिक और दर्दरहित उपचार पद्धतियों के माध्यम से मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

हॉस्पिटल प्रशासन ने विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दृष्टि संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों से इस निःशुल्क शिविर का लाभ उठाने की अपील की है। अस्पताल का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार से मोतियाबिंद के कारण होने वाली दृष्टि हानि को रोका जा सकता है तथा लोगों को बेहतर और स्वस्थ जीवन प्रदान किया जा सकता है।

संपर्क एवं पंजीकरण

शिविर में भाग लेने के इच्छुक नागरिक पूर्व पंजीकरण अथवा अधिक जानकारी के लिए निम्न नंबर पर संपर्क कर सकते हैं:

डॉ. मनीष मिरानी

📞  8237898959

       8108098576

स्थान: सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल

टाउन हॉल के पास,

उल्हासनगर-3

"साफ दृष्टि, बेहतर जीवन" के संदेश के साथ आयोजित यह शिविर समाज में नेत्र स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।