उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानीउल्हासनगर महानगरपालिका में करीब ₹85 करोड़ के विकास कार्यों के टेंडरों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि इन करोड़ों रुपये के टेंडरों को स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमेटी) की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किए बिना ही महानगरपालिका प्रशासन ने अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए स्वीकृति दे दी। इस घटनाक्रम ने महापालिका की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
महापालिका सूत्रों के मुताबिक, स्टैंडिंग कमेटी के 16 सदस्यों का गठन होने के बावजूद इन विकास कार्यों के प्रस्ताव समिति के समक्ष चर्चा और अनुमोदन के लिए नहीं रखे गए। आरोप है कि एक प्रभावशाली राजनीतिक नेता के कथित हस्तक्षेप और कुछ स्थानीय बिचौलियों की भूमिका के चलते टेंडरों का आवंटन सीधे कर दिया गया।
सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले पर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना (शिंदे गुट) के स्टैंडिंग कमेटी सदस्यों ने कड़ी आपत्ति जताई है। इसके बाद यह मामला प्रशासनिक दायरे से निकलकर राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।
जानकारी के अनुसार, पी.पी. कॉन्ट्रैक्टर को दलित बस्ती विकास योजना के अंतर्गत ₹21 करोड़ और ₹10 करोड़, कुल ₹31 करोड़ के कार्य आवंटित किए गए हैं। वहीं, दलित बस्ती क्षेत्र में गार्डन सौंदर्यीकरण, समाज मंदिर निर्माण तथा अन्य विकास कार्यों से जुड़े लगभग ₹27 करोड़ के टेंडर जय भारत कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिए गए हैं।
इसके अलावा, शहाड रेलवे स्टेशन के बाहर प्रस्तावित चार लेन सड़क निर्माण परियोजना के लिए राज्य सरकार से प्राप्त करीब ₹25 करोड़ की निधि से जुड़े कार्य भी जय भारत कंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है। इस प्रकार विभिन्न विकास योजनाओं से जुड़े लगभग ₹85 करोड़ के टेंडरों को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।
आरोप यह भी है कि टेंडरों को स्टैंडिंग कमेटी के समक्ष रखने के बजाय सीधे प्रशासनिक स्तर पर मंजूरी दी गई, जिससे वैधानिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी नगरसेवकों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका को ही नजरअंदाज किया जाएगा, तो स्टैंडिंग कमेटी के गठन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
इस बीच यह भी चर्चा है कि पिछले लगभग दो महीनों से महापालिका की सर्वसाधारण सभा आयोजित नहीं की गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि टेंडर विवाद पर संभावित बहस और जवाबदेही से बचने के लिए सभा बुलाने में लगातार देरी की जा रही है।
हालांकि, इन आरोपों पर महानगरपालिका प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन की चुप्पी के चलते विवाद और गहराता जा रहा है।
अब सभी की निगाहें महानगरपालिका के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित टेंडरों की समीक्षा की जाती है या फिर पूरे मामले को नियमानुसार स्टैंडिंग कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
फिलहाल, ₹85 करोड़ के टेंडरों को लेकर उठे इस विवाद ने उल्हासनगर महानगरपालिका की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में प्रशासन का रुख और संभावित निर्णय इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।यदि चाहें, इसे और अधिक खोजी (Investigative) या राष्ट्रीय समाचार पत्र की शैली में भी तैयार किया जा सकता है।