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उल्हासनगर मनपा के मैन्युअल टेंडर विवाद ने पकड़ा तूल: भाजपा नगरसेवक संजय सिंह ने आयुक्त पर नियमों के उल्लंघन का लगाया आरोप।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में मैन्युअल पद्धति से जारी किए गए टेंडरों को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। भारतीय जनता पार्टी के नगरसेवक एवं स्थायी समिति सदस्य संजय अयोध्याप्रसाद सिंह ने महानगरपालिका आयुक्त को एक लिखित पत्र भेजकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि विभिन्न विकास कार्यों के लिए मैन्युअल प्रणाली से जारी की गई निविदाओं (टेंडरों) की जानकारी नियमानुसार स्थायी समिति को नहीं दी जा रही, जिससे महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है।

संजय सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम की धारा 73 के अनुसार आयुक्त द्वारा किए गए ऐसे अनुबंध, जिनकी राशि निर्धारित सीमा के अंतर्गत आती है, उनकी जानकारी अनुबंध किए जाने की तारीख से 15 दिनों के भीतर स्थायी समिति को देना अनिवार्य है। उनका आरोप है कि प्रशासन इस कानूनी प्रावधान का पालन नहीं कर रहा है और स्थायी समिति को अंधेरे में रखकर कार्यवाही की जा रही है।

पत्र में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासनिक स्तर पर न केवल अधिनियम की अवहेलना की जा रही है, बल्कि स्थायी समिति का भी अपमान किया जा रहा है। साथ ही, स्थायी समिति के सदस्यों को गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया है।

इन आरोपों के आधार पर संजय सिंह ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि मैन्युअल पद्धति से जारी किए गए सभी टेंडरों का भुगतान तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए, जब तक कि पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर नियमों के अनुसार जानकारी स्थायी समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं की जाती।

उन्होंने अपने पत्र की प्रतिलिपि मुख्य लेखा अधिकारी, मुख्य लेखा परीक्षक तथा शहर अभियंता को भी भेजी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मामला केवल प्रशासनिक पत्राचार तक सीमित न रहकर वित्तीय और तकनीकी विभागों के संज्ञान में भी लाया गया है।

उल्हासनगर महानगरपालिका में पिछले कुछ समय से टेंडर प्रक्रिया, विकास कार्यों और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में संजय सिंह द्वारा उठाया गया यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे सकता है। यदि इस मामले की जांच होती है और आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

फिलहाल इस मामले में उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन का पक्ष आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।















ओबीसी प्रमाणपत्र विवाद में बड़ा फैसला: नवाब मलिक की भांजी और AIMIM पार्षद अयोग्य, बीएमसी की दो सीटें खाली।

 

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र में जाति प्रमाणपत्रों की वैधता को लेकर की जा रही जांच के बीच एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक फैसला सामने आया है। मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की दो महिला पार्षदों की सदस्यता उनके जाति प्रमाणपत्र अमान्य पाए जाने के बाद समाप्त कर दी गई है। इस कार्रवाई में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता नवाब मलिक की भांजी सनोबर मलिक और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की पार्षद नाज़िया पटेल को अयोग्य घोषित किया गया है।

राज्य सरकार ने यह निर्णय सक्षम जाति सत्यापन समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया। समिति ने जांच के दौरान दोनों जनप्रतिनिधियों के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी के जाति प्रमाणपत्रों को वैध नहीं माना। इसके बाद महाराष्ट्र के संबंधित प्रावधानों के तहत उनकी पार्षद सदस्यता समाप्त करने का आदेश जारी किया गया।

सनोबर मलिक मुंबई महानगरपालिका के वार्ड क्रमांक 137, जबकि नाज़िया पटेल वार्ड क्रमांक 98 से निर्वाचित हुई थीं। दोनों वार्ड ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित थे। आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र और उसका सत्यापन अनिवार्य होता है। जाति प्रमाणपत्र अमान्य घोषित होने के बाद संबंधित निर्वाचित प्रतिनिधि की सदस्यता स्वतः समाप्त होने का प्रावधान है।

इस फैसले के बाद दोनों वार्डों की सीटें रिक्त हो गई हैं। माना जा रहा है कि निर्वाचन आयोग और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन सीटों पर उपचुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि, उपचुनाव की तारीखों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कार्रवाई का असर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने वाले अन्य जनप्रतिनिधियों पर भी पड़ सकता है। जाति प्रमाणपत्रों की जांच को लेकर राज्य में पहले भी कई जनप्रतिनिधियों की सदस्यता पर सवाल उठ चुके हैं और विभिन्न मामलों की सुनवाई जारी है।

यह फैसला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि आरक्षित श्रेणी की सीटों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए जाति प्रमाणपत्र की वैधता और उसका विधिवत सत्यापन कानूनी रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि जांच में प्रमाणपत्र अमान्य पाया जाता है, तो निर्वाचित प्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त की जा सकती है।















महादेव बेटिंग ऐप पर बड़ा शिकंजा: मास्टरमाइंड सौरभ चंद्राकर गिरफ्तार, जांच के दायरे में देशभर के नेटवर्क; उल्हासनगर कनेक्शन पर भी एजेंसियों की नजर।


मुंबई/नई दिल्ली: दिनेश मीरचंदानी

देश के सबसे चर्चित ऑनलाइन सट्टेबाजी मामलों में शामिल महादेव ऑनलाइन बेटिंग ऐप प्रकरण में जांच एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली है। महादेव ऐप के कथित मास्टरमाइंड सौरभ चंद्राकर को इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के बाद ओमान से गिरफ्तार कर लिया गया है। माना जा रहा है कि जल्द ही उसे भारत लाकर पूछताछ की जाएगी। इस गिरफ्तारी को ऑनलाइन सट्टेबाजी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के खिलाफ अब तक की सबसे महत्वपूर्ण कार्रवाई माना जा रहा है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, महादेव बेटिंग ऐप के माध्यम से देशभर में हजारों करोड़ रुपये के अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी कारोबार का संचालन किए जाने के आरोप हैं। इस मामले में पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच एजेंसियां तथा अन्य संबंधित संस्थाएं मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क की गहन जांच कर रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक, सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी के बाद अब जांच का दायरा और व्यापक होने की संभावना है। एजेंसियां उन व्यक्तियों, ऑपरेटरों और कथित बुकी नेटवर्क की भी पड़ताल कर रही हैं, जिनके माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों में ऑनलाइन सट्टेबाजी का संचालन किए जाने की आशंका है। डिजिटल भुगतान, बैंक खातों, हवाला चैनलों, विदेशी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की भी गहन जांच की जा रही है।

उल्हासनगर के कथित सट्टा नेटवर्क पर भी उठे सवाल

जांच के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि महाराष्ट्र के उल्हासनगर से जुड़े कुछ कथित सट्टा संचालकों और बुकी नेटवर्क की गतिविधियां भी जांच एजेंसियों के रडार पर आ सकती हैं। सूत्रों के अनुसार, इन नेटवर्कों के गोवा, दुबई और अन्य विदेशी ठिकानों से कथित संपर्कों की भी जांच किए जाने की संभावना जताई जा रही है। यदि वित्तीय लेन-देन और डिजिटल ट्रेल में कोई कड़ी मिलती है, तो जांच एजेंसियां संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ कर सकती हैं।

हालांकि, अब तक किसी भी व्यक्ति, बुकी या संगठन का नाम ईडी, सीबीआई, पुलिस अथवा किसी अन्य जांच एजेंसी द्वारा आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता की पुष्टि इस समय नहीं की जा सकती।

पूरे नेटवर्क की परतें खुलने की उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं। इससे देशभर में फैले ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट, हवाला नेटवर्क, फर्जी कंपनियों, बैंकिंग चैनलों तथा कथित सहयोगियों की भूमिका पर भी नया खुलासा होने की संभावना है। जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं की गहराई से जांच कर रही हैं।

फिलहाल जांच जारी है और एजेंसियों की ओर से आधिकारिक रूप से जितनी जानकारी साझा की जाएगी, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई और खुलासे सामने आएंगे।














फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान का वीडियो वायरल: पार्टी के बाद लिफ्ट में अचानक बैठे, बॉडीगार्ड के सहारे बाहर आए; घटना की वजह अब तक साफ नहीं।


 

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने उनके प्रशंसकों के बीच चिंता और कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। यह वीडियो अभिनेता राघव जुयाल की बर्थडे पार्टी के बाद का बताया जा रहा है।

वीडियो में देखा जा सकता है कि पार्टी से बाहर निकलते समय आर्यन खान अचानक लिफ्ट के अंदर बैठ जाते हैं। कुछ क्षण बाद उनके बॉडीगार्ड और साथ मौजूद अन्य लोग उन्हें हाथ पकड़कर सहारा देते हुए लिफ्ट से बाहर लेकर आते हैं। इस दौरान आर्यन सामान्य से कुछ अलग नजर आते हैं, जिसके चलते सोशल मीडिया पर घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

हालांकि, अब तक आर्यन खान, उनके परिवार या उनकी टीम की ओर से इस घटना को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने लिफ्ट में अचानक क्यों बैठना पड़ा और उन्हें सहारे की जरूरत क्यों महसूस हुई।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर कुछ लोग उनकी तबीयत बिगड़ने की आशंका जता रहे हैं, जबकि कई अन्य का मानना है कि यह केवल क्षणिक थकान, चक्कर आने या किसी अन्य सामान्य वजह का मामला भी हो सकता है। फिलहाल इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि आर्यन खान की तबीयत वास्तव में बिगड़ी थी या घटना के पीछे कोई दूसरी वजह थी। आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

फिलहाल यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है और प्रशंसक आर्यन खान की कुशलता को लेकर लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं।















उल्हासनगर मनपा में अवैध वसूली प्रकरण पर बड़ी कार्रवाई: लिपिक आदेश उभाळे निलंबित, सहायक आयुक्त अजय साबळे को अंतिम चेतावनी; मामले ने प्रशासनिक जवाबदेही पर उठाए सवाल।


 




उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के प्रभाग समिति क्रमांक-1 में कथित अवैध वसूली के मामले में मनपा प्रशासन ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए लिपिक आदेश उभाळे को निलंबित कर दिया है। वहीं, प्रभाग समिति के सहायक आयुक्त अजय साबळे को इस प्रकरण में अंतिम चेतावनी (लास्ट वार्निंग) जारी की गई है। इस कार्रवाई के बाद महानगरपालिका के प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है।

उल्हास जनपथ के संपादक शिव कुमार मिश्रा पिछले 7–8 महीनों से इस मुद्दे को लगातार उठाते हुए उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन के समक्ष मजबूती से आवाज बुलंद कर रहे थे। आखिरकार उनकी सतत मेहनत रंग लाई और मामले में प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी।

जानकारी के अनुसार, पदपथ (फुटपाथ) विभाग से जुड़े कथित अवैध वसूली के मामले को लेकर मंत्रालय, लोकायुक्त, जिला अधिकारी तथा उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन को विस्तृत लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पदपथ विभाग में नियमों का उल्लंघन कर अवैध रूप से वसूली की जा रही है। शिकायत मिलने के बाद मनपा प्रशासन ने मामले की विभागीय जांच शुरू की।

सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर लिपिक आदेश उभाळे की भूमिका संदिग्ध पाई गई। जांच में प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने के बाद मनपा आयुक्त ने उनके निलंबन के आदेश जारी कर दिए।

इसी प्रकरण में सहायक आयुक्त अजय साबळे को भी प्रशासन की ओर से अंतिम चेतावनी जारी की गई है। प्रशासन का कहना है कि उनके विरुद्ध विभागीय स्तर पर उपलब्ध अधिकारों के अनुसार कार्रवाई की गई है। हालांकि, शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यदि अवैध वसूली का मामला हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी केवल अधीनस्थ कर्मचारी की नहीं, बल्कि संबंधित विभाग के प्रभारी अधिकारी की भी बनती है।

शिकायतकर्ताओं ने दावा किया है कि इस मामले में सहायक आयुक्त अजय साबळे के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के लिए जल्द ही कोकण भवन तथा महाराष्ट्र मंत्रालय में अलग से शिकायत दर्ज कराई जाएगी। उनका कहना है कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए।

इस कार्रवाई के बाद महानगरपालिका के विभिन्न विभागों में कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। प्रशासनिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि यदि उच्च स्तर पर आगे जांच होती है तो इस प्रकरण में अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा सकती है।

फिलहाल, मनपा प्रशासन द्वारा लिपिक आदेश उभाळे के निलंबन और सहायक आयुक्त अजय साबळे को अंतिम चेतावनी दिए जाने के बाद यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि उच्च स्तर पर प्रस्तावित शिकायतों के बाद इस प्रकरण में आगे क्या कार्रवाई होती है।














नवी मुंबई के अवैध निर्माणों पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के दिए निर्देश।


नवी मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

नवी मुंबई में तेजी से बढ़ रहे अवैध निर्माणों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सिडको (CIDCO), नवी मुंबई महानगरपालिका (NMMC), महाराष्ट्र औद्योगिक विकास महामंडल (MIDC) तथा अन्य संबंधित सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराज़गी व्यक्त की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक योजनाबद्ध शहर में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण होना प्रशासनिक विफलता का संकेत है और यह स्थिति कानून के शासन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि नवी मुंबई जैसे नियोजित शहर में लगातार अवैध निर्माण होते रहना अत्यंत चिंताजनक है। यदि समय रहते संबंधित विभागों और अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन किया होता, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। अदालत ने यह भी कहा कि अवैध निर्माण केवल नियमों का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि इससे शहरी नियोजन, नागरिक सुविधाओं और सार्वजनिक सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि वर्षों पहले दिए गए न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अवैध निर्माणों के खिलाफ अपेक्षित और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। अदालत के अनुसार, प्रशासन की उदासीनता और लापरवाही के कारण शहर में अनियोजित विकास को बढ़ावा मिला, जिससे आम नागरिकों को यातायात, जल निकासी, बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

अदालत ने संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि नवी मुंबई क्षेत्र में मौजूद सभी अवैध निर्माणों का व्यापक सर्वेक्षण कराया जाए और कानून के अनुसार उनके विरुद्ध त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई की जाए। साथ ही, न्यायालय ने यह भी पूछा कि अब तक अवैध निर्माणों को रोकने में विफल रहने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है और उनकी जवाबदेही कैसे तय की गई है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अवैध निर्माणों को हटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत के कारण ऐसे निर्माण खड़े हुए। अदालत ने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि उसके आदेशों का समयबद्ध पालन नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई भी की जा सकती है।

गौरतलब है कि नवी मुंबई में अवैध निर्माणों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। विभिन्न नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार शिकायतें किए जाने के बावजूद अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई नहीं होने के कारण यह मामला न्यायालय तक पहुंचा। अब हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देशों के बाद संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।













'भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण क्यों?' उल्हासनगर मनपा के खिलाफ राष्ट्र कल्याण पार्टी तथा छावा संगठन का धरना, 21 जुलाई को ठाणे में प्रदर्शन का ऐलान।


 




उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा रिश्वतखोरी के मामलों में पकड़े गए अधिकारियों और कर्मचारियों को उल्हासनगर महानगरपालिका में अब भी महत्वपूर्ण विभागों का प्रभार दिए जाने के विरोध में मंगलवार (8 जुलाई) को मनपा आयुक्त कार्यालय के बाहर जोरदार धरना-प्रदर्शन किया गया। यह आंदोलन राष्ट्र कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी तथा छावा संगठन के निखिल गोळे के नेतृत्व में आयोजित किया गया।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों में एसीबी की कार्रवाई का सामना कर चुके अनेक अधिकारी और कर्मचारी आज भी संवेदनशील एवं राजस्व से जुड़े विभागों में कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, उन्हें अतिरिक्त महत्वपूर्ण पदभार भी सौंपे गए हैं, जिससे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के बजाय उसे बढ़ावा मिल रहा है।

धरना प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारियों ने विशेष रूप से गणेश शिंपी का मामला उठाया। उनका आरोप है कि गणेश शिंपी मूल रूप से लघुलेखक (स्टेनो) वर्ग-3 के पद पर नियुक्त हैं, लेकिन उन्हें उप आयुक्त (प्रभाग समिति-2), कर निर्धारक एवं संकलक, कर विभाग, चुनाव विभाग प्रमुख तथा अतिक्रमण निष्कासन विभाग सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।

आंदोलनकारियों के अनुसार, मनपा प्रशासन ने उन्हें लिखित रूप से बताया कि चुनाव विभाग में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया चल रही है, जो अक्टूबर तक जारी रहेगी, इसलिए फिलहाल कोई कार्रवाई संभव नहीं है। हालांकि आंदोलनकारियों का दावा है कि हाल ही में नगर निगम के सार्वत्रिक चुनाव 2025-26 की प्रक्रिया के दौरान कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामले में गणेश शिंपी को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है। इसके बावजूद उन्हें अतिरिक्त विभागों का प्रभार देना गंभीर सवाल खड़े करता है।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि एक स्टेनो स्तर के कर्मचारी को इतने महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी आखिर किसके निर्देश पर और किन परिस्थितियों में दी गई। उनका कहना है कि यदि यह नियुक्तियां आर्थिक लेन-देन के आधार पर की गई हैं तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन इन सवालों का संतोषजनक जवाब देने में असफल रहा।

धरना प्रदर्शन में उन अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का भी उल्लेख किया गया, जिनके खिलाफ एसीबी द्वारा कार्रवाई किए जाने के बावजूद वे महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत बताए गए। इनमें वरिष्ठ लिपिक अजीत गोवारी, नगररचना विभाग के कनिष्ठ अभियंता संजय पवार, कर विभाग के वरिष्ठ लिपिक अनिल खतुराणी, भंडार विभाग के लिपिक अंकुश कदम, विधि विभाग के राजा बुलानी, छाया डगळे, कर विभाग के भानु परमार, बलराम गिधवा, जगदीश परमार सहित अन्य कर्मचारियों के नाम शामिल किए गए। आंदोलनकारियों का दावा है कि ऐसे कुल 23 अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ एसीबी कार्रवाई कर चुकी है, फिर भी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं।

राष्ट्र कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी ने चेतावनी दी कि यदि आगामी 8 दिनों के भीतर इन अधिकारियों एवं कर्मचारियों से महत्वपूर्ण पदभार वापस लेकर उचित प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई, तो 21 जुलाई को ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष व्यापक धरना-आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे अधिकारियों को संवेदनशील विभागों में बनाए रखना जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ है और इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इस पूरे मामले को लेकर अब नगर निगम प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह विवाद आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक तथा प्रशासनिक तूल पकड़ सकता है।