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समीर वानखेड़े के खिलाफ NCB की विभागीय जांच पर बॉम्बे हाईकोर्ट की रोक, अदालत ने एजेंसी की कार्रवाई पर उठाए गंभीर सवाल।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के पूर्व मुंबई जोनल निदेशक समीर वानखेड़े को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच और पूछताछ की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान एनसीबी की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल गुमनाम शिकायतों और उन आरोपियों के बयानों के आधार पर किसी जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यदि जांच एजेंसियों के अधिकारियों को हर मामले में आरोपियों द्वारा लगाए गए आरोपों या अनाम शिकायतों के आधार पर जांच का सामना करना पड़ेगा, तो वे भविष्य में अपने कर्तव्यों का निष्पक्ष और निर्भीक होकर पालन नहीं कर पाएंगे। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति जांच एजेंसियों के मनोबल और उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

समीर वानखेड़े ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि एनसीबी उनके खिलाफ दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई कर रही है। उनका कहना है कि उनके द्वारा पूर्व में संभाले गए चर्चित मामलों के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और विभागीय जांच का उद्देश्य उन्हें परेशान करना है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले उसके समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना आवश्यक है। केवल आरोपियों के आरोप या गुमनाम शिकायतें किसी निष्पक्ष जांच का पर्याप्त आधार नहीं बन सकतीं।

अदालत ने फिलहाल समीर वानखेड़े के खिलाफ जारी विभागीय पूछताछ और जांच की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर होगी, जहां अदालत इस पूरे विवाद पर विस्तृत सुनवाई करेगी।

गौरतलब है कि समीर वानखेड़े अपने कार्यकाल के दौरान कई हाई-प्रोफाइल मादक पदार्थ मामलों की जांच को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे थे। उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई को लेकर भी लंबे समय से विवाद बना हुआ है। हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश को उनके लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है।

















उल्हासनगर के कार गैलेरिया से जुड़े दो कारोबारी भाइयों पर ₹61 लाख की कथित ठगी का मामला, बदलापुर में केस दर्ज।

उल्हासनगर/बदलापुर: दिनेश मीरचंदानी

फ्रेंडली लोन के नाम पर ₹61 लाख की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। बदलापुर पश्चिम पुलिस ने उल्हासनगर स्थित कार गैलेरिया के दो कारोबारी भाइयों के खिलाफ एक बदलापुर निवासी से आर्थिक तंगी का हवाला देकर बड़ी रकम उधार लेने और बाद में वापस नहीं करने के आरोप में मामला दर्ज किया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता रुपेश इरमाली (35), निवासी राधे पैराडाइज, बदलापुर पश्चिम, ने अपनी शिकायत में बताया है कि उल्हासनगर-4 के सेक्शन 30-ए निवासी नितिन अमरलाल बजाज और बंटी अमरलाल बजाज, जो कार गैलेरिया नाम से व्यवसाय संचालित करते हैं, ने अपने कारोबार में गंभीर आर्थिक संकट होने की बात कहकर उनसे फ्रेंडली लोन के रूप में पैसे मांगे थे।

शिकायत के अनुसार, 1 अप्रैल 2019 से 31 अक्टूबर 2020 के बीच आरोपियों ने अलग-अलग समय पर कुल ₹61 लाख उधार लिए। उन्होंने शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया था कि आर्थिक स्थिति सुधरते ही पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। इसी विश्वास के आधार पर शिकायतकर्ता ने उन्हें यह राशि दी।

हालांकि, आरोप है कि निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी आरोपियों ने उधार ली गई रकम वापस नहीं की। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने कई बार पैसे लौटाने की मांग की, लेकिन हर बार टालमटोल की गई। आरोप है कि आरोपियों ने उधार ली गई राशि का उपयोग अपने निजी लाभ के लिए किया और जानबूझकर रकम लौटाने से परहेज किया, जिससे शिकायतकर्ता को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

शिकायत की जांच के बाद बदलापुर पश्चिम पुलिस स्टेशन में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 316(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और यह पता लगाया जा रहा है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के साथ धोखाधड़ी की मंशा से रकम हासिल की थी या नहीं।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मामले की आगे की जांच पुलिस उपनिरीक्षक पल्लेवाड कर रहे हैं। जांच के दौरान लेन-देन से जुड़े दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों की भी जांच की जाएगी। पुलिस का कहना है कि जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
























प्रहार संगठन के नेता एडवोकेट स्वप्निल पाटिल ने शुरू से उठाया मामला, तोड़फोड़ के बाद दोबारा निर्माण कराने के आरोप; कई नगरसेवकों के विरोध के बावजूद कार्रवाई पर सवाल।


 



उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

रिजेंसी परिसर में लगभग 30,000 वर्गफुट के कथित अवैध निर्माण को लेकर एक बार फिर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। इस मामले में अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर अतिरिक्त आयुक्त ने संबंधित अधिकारियों से विस्तृत एवं स्पष्ट रिपोर्ट तलब की है। उन्होंने यह स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं कि इतने बड़े पैमाने पर हुए कथित अवैध निर्माण के बावजूद नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की गई और इसमें किन अधिकारियों की क्या भूमिका रही।

मामले को लेकर नगररचनाकार विकास बिरारी पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि उन्होंने रिजेंसी के कथित अवैध निर्माण को बचाने का प्रयास किया, हालांकि यह प्रयास सफल नहीं हो सका। इस पूरे प्रकरण को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय किए जाने की मांग भी तेज हो गई है।

बताया जा रहा है कि इस मामले को प्रहार संगठन के नेता एडवोकेट स्वप्निल पाटिल ने शुरुआत से ही लगातार उठाया। उन्होंने कथित अवैध निर्माण के खिलाफ प्रशासन को कई बार शिकायतें दीं और कार्रवाई की मांग की। संगठन के लगातार विरोध और दबाव के बाद संबंधित निर्माण पर तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई थी।

हालांकि, प्रहार संगठन का आरोप है कि तोड़फोड़ के बाद भी मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। संगठन का दावा है कि नगररचनाकार विकास बिरारी की कथित मंजूरी से उसी स्थान पर दोबारा निर्माण कराया गया, जिससे पूरे मामले की निष्पक्षता और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रहार संगठन का यह भी आरोप है कि कई नगरसेवकों ने इस मामले का विरोध किया और कथित अनियमितताओं की ओर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन उनके विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया। संगठन का कहना है कि नगररचनाकार विकास बिरारी ने कथित रूप से नियमों की अनदेखी करते हुए अवैध निर्माण को संरक्षण देने का प्रयास किया।

संगठन ने यह भी दावा किया है कि उसने पूर्व नगररचनाकारों के कार्यकाल में हुई कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को भी लगातार उजागर किया है। प्रहार संगठन का कहना है कि यदि समय रहते इन मामलों पर सख्त कार्रवाई की जाती, तो इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

अब अतिरिक्त आयुक्त द्वारा रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद इस पूरे मामले में प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होने और आगे की कार्रवाई को लेकर लोगों की नजरें प्रशासन पर टिकी हुई हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

नगररचनाकार विकास बिरारी के गैरव्यव्हार के खिलाफ संचालक नगररचनाकार पुणे मे सोमवार दिनांक १० अगस्ट २०२६ को होगा प्रहार का आंदोलन। 















उल्हासनगर के नगरसेवकों का गुवाहाटी दौरा विवादों में, 65 लाख रुपये के प्रशिक्षण खर्च के साथ परिवारों के खर्च पर भी उठे सवाल.!


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

असम के गुवाहाटी में नवनिर्वाचित नगरसेवकों के लिए आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर अब राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का विषय बन गया है। आर्थिक तंगी से जूझ रही उल्हासनगर महानगरपालिका (यूएमसी) द्वारा इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए करीब 65 लाख रुपये खर्च करने की प्रशासनिक मंजूरी दिए जाने के बाद विपक्ष ने पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब नगरसेवकों के आधिकारिक खर्च का वहन महानगरपालिका ने किया, तब उनके साथ गए परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के यात्रा, ठहरने और अन्य खर्च का भुगतान किसने किया, इसकी स्पष्ट जानकारी प्रशासन को सार्वजनिक करनी चाहिए।

जानकारी के अनुसार, 22 से 26 जुलाई के बीच अखिल भारतीय स्थानीय स्वराज्य संस्था की ओर से गुवाहाटी में नवनिर्वाचित नगरसेवकों के लिए प्रशासनिक कार्यप्रणाली, स्थानीय स्वशासन और विकास योजनाओं से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस प्रशिक्षण में भाग लेने के लिए 75 में से 71 नगरसेवकों ने सहमति दी थी। महानगरपालिका ने नगरसेवकों के हवाई यात्रा, आवास, भोजन तथा दैनिक भत्ते सहित पूरे आधिकारिक खर्च का वहन किया।

हालांकि, विवाद तब शुरू हुआ जब यह सामने आया कि कई नगरसेवक अपने परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को भी इस दौरे पर साथ ले गए थे। सोशल मीडिया पर विमान के अंदर नगरसेवकों और उनके परिजनों की तस्वीरें वायरल होने के बाद विपक्ष ने इस दौरे की पारदर्शिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। हैरानी की बात यह भी रही कि प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबंधित एक भी आधिकारिक तस्वीर या वीडियो सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे यह चर्चा और तेज हो गई कि आखिर प्रशिक्षण कार्यक्रम में वास्तविक रूप से क्या गतिविधियां हुईं।

विपक्ष का कहना है कि यदि यह दौरा पूरी तरह प्रशिक्षण के उद्देश्य से आयोजित किया गया था, तो परिवार के सदस्यों की इसमें क्या भूमिका थी और उनके यात्रा एवं ठहरने का खर्च किस स्रोत से वहन किया गया। विपक्ष ने प्रशासन से पूरे खर्च का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करने तथा इस मामले की पारदर्शी जांच कराने की मांग की है।

इस पूरे विवाद के बीच एक और तथ्य चर्चा का विषय बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, नगरसेवकों और उनके परिवारों के ठहरने की व्यवस्था उसी आलीशान होटल में की गई थी, जहां वर्ष 2022 में शिवसेना में राजनीतिक विभाजन के दौरान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले बागी विधायक कई दिनों तक ठहरे थे। इस वजह से भी यह दौरा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

इस मामले में महानगरपालिका की प्रभारी सचिव एवं उपायुक्त दीपाली चौगुले द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि गुवाहाटी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में 60 से 70 नगरसेवकों ने भाग लिया। हालांकि, प्रशासन ने अब तक प्रशिक्षण में शामिल नगरसेवकों की सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं की है। इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब पूरे कार्यक्रम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, तो प्रतिभागियों की सही संख्या और खर्च का विस्तृत विवरण सार्वजनिक करने में देरी क्यों हो रही है।

अब विपक्ष ने महानगरपालिका प्रशासन से मांग की है कि गुवाहाटी प्रशिक्षण दौरे पर हुए प्रत्येक खर्च का हिसाब सार्वजनिक किया जाए, नगरसेवकों के साथ गए परिजनों के खर्च का स्रोत स्पष्ट किया जाए तथा यदि सरकारी धन का किसी भी प्रकार से दुरुपयोग हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। फिलहाल यह मामला उल्हासनगर की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

















उल्हासनगर में सड़कें बदहाल, पानी-सीवरेज संकट बरकरार... फिर भी नगरसेवकों का गुवाहाटी दौरा! 65 लाख रुपये के प्रशिक्षण खर्च पर उठे सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में सड़कों की दुर्दशा, गड्ढों की भरमार, दूषित पेयजल, सीवरेज व्यवस्था की बदहाली और वित्तीय संकट जैसी गंभीर समस्याओं के बीच उल्हासनगर महानगरपालिका के नगरसेवकों का गुवाहाटी प्रशिक्षण दौरा अब बड़े विवाद का विषय बन गया है। इस चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम पर महानगरपालिका के खजाने से लगभग 65 लाख रुपये खर्च किए जाने की प्रशासनिक मंजूरी दी गई, जिसके बाद शहरभर में इसकी आलोचना तेज हो गई है।

नागरिकों का कहना है कि जिन जनप्रतिनिधियों को शहर की बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए मैदान में होना चाहिए था, वे मानसून के दौरान गुवाहाटी के पांच सितारा होटल में प्रशिक्षण लेने पहुंचे। ऐसे समय में जब महानगरपालिका आर्थिक संकट से गुजर रही है और विकास कार्यों के लिए धन की कमी बताई जा रही है, तब इस खर्च को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

22 से 26 जुलाई तक चला प्रशिक्षण, रेडिसन ब्लू होटल में हुई व्यवस्था

महानगरपालिका के सचिव कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 22 जुलाई से 26 जुलाई के बीच आयोजित किया गया। प्रशिक्षण का आयोजन गुवाहाटी स्थित पांच सितारा रेडिसन ब्लू होटल में किया गया था।

चार दिवसीय कार्यक्रम के दौरान नगरसेवकों के लिए चार बार चाय-नाश्ता, पांच बार दोपहर का भोजन, चार बार रात्रि भोजन, पांच दिनों तक स्थानीय परियोजनाओं के निरीक्षण के लिए वाहन, सभागार, स्टेशनरी और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी। इन व्यवस्थाओं पर प्रति नगरसेवक ₹52,980 खर्च निर्धारित किया गया।

इसके अलावा मुंबई–गुवाहाटी–मुंबई हवाई यात्रा के लिए ₹21,740 प्रति व्यक्ति का प्रावधान किया गया। इस प्रकार एक नगरसेवक पर कुल अनुमानित खर्च ₹74,720 बैठता है। सचिव कार्यालय के अनुसार इस पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए करीब ₹65 लाख के व्यय को प्रशासनिक मंजूरी दी गई थी।

प्रशिक्षण कम, पर्यटन ज्यादा? सोशल मीडिया से बढ़ा विवाद

हालांकि यह प्रशिक्षण 76 नगरसेवकों के लिए आयोजित किया गया था, लेकिन जानकारी के अनुसार सभी नगरसेवक इसमें शामिल नहीं हुए। इस बीच सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने पूरे मामले को और अधिक विवादास्पद बना दिया।

इन तस्वीरों में कई नगरसेवक अपने परिवार के सदस्यों के साथ दिखाई दिए, जिसके बाद शहर में यह चर्चा शुरू हो गई कि यह वास्तव में प्रशिक्षण कार्यक्रम था या मानसून पर्यटन। नागरिकों ने सवाल उठाया कि यदि परिवार के सदस्य भी इस यात्रा में शामिल थे तो उनका खर्च किसने वहन किया। क्या यह निजी खर्च था या किसी अन्य माध्यम से इसका भुगतान किया गया? इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

मुंबई की संस्था, फिर प्रशिक्षण गुवाहाटी में क्यों?

महानगरपालिका के जनसंपर्क अधिकारी प्राजक्त कुलकर्णी के अनुसार यह प्रशिक्षण मुंबई स्थित अखिल भारतीय स्थानीय स्वराज्य संस्था द्वारा आयोजित किया गया था। प्रशिक्षण में संवाद कौशल, कार्यालयीन कार्यप्रणाली, प्रस्तावों और प्रश्नों की प्रस्तुति, अभिलेख तैयार करना, प्रभाग विकास और नियोजन जैसे विषय शामिल थे।

हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब प्रशिक्षण देने वाली संस्था स्वयं मुंबई में स्थित है, तो कार्यक्रम गुवाहाटी में आयोजित करने की आवश्यकता क्या थी। कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों का कहना है कि यही प्रशिक्षण मुंबई या उल्हासनगर में आयोजित किया जा सकता था, जिससे लाखों रुपये के सार्वजनिक धन की बचत होती।

700 करोड़ से अधिक का बकाया, फिर भी खर्च पर सवाल

उल्हासनगर महानगरपालिका पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रही है। जानकारी के अनुसार पालिका पर 700 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। ठेकेदारों के भुगतान लंबित हैं और एमआईडीसी को पानी आपूर्ति का भुगतान करने में भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

संपत्ति कर की वसूली अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसके कारण राजस्व पर लगातार दबाव बना हुआ है। दूसरी ओर शहर की अधिकांश सड़कें गड्ढों से भरी हुई हैं, जलनिकासी और सीवरेज व्यवस्था पर लगातार शिकायतें मिल रही हैं तथा पेयजल आपूर्ति को लेकर भी नागरिक परेशान हैं।

स्थिति यह है कि महानगरपालिका के स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए दो महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अनेक छात्रों को अब तक आवश्यक शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है।

जनता पूछ रही है—प्राथमिकता शहर या पर्यटन?

इस पूरे घटनाक्रम के बाद शहर में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर सार्वजनिक धन का उपयोग किस प्राथमिकता के आधार पर किया जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये की आर्थिक तंगी का हवाला देकर विकास कार्यों में कटौती की जा रही है, तो फिर लाखों रुपये खर्च कर दूर-दराज़ राज्यों में प्रशिक्षण आयोजित करने की क्या आवश्यकता थी।

अब लोगों की नजर इस बात पर है कि महानगरपालिका प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस विवाद पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं तथा भविष्य में ऐसे खर्चों को लेकर क्या नीति अपनाई जाएगी। दूसरी ओर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी पूरे मामले की पारदर्शी जांच और खर्च का विस्तृत विवरण सार्वजनिक करने की मांग तेज कर दी है।

नोट: नगरसेवक ऐश में, उल्हासनगर की जनता त्रस्त।





















महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला: राज्य में ऑर्केस्ट्रा लाइसेंस व्यवस्था पर रोक। अब न नए लाइसेंस जारी होंगे और न ही पुराने लाइसेंसों का नवीनीकरण किया जाएगा। गृह विभाग ने सभी पुलिस आयुक्तों, एसपी और जिलाधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं।


 
मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र सरकार ने होटल, रेस्टोरेंट और बार में ‘ऑर्केस्ट्रा’ के नाम पर चल रही कथित अश्लील गतिविधियों और कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। राज्य के गृह विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 के तहत ऑर्केस्ट्रा (लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस) के लिए कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा। इतना ही नहीं, वर्तमान में जारी लाइसेंसों की अवधि समाप्त होने के बाद उनका नवीनीकरण भी नहीं होगा।

गृह विभाग द्वारा सोमवार को जारी परिपत्र के माध्यम से राज्य के सभी पुलिस आयुक्तों, पुलिस अधीक्षकों और जिलाधिकारियों को इस निर्णय का तत्काल प्रभाव से कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। माना जा रहा है कि इस निर्णय के बाद राज्य में ऑर्केस्ट्रा लाइसेंस के माध्यम से संचालित होने वाले प्रतिष्ठानों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

सरकार के अनुसार वर्ष 2016 में लागू 'महाराष्ट्र होटल, उपाहारगृह एवं मद्यपान कक्ष (डांस बार) में अश्लील नृत्य पर प्रतिबंध तथा महिलाओं की गरिमा की रक्षा अधिनियम' के बाद डांस बारों पर कई कानूनी प्रतिबंध लगाए गए थे। हालांकि, समय के साथ कई प्रतिष्ठानों ने इन प्रतिबंधों से बचने के लिए महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की 'सार्वजनिक मनोरंजन नियमावली' के अंतर्गत ऑर्केस्ट्रा लाइसेंस प्राप्त करना शुरू कर दिया। सरकार के संज्ञान में यह बात आई कि इन लाइसेंसों की आड़ में कई स्थानों पर कथित रूप से अश्लील नृत्य और अन्य अवैध गतिविधियां फिर से संचालित की जा रही थीं।

इन्हीं शिकायतों और लगातार मिल रही सूचनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने ऑर्केस्ट्रा प्रतिष्ठानों को भी 2016 के अश्लील नृत्य प्रतिबंध कानून के दायरे में लाने का निर्णय लिया। इस संबंध में 2 जुलाई 2026 को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा के हालिया मानसून सत्र में संशोधित विधेयक पारित किया गया और राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के उपरांत 22 जुलाई 2026 को इसे राज्य सरकार के राजपत्र में प्रकाशित कर अधिनियम लागू कर दिया गया।

गृह विभाग ने जारी किए सख्त निर्देश

गृह विभाग की सहसचिव मुग्धा धुरी द्वारा जारी परिपत्र में स्पष्ट किया गया है कि अब महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत ऑर्केस्ट्रा के लिए कोई नया लाइसेंस स्वीकृत नहीं किया जाएगा। साथ ही, जिन प्रतिष्ठानों के पास वर्तमान में ऑर्केस्ट्रा लाइसेंस हैं, उनकी अवधि समाप्त होने के बाद उनका नवीनीकरण भी नहीं किया जाएगा। सभी संबंधित पुलिस अधिकारियों और जिला प्रशासन को इस निर्णय का सख्ती से पालन कराने तथा किसी भी प्रकार के उल्लंघन पर नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

दुरुपयोग रोकने की दिशा में अहम कदम

सरकार का मानना है कि इस फैसले से ऑर्केस्ट्रा लाइसेंस की आड़ में डांस बार कानून को दरकिनार कर संचालित की जा रही कथित अश्लील गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगेगी। साथ ही, महिलाओं की गरिमा की रक्षा, कानून का कड़ाई से पालन और सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों में पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से यह निर्णय राज्य सरकार की एक महत्वपूर्ण और सख्त पहल माना जा रहा है।


















उल्हासनगर मनपा में एसीबी के हत्थे चढ़े अधिकारियों को प्रभारी पदों से हटाने की मांग, 15 अगस्त से ठाणे कलेक्टर कार्यालय पर आमरण अनशन करेंगे शैलेश तिवारी।


 



ठाणे/उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अब भी प्रभारी पदों पर बनाए रखने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय कल्याण भाटी के अध्यक्ष शैलेश तिवारी ने प्रशासन के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों से तत्काल प्रभाव से प्रभारी पदभार वापस नहीं लिया गया, तो 15 अगस्त 2026 (स्वतंत्रता दिवस) से ठाणे जिला कलेक्टर कार्यालय के समक्ष आमरण अनशन शुरू किया जाएगा।

शैलेश तिवारी ने जारी प्रेस बयान में कहा कि एसीबी द्वारा रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए अधिकारियों और कर्मचारियों को जिम्मेदार पदों पर बनाए रखना न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि इससे जनता का सरकारी तंत्र पर विश्वास भी कमजोर होता है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में आरोपित अधिकारियों को प्रभारी पदों पर बनाए रखना पारदर्शी एवं जवाबदेह शासन की भावना के विपरीत है।

उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों के प्रभारी पद नहीं हटाए गए हैं, जिससे यह संदेश जा रहा है कि भ्रष्टाचार के मामलों में प्रशासन का रवैया नरम है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते कठोर प्रशासनिक निर्णय नहीं लिए गए, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का आक्रोश और बढ़ेगा।

शैलेश तिवारी ने मांग की कि एसीबी की कार्रवाई में पकड़े गए सभी अधिकारियों और कर्मचारियों से तत्काल प्रभाव से प्रभारी पद वापस लिए जाएं तथा उनके विरुद्ध सेवा नियमों के तहत विभागीय कार्रवाई शुरू की जाए। उनका कहना है कि प्रशासन को भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी चाहिए, ताकि सरकारी व्यवस्था में जनता का विश्वास कायम रह सके।

उन्होंने कहा कि इस संबंध में प्रशासन को पहले भी अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को उठाने के लिए स्वतंत्रता दिवस से आमरण अनशन का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और जनहित के उद्देश्य से किया जाएगा।

शैलेश तिवारी ने प्रशासन को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा कि यदि 15 अगस्त से पहले उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे ठाणे जिला कलेक्टर कार्यालय के समक्ष अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अनशन के दौरान यदि किसी प्रकार की अप्रिय घटना या स्वास्थ्य संबंधी समस्या उत्पन्न होती है, तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

उन्होंने प्रशासन से अपील की कि जनता के हित, सुशासन और पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त एवं निष्पक्ष कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी व्यवस्था में जनता का भरोसा बना रहे।

नोट: यह समाचार शैलेश तिवारी द्वारा जारी बयान और लगाए गए आरोपों पर आधारित है। प्रशासन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।