BREAKING NEWS
national

Slider

national

Slider Right

Maharashtra

उल्हासनगर

Ulhasnagar/block-2

कल्याण-डोंबिवली

Kalyan-Dombivli/block-2

ठाणे

Thane/block-3

क्राइम

Crime/block-7

महाराष्ट्र

Maharashtra/block-8

मुंबई

Mumbai/block-9

मनोरंजन

entertainment/block-4

राष्ट्रीय खबर

national/block-1

खेल

sports/block-6

बिजनेस

Business/block-6

लाइफस्टाइल

lifestyle/block-5

सियासत

politics

Latest Articles

लखनऊ अग्निकांड के बाद बड़ा सवाल: क्या उल्हासनगर के कोचिंग क्लासेस में भी मंडरा रहा है मौत का खतरा?


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में कई छात्रों की जान चली गई, जबकि दर्जनों छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। आग लगने के बाद भवन में फंसे छात्रों की चीख-पुकार, खिड़कियों और ऊपरी मंजिलों से जान बचाने के लिए छलांग लगाने के दृश्य ने देशभर के अभिभावकों को भयभीत कर दिया।

लखनऊ की इस त्रासदी के बाद अब सवाल उल्हासनगर की ओर भी उठने लगे हैं। शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुके उल्हासनगर में सैकड़ों कोचिंग क्लासेस, ट्यूशन सेंटर, लाइब्रेरी और प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन हजारों विद्यार्थी पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या इन संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं? क्या कोई बड़ा हादसा होने से पहले प्रशासन जागेगा?

संकरी गलियां, भीड़भाड़ वाली इमारतें और सुरक्षा पर सवाल

उल्हासनगर के कई कोचिंग क्लासेस ऐसी बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही सीढ़ी उपलब्ध है। कई जगहों पर पार्किंग क्षेत्र, कॉरिडोर और सीढ़ियां भी अतिक्रमण या सामान से भरी हुई दिखाई देती हैं। यदि ऐसी स्थिति में आग लग जाए या कोई अन्य आपातकालीन घटना हो जाए, तो सैकड़ों छात्रों की सुरक्षित निकासी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आग से अधिक जानें धुएं, घबराहट और भगदड़ के कारण जाती हैं। यदि भवन में पर्याप्त वेंटिलेशन, फायर एग्जिट और आपातकालीन व्यवस्था न हो तो कुछ ही मिनटों में स्थिति भयावह रूप ले सकती है।

फायर NOC है या सिर्फ कागजों में सुरक्षा?

शहर के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल सभी कोचिंग क्लासेस और शिक्षण संस्थानों का विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट कराए। यह जांच की जाए कि:

क्या सभी संस्थानों के पास वैध फायर NOC है?

क्या भवनों में पर्याप्त अग्निशमन यंत्र उपलब्ध हैं?

क्या फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर कार्यरत हैं?

क्या आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था है?

क्या छात्रों और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है?

क्या अग्निशमन विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण किया जाता है?

हजारों अभिभावकों की बढ़ी चिंता

लखनऊ हादसे के बाद उल्हासनगर के अभिभावकों में भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कोचिंग क्लासेस भेजते हैं, लेकिन यदि सुरक्षा व्यवस्था ही कमजोर हो तो यह किसी बड़े खतरे को न्योता देने जैसा है।

अभिभावकों का मानना है कि जिस तरह स्कूलों के लिए सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं, उसी प्रकार कोचिंग संस्थानों के लिए भी कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए और उनके पालन की नियमित निगरानी होनी चाहिए।

प्रशासन के लिए चेतावनी या इंतजार किसी हादसे का?

उल्हासनगर में अब तक किसी बड़े कोचिंग अग्निकांड की घटना सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में लापरवाही अक्सर हादसे के बाद ही उजागर होती है। ऐसे में प्रशासन, उल्हासनगर महानगरपालिका, अग्निशमन विभाग और संबंधित अधिकारियों को समय रहते व्यापक निरीक्षण अभियान चलाकर सुरक्षा मानकों की समीक्षा करनी चाहिए।

बड़ा सवाल

क्या उल्हासनगर में लखनऊ जैसी त्रासदी को रोकने के लिए प्रशासन अभी से सक्रिय होगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुलेगी?

लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई भी छोटी चूक बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।














सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल का जनहित अभियान: 29 जून 2026 को निःशुल्क मोतियाबिंद जांच, ऑपरेशन संबंधी परामर्श भी मिलेगा।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

समाज के प्रत्येक वर्ग तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल द्वारा 29 जून (सोमवार) को निःशुल्क मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक आयोजित होगा, जिसमें नेत्र रोगों से संबंधित समस्याओं का प्रारंभिक परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा।

हॉस्पिटल प्रशासन के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ मोतियाबिंद की समस्या आम होती जा रही है। समय पर जांच और उपचार न होने पर दृष्टि प्रभावित हो सकती है। इसी उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मनीष मिरानी द्वारा मरीजों की जांच की जाएगी तथा उन्हें उचित उपचार संबंधी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

शिविर के दौरान मरीजों की मोतियाबिंद की प्रारंभिक स्क्रीनिंग की जाएगी, जिससे रोग की स्थिति का पता लगाया जा सके। जिन मरीजों को ऑपरेशन की आवश्यकता होगी, उन्हें आधुनिक तकनीक से उपलब्ध उपचार और ऑपरेशन पैकेज की विस्तृत जानकारी भी दी जाएगी।

सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल ने बताया कि संस्थान हमेशा से गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। अस्पताल में सुरक्षित, आधुनिक और दर्दरहित उपचार पद्धतियों के माध्यम से मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

हॉस्पिटल प्रशासन ने विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दृष्टि संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों से इस निःशुल्क शिविर का लाभ उठाने की अपील की है। अस्पताल का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार से मोतियाबिंद के कारण होने वाली दृष्टि हानि को रोका जा सकता है तथा लोगों को बेहतर और स्वस्थ जीवन प्रदान किया जा सकता है।

संपर्क एवं पंजीकरण

शिविर में भाग लेने के इच्छुक नागरिक पूर्व पंजीकरण अथवा अधिक जानकारी के लिए निम्न नंबर पर संपर्क कर सकते हैं:

डॉ. मनीष मिरानी

📞  8237898959

       8108098576

स्थान: सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल

टाउन हॉल के पास,

उल्हासनगर-3

"साफ दृष्टि, बेहतर जीवन" के संदेश के साथ आयोजित यह शिविर समाज में नेत्र स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।














उल्हासनगर में ‘अल्टरनेट साइड’ योजना के नाम पर ₹50,000 हज़ार करोड़ के कथित भूमि घोटाले का आरोप, SDO कार्यालय की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में वैकल्पिक भूखंड (अल्टरनेट साइड) योजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों और शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस योजना के तहत वर्षों से बड़े पैमाने पर भूमि संबंधी गड़बड़ियां की गई हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि इस कथित अनियमितता का आर्थिक दायरा करीब ₹50,000 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।

शिकायतों के अनुसार, कुछ बिल्डरों, प्रभावशाली लोगों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से योजना का लाभ नियमों के विपरीत तरीके से उठाया गया। आरोप है कि एक ही मूल भूखंड के आधार पर बार-बार वैकल्पिक भूखंड हासिल किए गए और उनके हस्तांतरण के जरिए भारी आर्थिक फायदा कमाया गया।

आरोपों का आधार

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में वैकल्पिक भूखंड प्राप्त करने के बाद संबंधित लाभार्थियों ने उन भूखंडों का हस्तांतरण या विक्रय कर दिया, लेकिन बाद में फिर उसी मूल दावे के आधार पर नए भूखंडों की मांग की गई। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर ऐसी मांगों को स्वीकृति भी दी गई।

इसके अलावा यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जिन जमीनों के बदले वैकल्पिक भूखंड दिए गए, उनमें से कई मामलों में मूल भूमि का न तो विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही उस पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित किया गया। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।

निष्पक्ष जांच की मांग

मामले को लेकर अब स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है। शिकायतकर्ताओं ने ACB, CID, SIT या CBI जैसी एजेंसियों से पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सभी दस्तावेजों, मंजूरियों और भूमि अभिलेखों की गहन जांच की जाए, तो कई अहम तथ्य उजागर हो सकते हैं।

फिलहाल संबंधित विभागों या अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

यदि लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला महाराष्ट्र के सबसे बड़े कथित भूमि घोटालों में से एक के रूप में सामने आ सकता है।














उल्हासनगर-५ स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला प्रकरण: कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी, कानूनी हलकों में बढ़ी हलचल!


(फाइल फोटो) 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला से जुड़े कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों के आरोपों ने अब नया मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार, मामले को लेकर कानूनी गतिविधियां तेज हो गई हैं और इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया जा चुका है अथवा जल्द ही याचिका दायर किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

जानकार सूत्रों का दावा है कि गौशाला के संचालन, वित्तीय प्रबंधन, अनुदान राशि के उपयोग, लेखा-जोखा तथा अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में नियमों की अनदेखी तथा वित्तीय पारदर्शिता को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है। इन आरोपों की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग भी लगातार जोर पकड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, मामले से संबंधित दस्तावेज, वित्तीय अभिलेख और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी एकत्रित कर कानूनी स्तर पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। यदि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन होता है, तो न्यायालय संबंधित पक्षों से जवाब तलब कर सकता है तथा आरोपों की जांच के लिए सक्षम एजेंसियों को आवश्यक निर्देश भी दे सकता है।

स्थानीय स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। सामाजिक संगठनों, गौसेवा से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा नागरिकों के बीच यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कई लोगों का मानना है कि यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो इससे गौशाला के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू उजागर हो सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर, संबंधित पक्षों की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न्यायालय अथवा किसी जांच एजेंसी द्वारा भी फिलहाल कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण में और भी महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं, जिससे मामले की दिशा और गंभीरता स्पष्ट हो सकेगी। यदि याचिका औपचारिक रूप से दायर होती है, तो यह मामला क्षेत्र की सबसे चर्चित कानूनी और प्रशासनिक बहसों में से एक बन सकता है।

(अस्वीकरण: यह समाचार सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व संबंधित अधिकारियों, न्यायालय अथवा जांच एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा की जानी चाहिए।)














उल्हासनगर मनपा के PWD विभाग में करोड़ों के कथित फर्जी बिलों का खेल, 'शंकर' नामक व्यक्ति पर नेटवर्क संचालित करने का आरोप।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में कथित तौर पर करोड़ों रुपये के फर्जी बिलों से जुड़े एक बड़े घोटाले की चर्चा जोर पकड़ रही है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि "शंकर" नाम का एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख संचालक है, जो लंबे समय से कथित रूप से जाली बिलों के माध्यम से सरकारी धन के दुरुपयोग में शामिल रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस मामले में विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ठेकेदारी कार्यों से जुड़े भुगतान के नाम पर फर्जी बिल तैयार किए गए और इसके एवज में कथित रूप से कमीशन का लेन-देन भी हुआ।

कार्यालय और आवास की जांच से हो सकते हैं बड़े खुलासे

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, यदि संबंधित व्यक्ति के कार्यालय और निवास स्थान की गहन एवं निष्पक्ष जांच की जाए, तो कथित फर्जी बिलों, संदिग्ध दस्तावेजों तथा वित्तीय लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं। सूत्रों का यह भी दावा है कि हाल के दिनों में संबंधित व्यक्ति ने अपना कार्यालय दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर लिया है, जिससे मामले को लेकर और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने उठाई जांच की मांग

मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

सरकारी धन के उपयोग पर उठे सवाल

इस कथित घोटाले ने महानगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली और सरकारी धन के उपयोग को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह सार्वजनिक धन और जनविश्वास दोनों के साथ गंभीर खिलवाड़ है।

फिलहाल मामले में संबंधित अधिकारियों या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां और प्रशासन इस प्रकरण में क्या कदम उठाते हैं।














महाराष्ट्र में प्रीपेड स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं, महावितरण ने हाईकोर्ट में दी जानकारी।


नागपुर: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र में प्रीपेड इलेक्ट्रिक स्मार्ट मीटरों को लेकर चल रहे विरोध और आशंकाओं के बीच महावितरण (MSEDCL) ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए स्पष्ट किया है कि वर्तमान में राज्य में किसी भी उपभोक्ता के लिए प्रीपेड स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं हैं। कंपनी ने अदालत को बताया कि प्रीपेड मीटर केवल उन्हीं ग्राहकों को उपलब्ध कराए जाएंगे जो स्वयं इसकी मांग करेंगे।

महावितरण के इस बयान को लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्मार्ट मीटरों को लेकर विरोध प्रदर्शन और जनजागरण अभियान चलाए जा रहे हैं।

जनहित याचिका के बाद अदालत में सुनवाई

यह मामला विदर्भ वीज ग्राहक संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से अदालत के समक्ष पहुंचा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रीपेड मीटर लागू करने का निर्णय बिना पर्याप्त अध्ययन और जनहित के व्यापक मूल्यांकन के लिया गया है।

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रीपेड मीटर व्यवस्था से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। यदि रिचार्ज समाप्त हो जाता है तो बिजली आपूर्ति स्वतः बंद हो सकती है, जिससे आम नागरिकों, वरिष्ठ नागरिकों और ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य के सभी नागरिक डिजिटल भुगतान या ऑनलाइन लेनदेन करने में सक्षम नहीं हैं। बड़ी संख्या में लोगों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा स्मार्ट मीटर व्यवस्था के कारण मीटर रीडिंग लेने और बिजली बिल वितरित करने वाले हजारों कर्मचारियों के रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।

फिलहाल केवल पोस्टपेड स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं

महावितरण ने अदालत को बताया कि वर्तमान में राज्यभर में केवल पोस्टपेड स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। इन मीटरों के माध्यम से उपभोक्ता पहले की तरह बिजली का उपयोग कर बाद में बिल का भुगतान करते हैं।

जानकारी के अनुसार राज्य में ठेकेदार कंपनियों द्वारा अब तक एक करोड़ से अधिक स्मार्ट मीटर स्थापित किए जा चुके हैं। बिजली मीटर तकनीक के विकास की प्रक्रिया में पहले इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक मीटर, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीटर, उसके बाद डिजिटल और कम्युनिकेशन आधारित मीटर लगाए गए और अब स्मार्ट मीटरों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।

उपभोक्ताओं के अधिकारों पर हाईकोर्ट के अहम सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने उपभोक्ताओं के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या किसी उपभोक्ता को स्मार्ट मीटर लगाने से इनकार करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है? क्या स्मार्ट मीटर स्थापित करने से पहले उपभोक्ता की अनुमति लेना अनिवार्य है? क्या ऐसा कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद है?

खंडपीठ ने इन सभी सवालों पर याचिकाकर्ता को आगामी सोमवार तक विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आशंकाओं और निराधार आरोपों के आधार पर किसी योजना का विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता।

राज्यभर में बहस तेज

स्मार्ट मीटरों को लेकर महाराष्ट्र में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। विपक्षी दलों और विभिन्न उपभोक्ता संगठनों ने स्मार्ट मीटर योजना पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार और महावितरण इसे बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं।

अब सभी की नजरें हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां उपभोक्ताओं के अधिकारों, स्मार्ट मीटरों की वैधता और प्रीपेड व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।














उल्हासनगर मनपा और पुलिस के दावों की खुली पोल, फर्जी डॉक्टर अब भी कर रहे इलाज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और दर्जनों शिकायतों के बावजूद अवैध चिकित्सा का कारोबार खुलेआम जारी रहने का मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस में मामले दर्ज होने और महानगरपालिका द्वारा कार्रवाई के दावे किए जाने के बावजूद कई कथित फर्जी डॉक्टर अब भी बिना मान्यता प्राप्त डिग्री और आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता के मरीजों का उपचार कर रहे हैं। इससे नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, शहर में ऐसे कई व्यक्तियों की पहचान की गई थी जो बिना वैध मेडिकल लाइसेंस के क्लीनिक संचालित कर रहे थे। इनमें से कई के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं और कुछ मामलों में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की। इसके बावजूद संबंधित क्लीनिकों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से नागरिकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

26 फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें, फिर भी जारी है प्रैक्टिस

जानकारी के मुताबिक, शहर में करीब 26 कथित फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें की गई थीं। जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं। आरोप है कि इनमें से कुछ लोग बिना किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा डिग्री के मरीजों को दवाइयां लिख रहे हैं, बीमारियों का उपचार कर रहे हैं और चिकित्सा परामर्श भी दे रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है, जबकि वास्तविकता में कई क्लीनिक आज भी संचालित हो रहे हैं। इससे लोगों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

महानगरपालिका प्रशासन पर उठे सवाल

फर्जी डॉक्टरों के मामले में महानगरपालिका प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर कार्रवाई और निरीक्षण के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।

सामाजिक संगठनों और नागरिकों का आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कठोर कदम उठाए होते, तो लोगों की जान और स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे गंभीर जोखिमों को रोका जा सकता था।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई चिंता

चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बिना योग्य डॉक्टरों द्वारा किया जाने वाला उपचार मरीजों के लिए घातक साबित हो सकता है। गलत निदान, अनुचित दवाइयों का उपयोग और आपातकालीन परिस्थितियों में सही चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण मरीजों की जान तक खतरे में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अवैध क्लीनिकों को तत्काल सील कर दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

कड़ी कार्रवाई की मांग

शहर के नागरिकों ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन से मांग की है कि फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाकर सभी अवैध क्लीनिकों की जांच की जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई की जाए जिससे भविष्य में कोई भी व्यक्ति लोगों की जान से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके।

फिलहाल यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और नागरिक प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर बनाए हुए हैं।