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‘मेवाड आइसक्रीम’ की गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल, FDA से वैज्ञानिक जांच की मांग।

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों के बाहरी इलाकों तक इन दिनों ठेलों और चलती-फिरती गाड़ियों के माध्यम से आइसक्रीम, कुल्फी और रबड़ी की बिक्री बढ़ती नजर आ रही है। कम कीमत, आकर्षक रंग-रूप और अलग-अलग स्वाद के कारण इन उत्पादों की ओर खासकर बच्चे तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इसी बीच ‘मेवाड आइसक्रीम’ नाम से बेचे जा रहे कुछ उत्पादों की गुणवत्ता और उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री को लेकर नागरिकों ने चिंता जताई है।

नागरिकों का कहना है कि इन उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब केवल आधिकारिक जांच के जरिए ही मिल सकता है। इसी कारण खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) से संबंधित उत्पादों के नमूने लेकर उनकी वैज्ञानिक एवं प्रयोगशाला जांच कराने की मांग की जा रही है।

दूध की वसा या वनस्पति वसा? जांच से सामने आएगी वास्तविकता

नागरिकों की मांग है कि जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाए कि संबंधित उत्पादों में दूध की वसा का इस्तेमाल किया जा रहा है या वनस्पति वसा जैसी सामग्री का। साथ ही इस्तेमाल किए जाने वाले खाद्य रंग, फ्लेवर और अन्य सामग्री निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप हैं या नहीं, इसकी भी जांच की जाए।

हालांकि, किसी भी उत्पाद में ‘डालडा’, वनस्पति वसा या अन्य किसी संदिग्ध सामग्री के इस्तेमाल का दावा बिना आधिकारिक नमूना जांच के प्रमाणित नहीं माना जा सकता। इसलिए इन आरोपों को लेकर निष्कर्ष निकालने के बजाय FDA द्वारा नमूने लेकर प्रयोगशाला रिपोर्ट सामने लाना अधिक महत्वपूर्ण होगा।

आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट में अंतर भी महत्वपूर्ण

खाद्य उत्पाद में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के आधार पर आइसक्रीम और अन्य फ्रोजन डेजर्ट की श्रेणी अलग हो सकती है। ऐसे में केवल उत्पाद का नाम या उसकी कीमत देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि वह निर्धारित मानकों के अनुसार आइसक्रीम है या किसी अन्य श्रेणी का फ्रोजन उत्पाद।

चलती-फिरती गाड़ियों और खुले बाजार में बिकने वाले कई उत्पादों पर निर्माता, सामग्री, लाइसेंस या अन्य आवश्यक जानकारी उपभोक्ताओं को स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में आधिकारिक नमूना लेकर उसकी जांच कराना ही उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और श्रेणी निर्धारित करने का उचित तरीका है।

कथित मिलावट को लेकर चर्चाएं, लेकिन आधिकारिक पुष्टि नहीं

कुछ नागरिकों ने आशंका जताई है कि कम कीमत पर उत्पाद तैयार करने के लिए वनस्पति वसा या अन्य वैकल्पिक सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा कृत्रिम रंग और फ्लेवर के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

कुछ लोगों द्वारा डिटर्जेंट, औद्योगिक रंग, यूरिया या फॉर्मेलिन जैसे पदार्थों के संभावित इस्तेमाल की आशंका भी व्यक्त की गई है। लेकिन इन गंभीर दावों की फिलहाल कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

इसलिए बिना प्रयोगशाला जांच के ऐसे पदार्थों की मौजूदगी का दावा करना उचित नहीं होगा। खाद्य सुरक्षा के मामले में अफवाहों के बजाय वैज्ञानिक परीक्षण और आधिकारिक रिपोर्ट को ही आधार बनाया जाना चाहिए।

खुले में बिक्री और स्वच्छता भी जांच के दायरे में हो

गुणवत्ता के साथ-साथ चलती-फिरती गाड़ियों से खाद्य पदार्थों की बिक्री के दौरान स्वच्छता और भंडारण व्यवस्था की जांच भी जरूरी है।

खुले वातावरण में रखे गए खाद्य पदार्थ धूल, वाहनों के धुएं, मक्खियों और अन्य प्रदूषकों के संपर्क में आ सकते हैं। इसके अलावा विक्रेताओं की व्यक्तिगत स्वच्छता, इस्तेमाल किए जाने वाले पानी, चम्मच एवं बर्तनों की सफाई तथा उत्पादों के सुरक्षित तापमान पर भंडारण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

चूंकि आइसक्रीम और कुल्फी बच्चों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हैं, इसलिए खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

FSSAI पंजीकरण और लाइसेंस की जांच की मांग

नागरिकों ने संबंधित विक्रेताओं के FSSAI पंजीकरण या आवश्यक लाइसेंस की भी जांच करने की मांग की है।

प्रशासन से यह पता लगाने की मांग की गई है कि संबंधित खाद्य उत्पाद कहां तैयार किए जाते हैं, उनमें इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल कहां से आता है, उत्पादों का भंडारण किस प्रकार किया जाता है और बिक्री के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।

यदि जांच में किसी प्रकार का उल्लंघन सामने आता है, तो संबंधित व्यक्ति या प्रतिष्ठान के खिलाफ लागू कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।

FDA से विशेष जांच अभियान चलाने की मांग

नागरिकों की ओर से FDA के समक्ष मुख्य रूप से निम्न मांगें रखे जाने की बात कही जा रही है—

- चलती-फिरती आइसक्रीम, कुल्फी और रबड़ी विक्रेताओं की विशेष जांच की जाए।

- बिक्री के लिए रखे खाद्य पदार्थों के आधिकारिक नमूने लिए जाएं।

- नमूनों को मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में जांच के लिए भेजा जाए।

- खाद्य रंग, फ्लेवर, दूध की वसा या वनस्पति वसा सहित इस्तेमाल की जा रही सामग्री की जांच की जाए।

- संबंधित विक्रेताओं के FSSAI पंजीकरण और लाइसेंस की पुष्टि की जाए।

- खाद्य पदार्थों के भंडारण, तापमान नियंत्रण और स्वच्छता व्यवस्था की जांच की जाए।

- किसी भी नियम उल्लंघन की पुष्टि होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

- जांच के निष्कर्षों को आवश्यकतानुसार सार्वजनिक किया जाए, ताकि अफवाहों और गलत जानकारी पर रोक लग सके।

सभी ‘मेवाड’ विक्रेताओं को दोषी मानना उचित नहीं

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘मेवाड आइसक्रीम’ नाम का इस्तेमाल करने वाले प्रत्येक विक्रेता या उत्पाद को खराब, मिलावटी या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताना उचित नहीं होगा।

किसी खास उत्पाद में मिलावट या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि केवल आधिकारिक नमूना, वैज्ञानिक परीक्षण और सक्षम विभाग की रिपोर्ट के आधार पर ही की जा सकती है।

यदि जांच में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी होगी। वहीं, यदि उत्पाद निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए जाते हैं, तो यह जानकारी भी जनता के सामने आनी चाहिए। इससे उपभोक्ताओं को सही जानकारी मिलेगी और बिना आधार की चर्चाओं पर भी रोक लगेगी।

अभिभावकों से सावधानी बरतने की अपील

जब तक संबंधित उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, अभिभावकों को बच्चों के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खरीदते समय सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

खरीदारी करते समय यह देखना उपयोगी है कि उत्पाद सुरक्षित और साफ तरीके से रखा गया है या नहीं, बिक्री स्थल की स्वच्छता कैसी है तथा खाद्य पदार्थों का भंडारण उचित तरीके से किया जा रहा है या नहीं।

कम कीमत और आकर्षक स्वाद से अधिक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ की सुरक्षा और गुणवत्ता है।

अब मुख्य नजर FDA की संभावित कार्रवाई पर है। क्या संबंधित विक्रेताओं के नमूने लिए जाएंगे? क्या उनकी प्रयोगशाला जांच होगी? और क्या जांच रिपोर्ट से इन उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी?

फिलहाल यह मामला आरोपों से अधिक वैज्ञानिक जांच की मांग का है और अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक रिपोर्ट आने के बाद ही निकाला जाना चाहिए।

















 


विवाह प्रमाणपत्र के लिए इलेक्शन कार्ड अनिवार्य बताए जाने पर सवाल, उल्हासनगर मनपा के CFC विभाग की प्रक्रिया पर उठी जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के CFC विभाग में विवाह प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पहुंचने वाले कुछ दंपतियों को कथित तौर पर इलेक्शन कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) लाने के लिए कहा जा रहा है। साथ ही, उन्हें कथित रूप से यह बताया जा रहा है कि आधार कार्ड स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस प्रक्रिया को लेकर अब नागरिकों के बीच कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।

नागरिकों का कहना है कि यदि विवाह प्रमाणपत्र के लिए किसी विशेष पहचान दस्तावेज को अनिवार्य किया गया है, तो उसके संबंध में स्पष्ट एवं आधिकारिक नियम, शासनादेश या विभागीय निर्देश सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

वहीं, स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि महाराष्ट्र की अन्य महानगरपालिकाओं में विवाह प्रमाणपत्र की प्रक्रिया के दौरान पहचान संबंधी दस्तावेजों को लेकर ऐसी कोई समान व्यवस्था दिखाई नहीं देती, जिसमें केवल इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य बताया जाए और आधार कार्ड को स्वीकार न किया जाए। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक नियम और वर्तमान प्रक्रिया की पुष्टि संबंधित विभाग से किया जाना आवश्यक है।

नागरिकों ने उठाए सवाल

यदि CFC विभाग में वास्तव में इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य किया गया है, तो नागरिकों का सवाल है कि

इसका आधार क्या है?

क्या इसके संबंध में कोई आधिकारिक शासनादेश या मनपा का लिखित आदेश जारी किया गया है?

आधार कार्ड को स्वीकार नहीं करने का कारण क्या है?

क्या सभी नागरिकों को इस संबंध में समान और स्पष्ट जानकारी दी जा रही है?

इन सवालों के कारण नागरिकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

आयुक्त से निष्पक्ष जांच की मांग

नागरिकों ने उल्हासनगर महानगरपालिका की आयुक्त मनीषा आव्हाले से इस मामले को गंभीरता से लेते हुए CFC विभाग की विवाह प्रमाणपत्र संबंधी प्रक्रिया की जांच कराने की मांग की है।

साथ ही, यदि इलेक्शन कार्ड को अनिवार्य करने का कोई आधिकारिक नियम या आदेश मौजूद है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए और नागरिकों को स्पष्ट जानकारी दी जाए। वहीं, यदि ऐसी कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है, तो कथित रूप से अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की प्रक्रिया पर भी आवश्यक कार्रवाई की जाए।

फिलहाल, यह मामला नागरिकों द्वारा उठाई गई शिकायत और आरोपों पर आधारित है। संबंधित विभाग या महानगरपालिका प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

















उल्हासनगर में नशे के नेटवर्क को लेकर चिंता, बैंकॉक-थाईलैंड कनेक्शन की चर्चाओं से बढ़ी सतर्कता।

(फाइल इमेज) 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में युवाओं और बच्चों को नशे से दूर रखने को लेकर चिंता के बीच बैंकॉक और थाईलैंड से नशीले पदार्थों की कथित तस्करी को लेकर चर्चाएं सामने आ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, उल्हासनगर से जुड़े कुछ लोग कथित तौर पर कैरियर के रूप में विदेश यात्रा कर रहे हैं और उनके जरिए गांजा या अन्य प्रतिबंधित नशीले पदार्थ भारत लाए जाने की आशंका जताई जा रही है।

सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) की नजर कुछ संदिग्ध गतिविधियों और संभावित कैरियर्स पर हो सकती है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।

बच्चों और युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता

नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक विषय भी है। यदि किसी संगठित नेटवर्क के जरिए नशीले पदार्थ शहर तक पहुंच रहे हैं, तो संबंधित एजेंसियों द्वारा इसकी गहन जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई बेहद जरूरी है।

क्या जांच एजेंसियां करेंगी कार्रवाई?

सूत्रों के अनुसार, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय यात्राओं, संपर्कों और कथित कैरियर नेटवर्क की जांच की आवश्यकता है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, बैंकॉक-थाईलैंड से कथित तौर पर गांजा व अन्य नशीले पदार्थ लाने वाले कई कैरियर्स गिरफ्तार किए गए हैं। कुछ आरोपी देश की अलग-अलग जेलों में बंद बताए जा रहे हैं। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

हालांकि, फिलहाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जब तक जांच एजेंसियों की ओर से आधिकारिक पुष्टि या कानूनी कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आती, तब तक इन दावों को केवल सूत्रों पर आधारित जानकारी और जांच का विषय माना जाना चाहिए।

उल्हासनगर के नागरिकों की मांग है कि यदि शहर में नशीले पदार्थों की तस्करी का कोई नेटवर्क सक्रिय है, तो संबंधित केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियां इसकी निष्पक्ष जांच कर युवाओं को नशे के खतरे से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।




















 

उल्हासनगर मनपा के PWD में पदोन्नति को लेकर विवाद, संदीप जाधव पर लगे मिलीभगत के आरोप।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के PWD विभाग में अधिकारियों की पदोन्नति और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विभाग में कार्यरत उप अभियंता संदीप जाधव पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने मनपा से जुड़े एक कथित दलाल के साथ मिलीभगत कर श्रीमती रमाबाई नारायण पाटिल (विवाह के बाद: मनाली मनील भोईर) को आगे कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) के पद पर नियुक्त अथवा पदोन्नत कराने के लिए कथित रूप से प्रयास किए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्रीमती रमाबाई नारायण पाटिल इ.मा.व. यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी से संबंधित हैं और उनका क्षेत्र कोंकण-2 बताया गया है। उन्हें महाराष्ट्र सरकार की ओर से उप अभियंता (सिविल/स्थापत्य) के रिक्त पद पर नियुक्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब इसी नियुक्ति के बाद उन्हें कार्यकारी अभियंता के पद तक पहुंचाने के लिए कथित रूप से कुछ अधिकारियों और मनपा से जुड़े लोगों द्वारा प्रयास किए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

🔴 पदोन्नति प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति उप अभियंता पद पर हुई है, तो उसे कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नत करने के लिए नियम, पात्रता, वरिष्ठता, विभागीय प्रक्रिया और शासन के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है या नहीं।

आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में संदीप जाधव की कथित भूमिका महत्वपूर्ण है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में संबंधित नियुक्ति एवं पदोन्नति से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच आवश्यक मानी जा रही है।

🔎 ACB जांच को लेकर भी सवाल

संदीप जाधव को लेकर यह भी आरोप सामने आया है कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से संबंधित जांच पहले से चल रही है। यदि यह जानकारी आधिकारिक दस्तावेजों से सत्यापित होती है, तो ऐसी स्थिति में उनके प्रशासनिक निर्णयों और पदोन्नति प्रक्रिया में कथित भूमिका की भी निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग उठ रही है।

💰 PWD में कथित बोगस बिलों का मामला

इसके अलावा, PWD विभाग में संदीप जाधव के कार्यकाल को लेकर कथित बोगस बिलों के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे बिल तैयार किए गए, जिनकी जांच किए जाने की आवश्यकता है।

यह भी आरोप है कि संदीप जाधव पिछले करीब 20 वर्षों से PWD विभाग में कार्यरत हैं और इस दौरान शंकर नामक व्यक्ति के साथ मिलकर कथित रूप से कई अनियमितताएं की गईं।

हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, बिलों, टेंडर दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही हो सकती है।

📌 उच्चस्तरीय जांच की मांग

मामले को लेकर मांग की जा रही है कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और महाराष्ट्र सरकार द्वारा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। विशेष रूप से—

उप अभियंता से कार्यकारी अभियंता पद पर पदोन्नति की प्रक्रिया की जांच हो।

संबंधित अधिकारी की पात्रता और वरिष्ठता की जांच की जाए।

नियुक्ति एवं पदोन्नति से संबंधित शासनादेश और विभागीय रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं।

PWD विभाग के पिछले वर्षों के कथित बोगस बिलों का विशेष ऑडिट कराया जाए।

संबंधित ठेकेदारों एवं मध्यस्थों की भूमिका की जांच की जाए।

यदि ACB जांच वास्तव में लंबित है, तो उसकी वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जाए।

उल्हासनगर महानगरपालिका की आयुक्त मनीषा आव्हाले से उल्हासनगर की जनता की विनम्र अपील है कि संदीप जाधव को उप अभियंता अथवा कार्यकारी अभियंता का पद न दिया जाए, बल्कि उन्हें केवल कनिष्ठ अभियंता (Junior Engineer) के पद पर ही नियुक्त/तैनात किया जाए।

अब देखना यह होगा कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और महाराष्ट्र सरकार इन गंभीर आरोपों को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाई जाती है।

नोट: उपरोक्त रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। संबंधित अधिकारियों/व्यक्तियों का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।




















उल्हासनगर में 1 जनवरी 2006 के बाद बने निर्माणों की वैधता पर बड़ा सवाल! RTI के जवाब ने बढ़ाई जांच की मांग।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में अवैध निर्माणों का मुद्दा एक बार फिर गंभीर चर्चा में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की PIL क्रमांक 105/2003 से जुड़े निर्देशों और हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि 1 जनवरी 2006 के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में मंजूर किए गए निर्माणों, प्लान, CC और OC की वैधता का रिकॉर्ड किस स्तर पर उपलब्ध है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात नगर रचना विभाग ने RTI के जवाब में कही है। यह जवाब श्री अर्जुनसिंग आहूजा द्वारा 17 मार्च 2026 को दायर किए गए RTI आवेदन के संदर्भ में 30 अप्रैल 2026 को जारी किया गया।

RTI जवाब में क्या कहा गया?

उल्हासनगर महानगरपालिका के नगर रचना विभाग की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं (Legal Structures) से संबंधित जानकारी इस विभाग में उपलब्ध नहीं है।

यह जवाब ऐसे समय सामने आया है जब शहर में पुराने और नए निर्माणों की वैधता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

PIL 105/2003 का संदर्भ

उल्हासनगर के निर्माणों से संबंधित न्यायिक मामलों के संदर्भ में PIL No. 105/2003 का उल्लेख किया जाता रहा है। इस मामले में 2005 से पहले के निर्माणों के नियमितीकरण और उसके बाद अवैध निर्माणों पर नियंत्रण से जुड़े निर्देशों का संदर्भ सामने आता है।

इसी पृष्ठभूमि में अब यह सवाल उठ रहा है कि 1 जनवरी 2006 के बाद शहर में हुए निर्माणों की निगरानी, मंजूर प्लान, Commencement Certificate (CC) और Occupation Certificate (OC) का रिकॉर्ड किस प्रकार संधारित किया गया है।

क्या सभी मंजूर निर्माणों की जांच होनी चाहिए?

RTI के जवाब के बाद अब एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है—यदि नगर रचना विभाग के पास 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र की कानूनी संरचनाओं से संबंधित समेकित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो क्या इस अवधि में मंजूर किए गए सभी प्रमुख भवन प्लान, CC और OC की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए?

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध RTI पत्र और उसमें दर्ज जानकारी पर आधारित है। किसी व्यक्ति, अधिकारी, बिल्डर या संस्था पर अवैध निर्माण अथवा न्यायालय के आदेश की अवमानना का आरोप तथ्यात्मक जांच और सक्षम न्यायिक/प्रशासनिक निष्कर्ष के बिना अंतिम रूप से नहीं माना जाना चाहिए।






















मल्हार वॉटरफ्रंट पर निर्माण व दस्तावेजों को लेकर सवाल, जांच की मांग; प्लॉट 63, सेक्शन 4/A और CTS 9113 से जुड़ी जानकारी पर खरीदारों को सतर्क रहने की अपील।

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-3 क्षेत्र में उल्हासनगर महानगरपालिका के समीप स्थित ‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ नामक इमारत से संबंधित दस्तावेजों और निर्माण प्रक्रिया को लेकर कुछ गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इमारत प्लॉट नंबर 63, सेक्शन 4/A, शीट नंबर 51 तथा सी.टी.एस. नंबर 9113 से संबंधित बताई जा रही है। इमारत के लिए नक्शा/खाका क्रमांक UMC/BP/46/24/148 का उल्लेख किया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित संपत्ति के दस्तावेजों में कथित तौर पर वायलेशन अथवा नियमों से संबंधित विसंगतियां होने की बात सामने आई है। साथ ही, निर्माण कार्य से जुड़ी कुछ कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह संपत्ति विकास योजना (Development Plan—DP) के प्रावधानों से प्रभावित होने की बात भी कही जा रही है।

हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, स्वीकृत भवन योजना, विकास अनुमति, निर्माण अनुमति, ऑक्युपेंसी/कम्प्लीशन संबंधी दस्तावेज तथा अन्य आवश्यक मंजूरियों की सक्षम प्राधिकरण से जांच किया जाना जरूरी है।

टाउन प्लानिंग विभाग के रिकॉर्ड की जांच अहम

सूत्रों के अनुसार, उल्हासनगर महानगरपालिका के टाउन प्लानिंग विभाग से संबंधित रिकॉर्ड में इस संपत्ति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो सकती है। यदि किसी प्रकार का निर्माण या दस्तावेजी उल्लंघन पाया जाता है, तो उसकी वास्तविक स्थिति केवल सक्षम प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड और स्थल निरीक्षण के आधार पर स्पष्ट की जा सकती है।

‘मंत्रालय टाइम्स’ को यह भी जानकारी मिली है कि उल्हासनगर शहर में ऐसी कई अन्य इमारतों और संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनके संबंध में Development Plan के प्रावधानों, स्वीकृत योजनाओं अथवा निर्माण अनुमति की स्थिति की जांच आवश्यक हो सकती है।

आगे भी सामने आएगी जानकारी

‘मंत्रालय टाइम्स’ द्वारा उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल के आधार पर ऐसी संपत्तियों से जुड़ी जानकारी एक-एक कर सार्वजनिक करने का प्रयास किया जाएगा। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, बिल्डर या संस्था पर बिना आधिकारिक प्रमाण के आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित में दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों की स्थिति को सामने लाना है।

फ्लैट खरीदारों के लिए जरूरी सावधानी

‘मल्हार वॉटरफ्रंट’ अथवा किसी भी अन्य निर्माण परियोजना में फ्लैट खरीदने से पहले संभावित खरीदारों को केवल विज्ञापन या मौखिक आश्वासन पर निर्भर न रहते हुए संबंधित स्वीकृत प्लान, बिल्डिंग परमिशन, भूमि रिकॉर्ड, DP स्थिति, RERA संबंधी जानकारी (जहां लागू हो), कंप्लीशन/ऑक्युपेंसी दस्तावेज और अन्य वैधानिक मंजूरियों की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए।

महत्वपूर्ण: इस समाचार में उल्लेखित वायलेशन, अनियमितता और DP से प्रभावित होने संबंधी बातें उपलब्ध जानकारी/सूत्रों पर आधारित आरोप या दावे हैं। अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और आदेश से ही स्पष्ट होगी। संबंधित पक्ष का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

















शाम 6 बजे के बाद उल्हासनगर मनपा में गतिविधियों को लेकर उठे सवाल, एंटी चैंबर के इस्तेमाल की जांच की मांग।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद भी कुछ गतिविधियां जारी रहने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर के एक एंटी चैंबर में एक प्रभावशाली नेता की कथित मौजूदगी रहती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

महानगरपालिका से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कार्यालयीन समय के बाद भी कुछ लोगों की आवाजाही बनी रहती है। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान कथित तौर पर बड़े ठेकेदारों, बिल्डरों और शहर के कुछ व्यापारियों से संबंधित कार्यों को लेकर मुलाकातें और चर्चाएं होती हैं।

इन दावों के सामने आने के बाद सवाल यह उठ रहा है कि यदि महानगरपालिका का नियमित कामकाज शाम 6 बजे समाप्त हो जाता है, तो उसके बाद परिसर में किन लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है और किन अधिकारियों अथवा जनप्रतिनिधियों से उनकी मुलाकात होती है।

जनता ने आयुक्त से की जांच की मांग

उल्हासनगर की जनता ने महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि कार्यालयीन समय समाप्त होने के बाद सभी चैंबर और एंटी चैंबर को नियमानुसार लॉक किया जाए तथा अनधिकृत प्रवेश और बैठकों पर रोक सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही महानगरपालिका परिसर की CCTV फुटेज की जांच किए जाने की मांग भी उठ रही है। जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि शाम 6 बजे के बाद महानगरपालिका परिसर में कौन-कौन लोग मौजूद रहे, किस समय प्रवेश और निकास हुआ तथा किन लोगों से मुलाकात हुई।

आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी

यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के बजाय महानगरपालिका की प्रशासनिक पारदर्शिता और कार्यालयीन व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। यदि लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं, तो CCTV फुटेज और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि जिस नेता के संबंध में आरोप लगाए जा रहे हैं, वह कौन है। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम बिना आधिकारिक पुष्टि के सामने रखना उचित नहीं होगा। मामले में महानगरपालिका प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

अब सवाल यही है—क्या उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन शाम 6 बजे के बाद की गतिविधियों की CCTV और प्रवेश रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष जांच करेगा?