उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी
उल्हासनगर महानगरपालिका में जनप्रतिनिधियों के लिए निर्धारित कार्यालयों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा कोई नया नहीं है। उपलब्ध पुराने पत्राचार के अनुसार, करीब एक दशक पहले वर्ष 2016 में ही इस संबंध में मनपा प्रशासन के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए सवाल उठाए गए थे कि क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों का इस्तेमाल उनके रिश्तेदारों द्वारा किया जा सकता है?
इस मामले को लेकर अरजुन सिंह आहूजा ने 6 सितंबर 2016 को उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त से मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की थी। इसके अगले दिन, 7 सितंबर 2016 को ई-मेल के माध्यम से लिखित शिकायत/निवेदन भी भेजा गया था। उपलब्ध ई-मेल रिकॉर्ड में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल और उनके रिश्तेदारों की कथित भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे।
महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों को लेकर विशेष आपत्ति
7 सितंबर 2016 को भेजे गए ई-मेल में विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ मामलों में महिला जनप्रतिनिधियों के पति अथवा भाई उनके कार्यालयों में बैठकर कार्यालय का उपयोग करते हैं।
शिकायतकर्ता ने प्रशासन से मांग की थी कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम और व्यवस्था तय की जाए, ताकि पद एवं कार्यालय के संभावित दुरुपयोग को रोका जा सके।
कार्यालय में अतिरिक्त कुर्सियों पर भी उठाया गया सवाल
शिकायत में जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों में रखी जाने वाली अतिरिक्त कुर्सियों का मुद्दा भी उठाया गया था। ई-मेल में उल्लेख किया गया था कि कुछ कार्यालयों में मुख्य टेबल के आजु- बाजू दो अतिरिक्त कुर्सियां रखी जाती हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या इन कुर्सियों का इस्तेमाल जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों के बैठने के लिए किया जाता है।
आहूजा ने मांग की थी कि संबंधित जनप्रतिनिधि अथवा अध्यक्ष के कार्यालय में उपस्थित होने पर ही कार्यालय खोला जाए। साथ ही, जनप्रतिनिधि की कुर्सी के आसपास रखी गई अतिरिक्त कुर्सियों को हटाने की व्यवस्था की जाए, ताकि कार्यालय का इस्तेमाल केवल अधिकृत व्यक्ति द्वारा ही किया जा सके।
मीरा-भायंदर मनपा की व्यवस्था का उदाहरण
शिकायत में मीरा-भायंदर महानगरपालिका की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया था। ई-मेल में प्रशासन से आग्रह किया गया था कि वहां लागू व्यवस्था की पुष्टि की जाए और यदि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट नियम या प्रक्रिया लागू है, तो उसका अध्ययन कर उल्हासनगर महानगरपालिका में भी उचित व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जाए।
तत्कालीन आयुक्त कार्यालय ने दिया था जवाब
उपलब्ध पत्राचार के अनुसार, शिकायत के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका के तत्कालीन आयुक्त कार्यालय के स्वीय सहायक की ओर से शिकायतकर्ता को ई-मेल के माध्यम से जवाब दिया गया था।
जवाब में शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए बताया गया था कि माननीय आयुक्त के निर्देशानुसार मामले को उचित कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग को भेजा जाएगा।
इस प्रकार, वर्ष 2016 में उठाए गए इस मुद्दे पर मनपा प्रशासन की ओर से शिकायत को संबंधित विभाग तक भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आती है।
करीब एक दशक बाद फिर चर्चा में आया पुराना पत्राचार
अब करीब दस वर्ष पुराने इस पत्राचार के सामने आने से यह सवाल फिर चर्चा में है कि उस समय उठाई गई शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई हुई थी? क्या संबंधित विभाग ने मामले की जांच की थी? क्या जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के इस्तेमाल को लेकर कोई नियम या दिशा-निर्देश जारी किए गए थे? और यदि कार्रवाई हुई थी, तो उसका रिकॉर्ड क्या है?
उपलब्ध ई-मेल और पत्राचार में शिकायत को संबंधित विभाग के पास भेजने की बात तो स्पष्ट रूप से सामने आती है, लेकिन आगे की जांच, कार्रवाई के निष्कर्ष या किसी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि के खिलाफ की गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।
इसलिए वर्ष 2016 में लगाए गए आरोपों को उस समय की शिकायत के रूप में ही देखा जाना चाहिए और उनके तथ्यात्मक सत्यापन के लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड तथा तत्कालीन विभागीय कार्रवाई की जानकारी सामने आना आवश्यक है।
सवाल वही, जवाब आज भी जरूरी
करीब एक दशक पुराने इस पत्राचार से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यालयों के कथित दुरुपयोग और रिश्तेदारों द्वारा कार्यालय के इस्तेमाल का सवाल वर्ष 2016 में ही उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन के सामने उठाया जा चुका था।
उस समय शिकायत पर कार्रवाई के लिए मामला संबंधित विभाग को भेजने का आश्वासन दिया गया था। ऐसे में अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उस शिकायत का अंतिम नतीजा क्या निकला और क्या उस समय उठाए गए सवालों के आधार पर कोई स्थायी व्यवस्था लागू की गई थी?
जनप्रतिनिधि का कार्यालय आखिर जनसेवा के लिए है या उनके रिश्तेदारों के इस्तेमाल के लिए? वर्ष 2016 के इस पुराने पत्राचार ने इस सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है।