मुंबई: दिनेश मिरचंदानी
बॉम्बे हाई कोर्ट ने पासपोर्ट रिन्यूअल से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण और नागरिक अधिकारों को मजबूत करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी आपराधिक मामले के लंबित होने भर से किसी व्यक्ति के पासपोर्ट के नवीनीकरण (Passport Renewal) पर स्वतः रोक नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि किसी नागरिक के यात्रा करने और आजीविका कमाने के अधिकार को केवल तकनीकी और प्रक्रियात्मक अड़चनों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
29 अप्रैल को दिए गए अपने आदेश में हाई कोर्ट ने उन परिस्थितियों पर गंभीर चिंता जताई, जिनमें आवेदकों को पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए आपराधिक अदालतों से “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” (NOC) लेने के लिए मजबूर किया जाता है। अदालत ने कहा कि कई मामलों में न तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ समन जारी हुआ होता है और न ही अदालत द्वारा मामले पर औपचारिक संज्ञान लिया गया होता है, इसके बावजूद NOC की शर्त लगाना नागरिकों के लिए अनावश्यक देरी और परेशानी का कारण बनता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी संकेत दिया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं को इस तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार प्रभावित हों। अदालत के अनुसार, केवल लंबित जांच या प्रारंभिक स्तर के मामलों के आधार पर पासपोर्ट रिन्यूअल रोकना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई स्पष्ट न्यायिक आदेश मौजूद न हो।
इस फैसले को उन हजारों लोगों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिनके खिलाफ विभिन्न स्तरों पर आपराधिक मामले लंबित हैं और जिन्हें नौकरी, व्यवसाय, शिक्षा या अन्य कारणों से विदेश यात्रा करनी पड़ती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में पासपोर्ट अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

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