उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी
उल्हासनगर में वैकल्पिक भूखंड (अल्टरनेट साइड) योजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों और शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस योजना के तहत वर्षों से बड़े पैमाने पर भूमि संबंधी गड़बड़ियां की गई हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि इस कथित अनियमितता का आर्थिक दायरा करीब ₹50,000 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।
शिकायतों के अनुसार, कुछ बिल्डरों, प्रभावशाली लोगों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से योजना का लाभ नियमों के विपरीत तरीके से उठाया गया। आरोप है कि एक ही मूल भूखंड के आधार पर बार-बार वैकल्पिक भूखंड हासिल किए गए और उनके हस्तांतरण के जरिए भारी आर्थिक फायदा कमाया गया।
आरोपों का आधार
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में वैकल्पिक भूखंड प्राप्त करने के बाद संबंधित लाभार्थियों ने उन भूखंडों का हस्तांतरण या विक्रय कर दिया, लेकिन बाद में फिर उसी मूल दावे के आधार पर नए भूखंडों की मांग की गई। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर ऐसी मांगों को स्वीकृति भी दी गई।
इसके अलावा यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जिन जमीनों के बदले वैकल्पिक भूखंड दिए गए, उनमें से कई मामलों में मूल भूमि का न तो विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही उस पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित किया गया। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग
मामले को लेकर अब स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है। शिकायतकर्ताओं ने ACB, CID, SIT या CBI जैसी एजेंसियों से पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सभी दस्तावेजों, मंजूरियों और भूमि अभिलेखों की गहन जांच की जाए, तो कई अहम तथ्य उजागर हो सकते हैं।
फिलहाल संबंधित विभागों या अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
यदि लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला महाराष्ट्र के सबसे बड़े कथित भूमि घोटालों में से एक के रूप में सामने आ सकता है।

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