उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी
उल्हासनगर शहर की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। करोड़ों रुपये के सरकारी खर्च से तैयार किए गए अस्पतालों का वास्तविक लाभ आम नागरिकों तक नहीं पहुंचने के आरोप सामने आ रहे हैं। सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, कामगार हॉस्पिटल और सेंट्रल हॉस्पिटल की कार्यप्रणाली को लेकर नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।
सबसे अधिक चर्चा उल्हासनगर स्थित सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल को लेकर हो रही है। आरोप है कि राज्य सरकार ने इस अस्पताल के निर्माण और अत्याधुनिक सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन बाद में इसके संचालन की जिम्मेदारी एक निजी कंपनी को सौंप दी गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों से विभिन्न सेवाओं के नाम पर शुल्क लिया जाता है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब परिवारों के लिए इस अस्पताल का लाभ लेना कठिन हो गया है। लोगों का सवाल है कि जब अस्पताल सरकारी धन से तैयार किया गया है तो आम नागरिकों को सस्ती या निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं क्यों नहीं मिल रही हैं।
वहीं, उल्हासनगर-3 स्थित कामगार हॉस्पिटल को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। यह अस्पताल पहले मुख्य रूप से औद्योगिक कामगारों के इलाज के लिए बनाया गया था। समय के साथ पर्याप्त सुविधाओं और मरीजों की कमी के कारण अस्पताल की स्थिति बेहद खराब हो गई थी। आरोप है कि वर्षों तक सरकारी धन और कर्मचारियों के वेतन पर भारी खर्च होता रहा, लेकिन अस्पताल आम जनता के लिए प्रभावी स्वास्थ्य केंद्र नहीं बन पाया। हाल ही में सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर इस अस्पताल का पुनर्निर्माण और आधुनिकीकरण कराया है। अब नागरिकों की मांग है कि सरकार स्पष्ट करे कि क्या यह अस्पताल अब गरीब और सामान्य नागरिकों के लिए पूरी तरह उपलब्ध है या फिर पहले जैसी स्थिति बनी हुई है।
उधर, उल्हासनगर-3 के सेंट्रल हॉस्पिटल की स्थिति को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल की व्यवस्थाएं लगातार बिगड़ती जा रही हैं और गरीब मरीजों को समय पर उचित उपचार नहीं मिल रहा है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बजाय निर्माण कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि विभिन्न निर्माण कार्यों के नाम पर सरकारी फंड के कथित दुरुपयोग और फर्जी बिलों की जांच चल रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
सेंट्रल हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉ. बनसोडे को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि मरीजों के प्रति लापरवाही और उपचार में कथित अनियमितताओं के कारण उन्हें पहले भी निलंबन का सामना करना पड़ा था। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि वर्तमान में भी अस्पताल में मरीजों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन सभी मुद्दों के बीच स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री तथा संबंधित विभाग से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि सरकारी धन से निर्मित अस्पतालों का वास्तविक लाभ गरीब एवं जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचे।
यदि समय रहते स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं किया गया तो आम जनता के बीच सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल और गहरे हो सकते हैं। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर हैं कि वे इन आरोपों और जनभावनाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं तथा आवश्यक कार्रवाई करते हैं।

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