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उल्हासनगर में 1 जनवरी 2006 के बाद बने निर्माणों की वैधता पर बड़ा सवाल! RTI के जवाब ने बढ़ाई जांच की मांग।


 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में अवैध निर्माणों का मुद्दा एक बार फिर गंभीर चर्चा में आ गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की PIL क्रमांक 105/2003 से जुड़े निर्देशों और हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाब को लेकर अब सवाल उठाए जा रहे हैं कि 1 जनवरी 2006 के बाद उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में मंजूर किए गए निर्माणों, प्लान, CC और OC की वैधता का रिकॉर्ड किस स्तर पर उपलब्ध है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे उल्हासनगर महानगरपालिका क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात नगर रचना विभाग ने RTI के जवाब में कही है। यह जवाब श्री अर्जुनसिंग आहूजा द्वारा 17 मार्च 2026 को दायर किए गए RTI आवेदन के संदर्भ में 30 अप्रैल 2026 को जारी किया गया।

RTI जवाब में क्या कहा गया?

उल्हासनगर महानगरपालिका के नगर रचना विभाग की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र में कानूनी संरचनाओं (Legal Structures) से संबंधित जानकारी इस विभाग में उपलब्ध नहीं है।

यह जवाब ऐसे समय सामने आया है जब शहर में पुराने और नए निर्माणों की वैधता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

PIL 105/2003 का संदर्भ

उल्हासनगर के निर्माणों से संबंधित न्यायिक मामलों के संदर्भ में PIL No. 105/2003 का उल्लेख किया जाता रहा है। इस मामले में 2005 से पहले के निर्माणों के नियमितीकरण और उसके बाद अवैध निर्माणों पर नियंत्रण से जुड़े निर्देशों का संदर्भ सामने आता है।

इसी पृष्ठभूमि में अब यह सवाल उठ रहा है कि 1 जनवरी 2006 के बाद शहर में हुए निर्माणों की निगरानी, मंजूर प्लान, Commencement Certificate (CC) और Occupation Certificate (OC) का रिकॉर्ड किस प्रकार संधारित किया गया है।

क्या सभी मंजूर निर्माणों की जांच होनी चाहिए?

RTI के जवाब के बाद अब एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है—यदि नगर रचना विभाग के पास 1 जनवरी 2006 से आज तक पूरे UMC क्षेत्र की कानूनी संरचनाओं से संबंधित समेकित जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो क्या इस अवधि में मंजूर किए गए सभी प्रमुख भवन प्लान, CC और OC की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए?

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध RTI पत्र और उसमें दर्ज जानकारी पर आधारित है। किसी व्यक्ति, अधिकारी, बिल्डर या संस्था पर अवैध निर्माण अथवा न्यायालय के आदेश की अवमानना का आरोप तथ्यात्मक जांच और सक्षम न्यायिक/प्रशासनिक निष्कर्ष के बिना अंतिम रूप से नहीं माना जाना चाहिए।






















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