नई दिल्ली | दिनेश मीरचंदानी
देश के प्रख्यात समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सोनम वांगचुक के जारी अनशन को लेकर लोकशाही रक्षक फोरम के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सागर प्रकाश घाडगे ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से तत्काल संवेदनशील एवं सकारात्मक हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस विषय को केवल एक आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, उत्तरदायी शासन और नागरिकों के विश्वास से जुड़े राष्ट्रीय महत्व के विषय के रूप में देखा जाना चाहिए।
डॉ. घाडगे ने कहा कि देश ने फिल्म '3 इडियट्स' के लोकप्रिय किरदार 'रैंचो' के माध्यम से सोनम वांगचुक के व्यक्तित्व, विचारों और शिक्षा सुधार के प्रति उनके समर्पण को सराहा तथा उन्हें प्रेरणा का स्रोत माना। आज वही व्यक्तित्व शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी पारिस्थितिकी और राष्ट्रीय हित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहा है। ऐसे में उनके अनशन की उपेक्षा करना किसी भी सशक्त लोकतंत्र के लिए उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारस्परिक विश्वास में निहित होती है। मतभेद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन जब संवाद के रास्ते बंद हो जाएं और किसी जागरूक नागरिक को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए अनशन जैसा कठोर कदम उठाना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन जाता है।
डॉ. घाडगे ने कहा कि लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों की आवाज को सम्मानपूर्वक सुनना और संवाद के माध्यम से समाधान तलाशना है। सरकार और समाज—दोनों का दायित्व है कि वे संवेदनशीलता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हुए जनविश्वास को और मजबूत करें।
उन्होंने भारत सरकार से विनम्र किंतु दृढ़ आग्रह किया कि वह तत्काल पहल करते हुए सोनम वांगचुक के साथ सम्मानजनक, सकारात्मक और सार्थक संवाद स्थापित करे तथा उनकी मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए ऐसा सर्वमान्य समाधान निकाले, जिससे उनका अनशन सम्मानपूर्वक समाप्त हो और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो।
डॉ. घाडगे ने कहा कि एक सशक्त भारत केवल आर्थिक विकास से नहीं बनता, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व, लोकतांत्रिक परंपराओं के सम्मान, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और प्रत्येक जागरूक नागरिक के विश्वास पर खड़ा होता है। इसी विश्वास की रक्षा करना लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति और सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
इस अवसर पर डॉ. घाडगे ने देश में छात्र आंदोलनों की घटती सक्रियता पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी श्रमिक संगठनों की आवाज विभिन्न मंचों पर सुनाई देती है, किंतु एक समय सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक जागरण का नेतृत्व करने वाले छात्र संगठन आज अपेक्षित रूप से सक्रिय दिखाई नहीं देते। यह स्थिति लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि जब विद्यार्थी समाज और राष्ट्र के महत्वपूर्ण प्रश्नों से स्वयं को दूर कर लेते हैं, तब लोकतांत्रिक जवाबदेही भी कमजोर होने लगती है। एक जागरूक छात्र समाज ही एक जवाबदेह शासन की सबसे मजबूत नींव होता है। इसलिए युवाओं और विद्यार्थियों की सक्रिय, जागरूक, शांतिपूर्ण और संविधानसम्मत भागीदारी लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
अपने संदेश के अंत में डॉ. घाडगे ने देश के विद्यार्थियों और युवाओं से भावनात्मक आह्वान करते हुए कहा:
"विद्यार्थियों, जागिए। प्रश्न पूछिए, संवाद कीजिए, संविधान के मूल्यों को आत्मसात कीजिए और राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाइए। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों और सक्रिय विद्यार्थियों से जीवंत रहता है। आज का जागरूक छात्र ही कल के सशक्त, उत्तरदायी और संवेदनशील भारत का निर्माता होगा।"
उन्होंने अंत में देशवासियों से लोकतांत्रिक मूल्यों, संवाद, संवेदनशीलता और नागरिक सहभागिता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण सरकार और नागरिकों की समान भागीदारी से ही संभव है, और यही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।

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