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उल्हासनगर मनपा के मैन्युअल टेंडर विवाद ने पकड़ा तूल: भाजपा नगरसेवक संजय सिंह ने आयुक्त पर नियमों के उल्लंघन का लगाया आरोप।


 

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में मैन्युअल पद्धति से जारी किए गए टेंडरों को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। भारतीय जनता पार्टी के नगरसेवक एवं स्थायी समिति सदस्य संजय अयोध्याप्रसाद सिंह ने महानगरपालिका आयुक्त को एक लिखित पत्र भेजकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि विभिन्न विकास कार्यों के लिए मैन्युअल प्रणाली से जारी की गई निविदाओं (टेंडरों) की जानकारी नियमानुसार स्थायी समिति को नहीं दी जा रही, जिससे महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है।

संजय सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम की धारा 73 के अनुसार आयुक्त द्वारा किए गए ऐसे अनुबंध, जिनकी राशि निर्धारित सीमा के अंतर्गत आती है, उनकी जानकारी अनुबंध किए जाने की तारीख से 15 दिनों के भीतर स्थायी समिति को देना अनिवार्य है। उनका आरोप है कि प्रशासन इस कानूनी प्रावधान का पालन नहीं कर रहा है और स्थायी समिति को अंधेरे में रखकर कार्यवाही की जा रही है।

पत्र में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासनिक स्तर पर न केवल अधिनियम की अवहेलना की जा रही है, बल्कि स्थायी समिति का भी अपमान किया जा रहा है। साथ ही, स्थायी समिति के सदस्यों को गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया है।

इन आरोपों के आधार पर संजय सिंह ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि मैन्युअल पद्धति से जारी किए गए सभी टेंडरों का भुगतान तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए, जब तक कि पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर नियमों के अनुसार जानकारी स्थायी समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं की जाती।

उन्होंने अपने पत्र की प्रतिलिपि मुख्य लेखा अधिकारी, मुख्य लेखा परीक्षक तथा शहर अभियंता को भी भेजी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मामला केवल प्रशासनिक पत्राचार तक सीमित न रहकर वित्तीय और तकनीकी विभागों के संज्ञान में भी लाया गया है।

उल्हासनगर महानगरपालिका में पिछले कुछ समय से टेंडर प्रक्रिया, विकास कार्यों और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में संजय सिंह द्वारा उठाया गया यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे सकता है। यदि इस मामले की जांच होती है और आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

फिलहाल इस मामले में उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन का पक्ष आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।















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