उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी
उल्हासनगर महानगरपालिका (यूएमसी) के लोक निर्माण विभाग (PWD) में कथित फर्जी बिलों और भुगतान प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सामने आए तथ्यों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। स्थानीय नागरिकों ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा संबंधित बिलों का भुगतान तत्काल प्रभाव से रोकने की मांग महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से की है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2022 में उल्हासनगर-2 स्थित गोल मैदान में क्रिकेट ग्राउंड के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण कार्य के लिए लोक निर्माण विभाग द्वारा मेसर्स जय भारत कंस्ट्रक्शन को कार्यादेश (वर्क ऑर्डर) जारी किया गया था। इस परियोजना की स्वीकृत लागत लगभग ₹2.85 करोड़ थी तथा कार्य छह माह में पूरा किया जाना था। दस्तावेजों में पांच वर्ष की दोष दायित्व अवधि (Defect Liability Period) का भी उल्लेख है।
बताया जाता है कि इसी कार्य के संबंध में मेसर्स जय भारत कंस्ट्रक्शन्स ने 26 मई 2026 को लगभग ₹1,00,08,652.94 का बिल प्रस्तुत किया। इसके बाद 13 जुलाई 2026 को उक्त बिल भुगतान की प्रक्रिया के लिए लेखा विभाग को भेज दिया गया। इसी भुगतान प्रक्रिया को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित बिल पर पीडब्ल्यूडी विभाग के डिप्टी इंजीनियर संदीप जाधव के कथित फर्जी बिल के उपर हस्ताक्षर किए जाने की आशंका जताई जा रही है। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि संदीप जाधव और शंकर नामक व्यक्ति ने मिलकर विभाग में कई कथित फर्जी बिल तैयार किए हैं। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि संबंधित निर्माण स्थल का तत्काल निरीक्षण कराया जाए। उनका आरोप है कि जिस कार्य के लिए करोड़ों रुपये के बिल प्रस्तुत किए गए हैं, उस स्थल पर अपेक्षित निर्माण कार्य दिखाई नहीं देता और साइट की स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है। उनका कहना है कि भुगतान से पहले कार्य की वास्तविक प्रगति का स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन कराया जाना आवश्यक है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि डिप्टी इंजीनियर संदीप जाधव द्वारा कार्यस्थल का नियमित निरीक्षण नहीं किया जाता। साथ ही, महाराष्ट्र शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्माण कार्य की प्रगति से संबंधित आवश्यक फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी भी कथित रूप से नहीं कराई गई जाती है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
मामले से जुड़े लोगों का यह भी आरोप है कि पिछले कई वर्षों से पीडब्ल्यूडी विभाग का समुचित ऑडिट नहीं हुआ है। उनका मानना है कि यदि स्वतंत्र वित्तीय और तकनीकी ऑडिट कराया जाए तो कई अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है। इसी कारण नागरिकों ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से पूरे विभाग की व्यापक जांच कराने की मांग की है।
सूत्रों के अनुसार, शंकर नामक व्यक्ति पर पहले भी पीडब्ल्यूडी विभाग के तत्कालीन डिप्टी इंजीनियर महेश सीतलानी के कार्यकाल के दौरान कथित फर्जी बिल तैयार करने में संलिप्त रहने के आरोप लगते रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि आज भी विभाग में कथित फर्जी बिलों के मामलों में शंकर की भूमिका महत्वपूर्ण है और इस पहलू की भी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।
नागरिकों ने मांग की है कि संबंधित बिल का भुगतान जांच पूरी होने तक रोका जाए, कार्यस्थल का संयुक्त निरीक्षण कराया जाए, तकनीकी विशेषज्ञों से निर्माण कार्य का मूल्यांकन कराया जाए तथा यदि किसी स्तर पर अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।
'मंत्रालय टाइम्स' का कहना है कि जनहित से जुड़े इस कथित फर्जी बिल प्रकरण की पड़ताल आगे भी जारी रहेगी। उपलब्ध दस्तावेजों, संबंधित अभिलेखों तथा जांच से जुड़े तथ्यों को क्रमवार प्रकाशित किया जाएगा ताकि पूरे मामले की वास्तविकता सामने आ सके।


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