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उल्हासनगर के ऐतिहासिक स्विमिंग पूल पर बड़ा विवाद: तय शुल्क ₹51 प्रति घंटा, वसूले जा रहे ₹245? लीज, अतिक्रमण और अनुबंध पर उठे कई गंभीर सवाल।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) की स्वामित्व वाली ऐतिहासिक सार्वजनिक स्विमिंग पूल संपत्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों, समझौते (Agreement), पत्राचार और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया जा रहा है कि स्विमिंग शुल्क, अनुबंध की शर्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, कथित अतिक्रमण तथा लीज संबंधी कई मामलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।

समझौते के अनुसार कितना होना चाहिए स्विमिंग शुल्क?

समझौते के अनुसार वर्ष 2003 में स्विमिंग शुल्क ₹10 प्रति घंटा निर्धारित किया गया था। अनुबंध की शर्तों में यह भी उल्लेख है कि प्रत्येक 5 वर्ष में अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही शुल्क वृद्धि की जा सकती है।

इसी आधार पर शुल्क की गणना इस प्रकार बनती है—

2003 से 2008: ₹10 प्रति घंटा

2008 से 2013: ₹15 प्रति घंटा

2013 से 2018: ₹22.50 प्रति घंटा

2018 से 2023: ₹33.75 प्रति घंटा

2023 से 2028: ₹51 प्रति घंटा

इस गणना के अनुसार वर्तमान अवधि में अधिकतम वैध शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए।

फिर ₹245 प्रति घंटा कैसे वसूला जा रहा है?

आरोप है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब प्रा. लि. द्वारा उल्हासनगर तथा आसपास के नागरिकों से ₹245 प्रति घंटा स्विमिंग शुल्क लिया जा रहा है।

इस संबंध में क्लब के संचालक आसान बालानी द्वारा UMC को दिया गया एक पत्र भी सामने आया है। इस पत्र में दावा किया गया है कि क्लब ₹245 प्रति घंटा शुल्क लेने का पात्र है, हालांकि कम प्रतिसाद (Low Response) और लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से फिलहाल ₹200 प्रति घंटा शुल्क लिया जा रहा है।

शुल्क निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल

दस्तावेजों का अध्ययन करने वाले लोगों का दावा है कि ₹245 प्रति घंटा शुल्क का औचित्य प्रस्तुत करने में कई विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।

आरोपों के अनुसार—

जहाँ समझौते के अनुसार वर्तमान शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए, वहीं पत्र में इसे ₹102 प्रति घंटा दर्शाया गया है।

अनुबंध में लॉकर शुल्क ₹100 प्रति वर्ष निर्धारित है, लेकिन उसे भी शुल्क निर्धारण में अलग तरीके से जोड़कर अधिक राशि दर्शाने का प्रयास किया गया है।

अनुबंध की शर्तों के अनुसार लाइफगार्ड और फर्स्ट एड उपलब्ध कराना ठेकेदार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसके लिए नागरिकों से अलग से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

इन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि महानगरपालिका के समक्ष प्रस्तुत किया गया शुल्क संबंधी स्पष्टीकरण वास्तविक अनुबंध शर्तों से मेल नहीं खाता।

स्विमिंग पूल के सूचना बोर्ड पर भी उठे सवाल

स्विमिंग पूल परिसर में लगे सूचना बोर्ड और उपलब्ध वीडियो के आधार पर भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

बोर्ड के अनुसार—

पुरुषों के लिए केवल 2 घंटे का समय निर्धारित है।

महिलाओं के लिए भी केवल 2 घंटे का समय उपलब्ध है।

बच्चों के लिए कोई स्पष्ट समय-सारणी प्रदर्शित नहीं की गई है।

विजिटर्स से ₹200 प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

प्रत्येक बार एक घंटे की स्विमिंग के लिए डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाना अनिवार्य बताया गया है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्विमिंग स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक गतिविधि है और महानगरपालिका की सार्वजनिक संपत्ति होने के कारण यह सुविधा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक आम जनता के लिए पर्याप्त समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व वाली संपत्ति

यह केवल एक स्विमिंग पूल नहीं, बल्कि उल्हासनगर के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है। बताया जाता है कि 8 अगस्त 1949 को इसी स्थान पर उल्हासनगर शहर की आधारशिला रखी गई थी। ऐसे ऐतिहासिक स्थल के उपयोग और प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।

अतिरिक्त भूमि और कथित अतिक्रमण का मामला

आरोप है कि वर्ष 2014 में महानगरपालिका ने स्विमिंग पूल के पीछे 512 वर्गमीटर अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई थी।

इसके बावजूद यह भी आरोप लगाया गया है कि—

महानगरपालिका के दो कार्यालयों पर बिना अनुमति कब्जा कर वहाँ स्विमिंग पूल का काउंटर बनाया गया।

स्विमिंग पूल के समीप स्थित पुराने ऑक्ट्रॉय नाके की भूमि पर भी कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया।

यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर मामला माना जा सकता है।

कोरोना काल में किराया माफी और अनुबंध विस्तार पर भी सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार महानगरपालिका ने कोरोना काल के दौरान क्लब को दो वर्षों का किराया माफ किया तथा दो वर्षों का अनुबंध विस्तार भी प्रदान किया।

अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि—

क्या महानगरपालिका को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार था?

क्या इसके लिए राज्य शासन की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी?

यदि शासन की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई थी?

2055 तक लीज देने का दावा, जबकि अनुबंध 2044 तक?

सबसे गंभीर प्रश्न 25 सितंबर 2025 को किए गए एक कथित लीज समझौते को लेकर उठाया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब ने महानगरपालिका की इस संपत्ति को सिंघानिया स्कूल को 30 वर्षों के लिए, अर्थात 25 सितंबर 2055 तक, लीज पर देने का समझौता किया।

यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है।

यदि महानगरपालिका के साथ क्लब का अनुबंध केवल वर्ष 2044 तक ही प्रभावी है, तो फिर वह उसी संपत्ति को 2055 तक किसी तीसरे पक्ष को लीज पर कैसे दे सकता है?

क्या इसके लिए महानगरपालिका की अनुमति ली गई थी? यदि ली गई थी, तो किस नियम के तहत? और यदि नहीं, तो ऐसे समझौते की वैधानिक स्थिति क्या होगी?

अब उठ रही है निष्पक्ष जांच की मांग

इन सभी आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद नागरिकों द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। मांग की जा रही है कि स्विमिंग शुल्क निर्धारण, अनुबंध की शर्तों, कथित अतिक्रमण, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, किराया माफी, अनुबंध विस्तार तथा कथित लीज समझौते की विस्तृत जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।













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