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उल्हासनगर के ऐतिहासिक स्विमिंग पूल पर बड़ा विवाद: तय शुल्क ₹51 प्रति घंटा, वसूले जा रहे ₹245? लीज, अतिक्रमण और अनुबंध पर उठे कई गंभीर सवाल।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) की स्वामित्व वाली ऐतिहासिक सार्वजनिक स्विमिंग पूल संपत्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों, समझौते (Agreement), पत्राचार और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया जा रहा है कि स्विमिंग शुल्क, अनुबंध की शर्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, कथित अतिक्रमण तथा लीज संबंधी कई मामलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।

समझौते के अनुसार कितना होना चाहिए स्विमिंग शुल्क?

समझौते के अनुसार वर्ष 2003 में स्विमिंग शुल्क ₹10 प्रति घंटा निर्धारित किया गया था। अनुबंध की शर्तों में यह भी उल्लेख है कि प्रत्येक 5 वर्ष में अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही शुल्क वृद्धि की जा सकती है।

इसी आधार पर शुल्क की गणना इस प्रकार बनती है—

2003 से 2008: ₹10 प्रति घंटा

2008 से 2013: ₹15 प्रति घंटा

2013 से 2018: ₹22.50 प्रति घंटा

2018 से 2023: ₹33.75 प्रति घंटा

2023 से 2028: ₹51 प्रति घंटा

इस गणना के अनुसार वर्तमान अवधि में अधिकतम वैध शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए।

फिर ₹245 प्रति घंटा कैसे वसूला जा रहा है?

आरोप है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब प्रा. लि. द्वारा उल्हासनगर तथा आसपास के नागरिकों से ₹245 प्रति घंटा स्विमिंग शुल्क लिया जा रहा है।

इस संबंध में क्लब के संचालक आसान बालानी द्वारा UMC को दिया गया एक पत्र भी सामने आया है। इस पत्र में दावा किया गया है कि क्लब ₹245 प्रति घंटा शुल्क लेने का पात्र है, हालांकि कम प्रतिसाद (Low Response) और लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से फिलहाल ₹200 प्रति घंटा शुल्क लिया जा रहा है।

शुल्क निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल

दस्तावेजों का अध्ययन करने वाले लोगों का दावा है कि ₹245 प्रति घंटा शुल्क का औचित्य प्रस्तुत करने में कई विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।

आरोपों के अनुसार—

जहाँ समझौते के अनुसार वर्तमान शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए, वहीं पत्र में इसे ₹102 प्रति घंटा दर्शाया गया है।

अनुबंध में लॉकर शुल्क ₹100 प्रति वर्ष निर्धारित है, लेकिन उसे भी शुल्क निर्धारण में अलग तरीके से जोड़कर अधिक राशि दर्शाने का प्रयास किया गया है।

अनुबंध की शर्तों के अनुसार लाइफगार्ड और फर्स्ट एड उपलब्ध कराना ठेकेदार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसके लिए नागरिकों से अलग से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

इन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि महानगरपालिका के समक्ष प्रस्तुत किया गया शुल्क संबंधी स्पष्टीकरण वास्तविक अनुबंध शर्तों से मेल नहीं खाता।

स्विमिंग पूल के सूचना बोर्ड पर भी उठे सवाल

स्विमिंग पूल परिसर में लगे सूचना बोर्ड और उपलब्ध वीडियो के आधार पर भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

बोर्ड के अनुसार—

पुरुषों के लिए केवल 2 घंटे का समय निर्धारित है।

महिलाओं के लिए भी केवल 2 घंटे का समय उपलब्ध है।

बच्चों के लिए कोई स्पष्ट समय-सारणी प्रदर्शित नहीं की गई है।

विजिटर्स से ₹200 प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

प्रत्येक बार एक घंटे की स्विमिंग के लिए डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाना अनिवार्य बताया गया है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्विमिंग स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक गतिविधि है और महानगरपालिका की सार्वजनिक संपत्ति होने के कारण यह सुविधा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक आम जनता के लिए पर्याप्त समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व वाली संपत्ति

यह केवल एक स्विमिंग पूल नहीं, बल्कि उल्हासनगर के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है। बताया जाता है कि 8 अगस्त 1949 को इसी स्थान पर उल्हासनगर शहर की आधारशिला रखी गई थी। ऐसे ऐतिहासिक स्थल के उपयोग और प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।

अतिरिक्त भूमि और कथित अतिक्रमण का मामला

आरोप है कि वर्ष 2014 में महानगरपालिका ने स्विमिंग पूल के पीछे 512 वर्गमीटर अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई थी।

इसके बावजूद यह भी आरोप लगाया गया है कि—

महानगरपालिका के दो कार्यालयों पर बिना अनुमति कब्जा कर वहाँ स्विमिंग पूल का काउंटर बनाया गया।

स्विमिंग पूल के समीप स्थित पुराने ऑक्ट्रॉय नाके की भूमि पर भी कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया।

यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर मामला माना जा सकता है।

कोरोना काल में किराया माफी और अनुबंध विस्तार पर भी सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार महानगरपालिका ने कोरोना काल के दौरान क्लब को दो वर्षों का किराया माफ किया तथा दो वर्षों का अनुबंध विस्तार भी प्रदान किया।

अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि—

क्या महानगरपालिका को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार था?

क्या इसके लिए राज्य शासन की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी?

यदि शासन की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई थी?

2055 तक लीज देने का दावा, जबकि अनुबंध 2044 तक?

सबसे गंभीर प्रश्न 25 सितंबर 2025 को किए गए एक कथित लीज समझौते को लेकर उठाया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब ने महानगरपालिका की इस संपत्ति को सिंघानिया स्कूल को 30 वर्षों के लिए, अर्थात 25 सितंबर 2055 तक, लीज पर देने का समझौता किया।

यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है।

यदि महानगरपालिका के साथ क्लब का अनुबंध केवल वर्ष 2044 तक ही प्रभावी है, तो फिर वह उसी संपत्ति को 2055 तक किसी तीसरे पक्ष को लीज पर कैसे दे सकता है?

क्या इसके लिए महानगरपालिका की अनुमति ली गई थी? यदि ली गई थी, तो किस नियम के तहत? और यदि नहीं, तो ऐसे समझौते की वैधानिक स्थिति क्या होगी?

अब उठ रही है निष्पक्ष जांच की मांग

इन सभी आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद नागरिकों द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। मांग की जा रही है कि स्विमिंग शुल्क निर्धारण, अनुबंध की शर्तों, कथित अतिक्रमण, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, किराया माफी, अनुबंध विस्तार तथा कथित लीज समझौते की विस्तृत जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।













भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी 23 कर्मचारी आज भी सेवा में बरकरार! उल्हासनगर मनपा की जवाबदेही कटघरे में, आयुक्त मनीषा आव्हाले से जनता पूछ रही है सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) में प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर में चर्चा का विषय बना एक दावा यह है कि भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ACB) द्वारा विभिन्न मामलों में रंगे हाथों पकड़े गए लगभग 23 कर्मचारी और अधिकारी आज भी महानगरपालिका में कार्यरत हैं। इस मुद्दे ने प्रशासनिक जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारी नीति की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी को ACB ने रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है, तो ऐसे मामलों में विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई समयबद्ध तरीके से होना आवश्यक है। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया लंबित है, जिसके कारण संबंधित अधिकारी-कर्मचारी निर्भय होकर अपने पदों पर कार्य कर रहे हैं।

नागरिकों का सवाल: भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नारा?

शहर के जागरूक नागरिकों का कहना है कि राज्य सरकार और प्रशासन भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात करते हैं, लेकिन यदि रिश्वतखोरी के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी वर्षों तक सेवा में बने रहते हैं, तो इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जाता है।

नागरिकों का सवाल है कि—

ACB द्वारा पकड़े गए कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?

कितने कर्मचारियों को निलंबित किया गया?

कितनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुए?

कितनों पर अंतिम कार्रवाई हुई?

और कितने कर्मचारी आज भी संवेदनशील पदों पर कार्यरत हैं?

प्रशासन की भूमिका पर उठे प्रश्न

इस पूरे मामले में मनपा प्रशासन की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। आलोचकों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कठोर कार्रवाई न होने से कर्मचारियों में जवाबदेही की भावना कमजोर पड़ती है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अंतिम कार्रवाई कानूनन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होती है और प्रत्येक मामले को नियमों के अनुसार देखा जाता है।

सामाजिक संगठनों ने मांगी पारदर्शिता

कई सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि मनपा प्रशासन ACB मामलों से जुड़े सभी कर्मचारियों की स्थिति सार्वजनिक करे। उनका कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में पकड़े गए अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई और उनकी वर्तमान नियुक्ति की स्थिति क्या है।

जनता के बीच चर्चा का विषय बना मामला

शहर में यह मुद्दा सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं का विषय बना हुआ है। नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि यदि भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी बिना किसी कठोर कार्रवाई के सेवा में बने रहते हैं, तो भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का लक्ष्य कैसे हासिल होगा?

अब निगाहें उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और आयुक्त मनीषा आव्हाले पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि ACB के मामलों में फंसे कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है और भविष्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाने वाला है।

(नोट: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रसारित दावों और उठाए गए सवालों पर आधारित है। संबंधित कर्मचारियों अथवा प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)














लखनऊ अग्निकांड के बाद बड़ा सवाल: क्या उल्हासनगर के कोचिंग क्लासेस में भी मंडरा रहा है मौत का खतरा?


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में कई छात्रों की जान चली गई, जबकि दर्जनों छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। आग लगने के बाद भवन में फंसे छात्रों की चीख-पुकार, खिड़कियों और ऊपरी मंजिलों से जान बचाने के लिए छलांग लगाने के दृश्य ने देशभर के अभिभावकों को भयभीत कर दिया।

लखनऊ की इस त्रासदी के बाद अब सवाल उल्हासनगर की ओर भी उठने लगे हैं। शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुके उल्हासनगर में सैकड़ों कोचिंग क्लासेस, ट्यूशन सेंटर, लाइब्रेरी और प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन हजारों विद्यार्थी पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या इन संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं? क्या कोई बड़ा हादसा होने से पहले प्रशासन जागेगा?

संकरी गलियां, भीड़भाड़ वाली इमारतें और सुरक्षा पर सवाल

उल्हासनगर के कई कोचिंग क्लासेस ऐसी बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही सीढ़ी उपलब्ध है। कई जगहों पर पार्किंग क्षेत्र, कॉरिडोर और सीढ़ियां भी अतिक्रमण या सामान से भरी हुई दिखाई देती हैं। यदि ऐसी स्थिति में आग लग जाए या कोई अन्य आपातकालीन घटना हो जाए, तो सैकड़ों छात्रों की सुरक्षित निकासी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आग से अधिक जानें धुएं, घबराहट और भगदड़ के कारण जाती हैं। यदि भवन में पर्याप्त वेंटिलेशन, फायर एग्जिट और आपातकालीन व्यवस्था न हो तो कुछ ही मिनटों में स्थिति भयावह रूप ले सकती है।

फायर NOC है या सिर्फ कागजों में सुरक्षा?

शहर के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल सभी कोचिंग क्लासेस और शिक्षण संस्थानों का विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट कराए। यह जांच की जाए कि:

क्या सभी संस्थानों के पास वैध फायर NOC है?

क्या भवनों में पर्याप्त अग्निशमन यंत्र उपलब्ध हैं?

क्या फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर कार्यरत हैं?

क्या आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था है?

क्या छात्रों और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है?

क्या अग्निशमन विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण किया जाता है?

हजारों अभिभावकों की बढ़ी चिंता

लखनऊ हादसे के बाद उल्हासनगर के अभिभावकों में भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कोचिंग क्लासेस भेजते हैं, लेकिन यदि सुरक्षा व्यवस्था ही कमजोर हो तो यह किसी बड़े खतरे को न्योता देने जैसा है।

अभिभावकों का मानना है कि जिस तरह स्कूलों के लिए सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं, उसी प्रकार कोचिंग संस्थानों के लिए भी कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए और उनके पालन की नियमित निगरानी होनी चाहिए।

प्रशासन के लिए चेतावनी या इंतजार किसी हादसे का?

उल्हासनगर में अब तक किसी बड़े कोचिंग अग्निकांड की घटना सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में लापरवाही अक्सर हादसे के बाद ही उजागर होती है। ऐसे में प्रशासन, उल्हासनगर महानगरपालिका, अग्निशमन विभाग और संबंधित अधिकारियों को समय रहते व्यापक निरीक्षण अभियान चलाकर सुरक्षा मानकों की समीक्षा करनी चाहिए।

बड़ा सवाल

क्या उल्हासनगर में लखनऊ जैसी त्रासदी को रोकने के लिए प्रशासन अभी से सक्रिय होगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुलेगी?

लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई भी छोटी चूक बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।














सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल का जनहित अभियान: 29 जून 2026 को निःशुल्क मोतियाबिंद जांच, ऑपरेशन संबंधी परामर्श भी मिलेगा।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

समाज के प्रत्येक वर्ग तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल द्वारा 29 जून (सोमवार) को निःशुल्क मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक आयोजित होगा, जिसमें नेत्र रोगों से संबंधित समस्याओं का प्रारंभिक परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा।

हॉस्पिटल प्रशासन के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ मोतियाबिंद की समस्या आम होती जा रही है। समय पर जांच और उपचार न होने पर दृष्टि प्रभावित हो सकती है। इसी उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मनीष मिरानी द्वारा मरीजों की जांच की जाएगी तथा उन्हें उचित उपचार संबंधी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

शिविर के दौरान मरीजों की मोतियाबिंद की प्रारंभिक स्क्रीनिंग की जाएगी, जिससे रोग की स्थिति का पता लगाया जा सके। जिन मरीजों को ऑपरेशन की आवश्यकता होगी, उन्हें आधुनिक तकनीक से उपलब्ध उपचार और ऑपरेशन पैकेज की विस्तृत जानकारी भी दी जाएगी।

सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल ने बताया कि संस्थान हमेशा से गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। अस्पताल में सुरक्षित, आधुनिक और दर्दरहित उपचार पद्धतियों के माध्यम से मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

हॉस्पिटल प्रशासन ने विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दृष्टि संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों से इस निःशुल्क शिविर का लाभ उठाने की अपील की है। अस्पताल का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार से मोतियाबिंद के कारण होने वाली दृष्टि हानि को रोका जा सकता है तथा लोगों को बेहतर और स्वस्थ जीवन प्रदान किया जा सकता है।

संपर्क एवं पंजीकरण

शिविर में भाग लेने के इच्छुक नागरिक पूर्व पंजीकरण अथवा अधिक जानकारी के लिए निम्न नंबर पर संपर्क कर सकते हैं:

डॉ. मनीष मिरानी

📞  8237898959

       8108098576

स्थान: सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल

टाउन हॉल के पास,

उल्हासनगर-3

"साफ दृष्टि, बेहतर जीवन" के संदेश के साथ आयोजित यह शिविर समाज में नेत्र स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।














उल्हासनगर में ‘अल्टरनेट साइड’ योजना के नाम पर ₹50,000 हज़ार करोड़ के कथित भूमि घोटाले का आरोप, SDO कार्यालय की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में वैकल्पिक भूखंड (अल्टरनेट साइड) योजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों और शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस योजना के तहत वर्षों से बड़े पैमाने पर भूमि संबंधी गड़बड़ियां की गई हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि इस कथित अनियमितता का आर्थिक दायरा करीब ₹50,000 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।

शिकायतों के अनुसार, कुछ बिल्डरों, प्रभावशाली लोगों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से योजना का लाभ नियमों के विपरीत तरीके से उठाया गया। आरोप है कि एक ही मूल भूखंड के आधार पर बार-बार वैकल्पिक भूखंड हासिल किए गए और उनके हस्तांतरण के जरिए भारी आर्थिक फायदा कमाया गया।

आरोपों का आधार

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में वैकल्पिक भूखंड प्राप्त करने के बाद संबंधित लाभार्थियों ने उन भूखंडों का हस्तांतरण या विक्रय कर दिया, लेकिन बाद में फिर उसी मूल दावे के आधार पर नए भूखंडों की मांग की गई। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर ऐसी मांगों को स्वीकृति भी दी गई।

इसके अलावा यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जिन जमीनों के बदले वैकल्पिक भूखंड दिए गए, उनमें से कई मामलों में मूल भूमि का न तो विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही उस पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित किया गया। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।

निष्पक्ष जांच की मांग

मामले को लेकर अब स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है। शिकायतकर्ताओं ने ACB, CID, SIT या CBI जैसी एजेंसियों से पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सभी दस्तावेजों, मंजूरियों और भूमि अभिलेखों की गहन जांच की जाए, तो कई अहम तथ्य उजागर हो सकते हैं।

फिलहाल संबंधित विभागों या अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

यदि लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला महाराष्ट्र के सबसे बड़े कथित भूमि घोटालों में से एक के रूप में सामने आ सकता है।














उल्हासनगर-५ स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला प्रकरण: कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी, कानूनी हलकों में बढ़ी हलचल!


(फाइल फोटो) 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला से जुड़े कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों के आरोपों ने अब नया मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार, मामले को लेकर कानूनी गतिविधियां तेज हो गई हैं और इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया जा चुका है अथवा जल्द ही याचिका दायर किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

जानकार सूत्रों का दावा है कि गौशाला के संचालन, वित्तीय प्रबंधन, अनुदान राशि के उपयोग, लेखा-जोखा तथा अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में नियमों की अनदेखी तथा वित्तीय पारदर्शिता को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है। इन आरोपों की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग भी लगातार जोर पकड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, मामले से संबंधित दस्तावेज, वित्तीय अभिलेख और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी एकत्रित कर कानूनी स्तर पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। यदि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन होता है, तो न्यायालय संबंधित पक्षों से जवाब तलब कर सकता है तथा आरोपों की जांच के लिए सक्षम एजेंसियों को आवश्यक निर्देश भी दे सकता है।

स्थानीय स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। सामाजिक संगठनों, गौसेवा से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा नागरिकों के बीच यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कई लोगों का मानना है कि यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो इससे गौशाला के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू उजागर हो सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर, संबंधित पक्षों की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न्यायालय अथवा किसी जांच एजेंसी द्वारा भी फिलहाल कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण में और भी महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं, जिससे मामले की दिशा और गंभीरता स्पष्ट हो सकेगी। यदि याचिका औपचारिक रूप से दायर होती है, तो यह मामला क्षेत्र की सबसे चर्चित कानूनी और प्रशासनिक बहसों में से एक बन सकता है।

(अस्वीकरण: यह समाचार सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व संबंधित अधिकारियों, न्यायालय अथवा जांच एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा की जानी चाहिए।)














उल्हासनगर मनपा के PWD विभाग में करोड़ों के कथित फर्जी बिलों का खेल, 'शंकर' नामक व्यक्ति पर नेटवर्क संचालित करने का आरोप।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में कथित तौर पर करोड़ों रुपये के फर्जी बिलों से जुड़े एक बड़े घोटाले की चर्चा जोर पकड़ रही है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि "शंकर" नाम का एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख संचालक है, जो लंबे समय से कथित रूप से जाली बिलों के माध्यम से सरकारी धन के दुरुपयोग में शामिल रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस मामले में विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ठेकेदारी कार्यों से जुड़े भुगतान के नाम पर फर्जी बिल तैयार किए गए और इसके एवज में कथित रूप से कमीशन का लेन-देन भी हुआ।

कार्यालय और आवास की जांच से हो सकते हैं बड़े खुलासे

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, यदि संबंधित व्यक्ति के कार्यालय और निवास स्थान की गहन एवं निष्पक्ष जांच की जाए, तो कथित फर्जी बिलों, संदिग्ध दस्तावेजों तथा वित्तीय लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं। सूत्रों का यह भी दावा है कि हाल के दिनों में संबंधित व्यक्ति ने अपना कार्यालय दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर लिया है, जिससे मामले को लेकर और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने उठाई जांच की मांग

मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

सरकारी धन के उपयोग पर उठे सवाल

इस कथित घोटाले ने महानगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली और सरकारी धन के उपयोग को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह सार्वजनिक धन और जनविश्वास दोनों के साथ गंभीर खिलवाड़ है।

फिलहाल मामले में संबंधित अधिकारियों या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां और प्रशासन इस प्रकरण में क्या कदम उठाते हैं।














उल्हासनगर मनपा और पुलिस के दावों की खुली पोल, फर्जी डॉक्टर अब भी कर रहे इलाज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और दर्जनों शिकायतों के बावजूद अवैध चिकित्सा का कारोबार खुलेआम जारी रहने का मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस में मामले दर्ज होने और महानगरपालिका द्वारा कार्रवाई के दावे किए जाने के बावजूद कई कथित फर्जी डॉक्टर अब भी बिना मान्यता प्राप्त डिग्री और आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता के मरीजों का उपचार कर रहे हैं। इससे नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, शहर में ऐसे कई व्यक्तियों की पहचान की गई थी जो बिना वैध मेडिकल लाइसेंस के क्लीनिक संचालित कर रहे थे। इनमें से कई के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं और कुछ मामलों में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की। इसके बावजूद संबंधित क्लीनिकों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से नागरिकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

26 फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें, फिर भी जारी है प्रैक्टिस

जानकारी के मुताबिक, शहर में करीब 26 कथित फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें की गई थीं। जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं। आरोप है कि इनमें से कुछ लोग बिना किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा डिग्री के मरीजों को दवाइयां लिख रहे हैं, बीमारियों का उपचार कर रहे हैं और चिकित्सा परामर्श भी दे रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है, जबकि वास्तविकता में कई क्लीनिक आज भी संचालित हो रहे हैं। इससे लोगों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

महानगरपालिका प्रशासन पर उठे सवाल

फर्जी डॉक्टरों के मामले में महानगरपालिका प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर कार्रवाई और निरीक्षण के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।

सामाजिक संगठनों और नागरिकों का आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कठोर कदम उठाए होते, तो लोगों की जान और स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे गंभीर जोखिमों को रोका जा सकता था।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई चिंता

चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बिना योग्य डॉक्टरों द्वारा किया जाने वाला उपचार मरीजों के लिए घातक साबित हो सकता है। गलत निदान, अनुचित दवाइयों का उपयोग और आपातकालीन परिस्थितियों में सही चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण मरीजों की जान तक खतरे में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अवैध क्लीनिकों को तत्काल सील कर दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

कड़ी कार्रवाई की मांग

शहर के नागरिकों ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन से मांग की है कि फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाकर सभी अवैध क्लीनिकों की जांच की जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई की जाए जिससे भविष्य में कोई भी व्यक्ति लोगों की जान से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके।

फिलहाल यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और नागरिक प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर बनाए हुए हैं।














उल्हासनगर शाहाड भूमि विवाद में बड़ा एक्शन: कारोबारी नंद जेठानी समेत चार पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर के चर्चित भूमि विवाद मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। हिल लाइन पुलिस स्टेशन ने विवादित भूमि के सर्वेक्षण और कथित कब्जे से जुड़े मामले में प्रमुख व्यवसायी नंद जेठानी, धीरज जेठानी सहित चार आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के गंभीर आरोपों के तहत मामला दर्ज किया है। इस कार्रवाई के बाद शहर के व्यावसायिक और रियल एस्टेट जगत में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465, 467, 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग), 426 (नुकसान पहुंचाना) और 34 (सामूहिक आपराधिक मंशा) के तहत एफआईआर दर्ज की है।

शिकायतकर्ता ने लगाए गंभीर आरोप

यह मामला उल्हासनगर निवासी और निर्माण व्यवसायी अनिल आहूजा की शिकायत पर दर्ज किया गया है। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने कथित रूप से एक ऐसी पावर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग किया, जिसकी वैधता समाप्त हो चुकी थी, और उसी के आधार पर विवादित भूमि का सरकारी सर्वेक्षण कराकर उस पर कब्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया को अंजाम दिया।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस कथित कार्रवाई से न केवल उन्हें आर्थिक और संपत्ति संबंधी नुकसान हुआ, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और प्रक्रियाओं का भी दुरुपयोग किया गया, जिससे शासन को भी हानि पहुंची।

शाहाड स्थित 25 गुंठा भूमि को लेकर विवाद

एफआईआर के अनुसार, विवादित संपत्ति शाहाड गांव, उल्हासनगर स्थित सर्वे नंबर 171/C की लगभग 25 गुंठा भूमि है। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह जमीन उनके परिवार की संपत्ति है।

मामले में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2001 में शिकायतकर्ता के पिता स्वर्गीय श्रीचंद भुलचंद आहूजा और उनके चाचा प्रकाश आहूजा ने भूमि के प्रबंधन संबंधी अधिकार नंद रामचंद जेठानी को पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से प्रदान किए थे।

पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता पर विवाद

शिकायतकर्ता का कहना है कि पावर ऑफ अटॉर्नी देने वाले दोनों व्यक्तियों के निधन के बाद उक्त दस्तावेज स्वतः प्रभावहीन और अवैध हो गया था। इसके बावजूद आरोपियों ने कथित रूप से उसी दस्तावेज का उपयोग करते हुए 21 मार्च 2022 को सिटी सर्वे कार्यालय में भूमि सर्वेक्षण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।

इसके बाद 13 मई 2022 को भूमि का सर्वेक्षण कराया गया और शिकायतकर्ता के अनुसार, इसी प्रक्रिया के माध्यम से संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने का प्रयास किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पूरी कार्रवाई भ्रामक दस्तावेजों और गलत तथ्यों के आधार पर की गई।

चार आरोपियों के खिलाफ मामला

एफआईआर में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है, उनमें:

धीरज जेठानी

नंद जेठानी

जगेश रघुनाथ गायकवाड़

एक अज्ञात व्यक्ति

शामिल हैं।

सरकारी प्रक्रिया के दुरुपयोग की भी जांच

पुलिस सूत्रों के अनुसार, मामले में यह भी जांच की जा रही है कि भूमि सर्वेक्षण और उससे संबंधित राजस्व प्रक्रिया के दौरान किन-किन दस्तावेजों का उपयोग किया गया तथा क्या संबंधित अधिकारियों को सही जानकारी उपलब्ध कराई गई थी या नहीं। जांच के दौरान दस्तावेजों की वैधता, पावर ऑफ अटॉर्नी की कानूनी स्थिति और भूमि स्वामित्व से जुड़े रिकॉर्ड की भी समीक्षा की जाएगी।

पुलिस ने शुरू की विस्तृत जांच

हिल लाइन पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और जांच प्रारंभ कर दी गई है। इस प्रकरण की जांच पुलिस उपनिरीक्षक सुरवाडे कर रहे हैं। पुलिस का कहना है कि सभी दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
















उल्हासनगर-5 के जींस मार्केट में एक कारोबारी संकट की चर्चाएं तेज, सट्टेबाजी में नुकसान और बकाया भुगतान को लेकर उठे सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित देश के प्रमुख रेडीमेड एवं जींस व्यापार केंद्रों में से एक जींस मार्केट इन दिनों एक व्यापारी परिवार को लेकर चल रही चर्चाओं के कारण सुर्खियों में है। बाजार के व्यापारिक गलियारों में पिछले कुछ समय से एक प्रमुख जींस व्यापारी और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर विभिन्न प्रकार की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं और दावों की अभी तक किसी भी आधिकारिक स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है।

व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, संबंधित व्यापारी के पुत्र को कथित तौर पर IPL सट्टेबाजी में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में चर्चा है कि इस नुकसान का प्रभाव परिवार के व्यवसाय पर भी पड़ा है, जिसके कारण कारोबारी गतिविधियों और वित्तीय लेन-देन पर दबाव बढ़ गया है।

सूत्रों का कहना है कि डेनिम रोड क्षेत्र के कई कपड़ा व्यापारियों का भुगतान लंबे समय से लंबित बताया जा रहा है। इसी वजह से व्यापारिक समुदाय के बीच संबंधित कारोबारी की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। कुछ व्यापारियों का दावा है कि बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण संबंधित व्यापारी गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है और भविष्य में उसके सामने दिवालियापन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

बाजार में यह चर्चा भी जोरों पर है कि उक्त व्यापारी पहले अपनी दुकान का संचालन "K" अक्षर से शुरू होने वाले एक नाम से करता था और अब उसने उसी अक्षर से शुरू होने वाले नए नाम के साथ व्यापारिक गतिविधियां प्रारंभ की हैं। व्यापारिक हलकों में इसे लेकर भी कई तरह की चर्चाएं और अटकलें लगाई जा रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, संबंधित दुकान दूध नाका रोड और आश्रम रोड के बीच स्थित क्षेत्र में, डिस्को टी के आसपास संचालित होने की चर्चा है। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि अगले महीने रीजेंसी एंटीलिया में आयोजित होने वाले बड़े जींस व्यापार मेले में उक्त कारोबारी नए नाम और नई पहचान के साथ भाग लेने की तैयारी कर रहा है।

"इस पूरे घटनाक्रम के बीच जींस मार्केट के एक अन्य बड़े कारोबारी का नाम भी चर्चा में है। व्यापारिक हलकों में कहा जा रहा है कि उनके नाम की शुरुआत 'के' अक्षर से होती है, हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है"। कुछ व्यापारियों का दावा है कि संबंधित पक्षों के बीच पूर्व में कारोबारी साझेदारी अथवा वित्तीय संबंध रहे हैं। हालांकि, इन संबंधों की प्रकृति और वर्तमान स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाजार में इस विषय को लेकर विभिन्न प्रकार की अटकलें और चर्चाएं जारी हैं।

व्यापारिक जानकारों का मानना है कि यदि बाजार में चल रही चर्चाओं में किसी प्रकार की सच्चाई है, तो इसका प्रभाव केवल एक व्यापारी या परिवार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे जींस व्यापार क्षेत्र में विश्वास और लेन-देन की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर कई व्यापारी यह भी कह रहे हैं कि बिना आधिकारिक दस्तावेजों और पुष्ट जानकारी के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

फिलहाल, संबंधित व्यापारी, उसके परिवार अथवा अन्य चर्चित पक्षों की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न ही किसी सरकारी एजेंसी, बैंक अथवा न्यायिक मंच द्वारा दिवालियापन या वित्तीय अनियमितता से जुड़ी कोई पुष्टि की गई है।

अस्वीकरण: यह समाचार व्यापारिक सूत्रों, बाजार में चल रही चर्चाओं और अपुष्ट दावों पर आधारित है। समाचार में उल्लिखित तथ्यों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।














उल्हासनगर में सेवा और समर्पण का अनूठा उदाहरण: संपादक शिव कुमार मिश्रा का जन्मदिन सामाजिक सरोकारों के साथ धूमधाम से मनाया गया।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी उल्हास जनपथ के संपादक शिव कुमार मिश्रा का जन्मदिन सामाजिक सेवा और जनकल्याण के कार्यों के साथ अत्यंत उत्साह एवं भव्यता से मनाया गया। जन्मदिन के अवसर पर उल्हास जनपथ कार्यालय में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और शिव कुमार मिश्रा को शुभकामनाएं एवं बधाइयां दीं।

कार्यक्रम की सबसे विशेष बात यह रही कि जन्मदिन को केवल उत्सव तक सीमित न रखते हुए इसे समाजसेवा से जोड़ा गया। इस अवसर पर आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद विद्यार्थियों को स्कूल बैग, पुस्तकें एवं पेंसिल सेट वितरित किए गए, ताकि उनकी शिक्षा में किसी प्रकार की बाधा न आए और वे बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें।

इसके साथ ही जरूरतमंद महिलाओं को दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुओं से युक्त राशन किट प्रदान की गईं, जबकि वरिष्ठ नागरिकों को मानसून को ध्यान में रखते हुए छतरियां वितरित की गईं। इस पहल की उपस्थित लोगों ने जमकर सराहना की और इसे समाज के प्रति संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

कार्यक्रम का सबसे आकर्षक और भावुक क्षण तब देखने को मिला जब सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत प्रथम एवं द्वितीय कक्षा की बालिकाओं के लिए विशेष लकी ड्रॉ आयोजित किया गया। लकी ड्रॉ के माध्यम से चयनित छात्राओं को साइकिलें भेंट की गईं। इस उपहार से बालिकाओं और उनके अभिभावकों के चेहरे खुशी से खिल उठे। उपस्थित लोगों ने कहा कि इस प्रकार की पहल न केवल बेटियों को प्रोत्साहित करती है, बल्कि शिक्षा के प्रति समाज में सकारात्मक संदेश भी देती है।

कार्यक्रम में मौजूद सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक और विभिन्न क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने शिव कुमार मिश्रा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उनके स्वस्थ, सुखद एवं दीर्घायु जीवन की कामना की। साथ ही समाजहित में लगातार किए जा रहे उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सेवा, सहयोग और मानवता की भावना को मजबूत करते हैं।

जन्मदिन समारोह सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का संदेश देते हुए संपन्न हुआ। उपस्थित लोगों ने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी शिव कुमार मिश्रा इसी तरह समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्गों के लिए प्रेरणादायी कार्य करते रहेंगे।























उल्हासनगर के कथित बोगस सनद मामले में पत्रकार दिलीप मालवणकर ने मुख्यमंत्री और महसूल मंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने मामले में हजारों करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में कथित बोगस सनद (फर्जी प्रमाणपत्र) प्रकरण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। पत्रकार एवं अन्याय विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष दिलीप मालवणकर ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि वर्षों से चल रही कथित अनियमितताओं के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया है। उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की मांग की है।

मालवणकर का आरोप है कि उल्हासनगर महानगरपालिका का टाउन प्लानिंग विभाग लंबे समय से विवादों के घेरे में रहा है। बिना वैध अनुमति निर्मित इमारतों को नियमित करने, एफएसआई (फ्लोर स्पेस इंडेक्स) में कथित हेरफेर तथा टीडीआर (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) से जुड़े मामलों में समय-समय पर गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। उनका कहना है कि विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति और पदस्थापन को लेकर भी प्रतिस्पर्धा रहती है तथा इन पदों के लिए बड़े पैमाने पर लेनदेन होने की चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं।

पूर्व प्रशासक के कार्यकाल पर सवाल

दिलीप मालवणकर ने आरोप लगाया कि पूर्व प्रशासक जगतसिंह गिरासे के कार्यकाल के दौरान कथित रूप से सैकड़ों गैरकानूनी सनदें जारी की गईं, जिनकी विभागीय जांच अब तक पूरी नहीं हो सकी है। उनका दावा है कि इन मामलों में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने बाकी हैं और जांच लंबित रहने से अनेक प्रश्न अनुत्तरित बने हुए हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान प्रांत अधिकारी (एसडीओ) विजयानंद शर्मा के कार्यकाल में भी कथित रूप से इसी प्रकार की प्रक्रिया जारी है। मालवणकर का कहना है कि यदि पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हो सकते हैं।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी होने का आरोप

मालवणकर के अनुसार, कई मामलों में प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। उनका आरोप है कि कथित रूप से फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए गए, जिससे सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन हुआ। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ मामलों में अपील स्तर तक कथित लेनदेन की व्यवस्था होने की चर्चाएं सामने आई हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के दुरुपयोग का आरोप

दिलीप मालवणकर ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2005 से पूर्व के लंबित मामलों के निपटारे को लेकर दिए गए निर्देशों का कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से दुरुपयोग किया गया। आरोप है कि इसी प्रावधान का सहारा लेकर संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर आवेदन प्रस्तुत किए गए और बाद में प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए।

मुख्यमंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग

मालवणकर ने मुख्यमंत्री तथा राज्य के महसूल मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि पूर्व प्रशासक जगतसिंह गिरासे और वर्तमान प्रांत अधिकारी विजयानंद शर्मा के कार्यकाल में जारी सभी सनदों और प्रमाणपत्रों की विस्तृत जांच कराई जाए। उन्होंने संबंधित कार्यालयों की सीसीटीवी फुटेज की जांच, दस्तावेजों का सत्यापन, आर्थिक लेनदेन की पड़ताल तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है।

अधिकारियों की प्रतिक्रिया का इंतजार

फिलहाल इन आरोपों को लेकर संबंधित अधिकारियों या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, इस मुद्दे ने शहर की राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिकों के बीच नई बहस को जन्म दे दिया है। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मामला उल्हासनगर के सबसे बड़े कथित प्रशासनिक और राजस्व घोटालों में से एक साबित हो सकता है।














आरटीओ की नोटिस के बाद भी नहीं बदली तस्वीर! उल्हासनगर आयुक्त की सरकारी गाड़ी पर फिर दिखी लाल-नीली फ्लैशिंग बत्ती, नियमों की अनदेखी पर उठे सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

देशभर में वीआईपी संस्कृति पर लगाम लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार द्वारा वर्षों पहले वाहनों पर लाल-नीली बत्तियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके बावजूद ठाणे जिले के उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन में नियमों की अनदेखी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। उल्हासनगर महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले की सरकारी गाड़ी पर प्रतिबंधित फ्लैशिंग लाल-नीली बत्ती लगाए जाने का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि कुछ समय पहले इसी मुद्दे पर कल्याण क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) द्वारा दंडात्मक कार्रवाई की जा चुकी है। इसके बावजूद आयुक्त की सरकारी गाड़ी पर कथित रूप से वही ‘जिगजैग’ फ्लैशिंग बत्ती दिखाई देने से प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों के पालन को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

आरटीओ की कार्रवाई के बाद भी नहीं हटी बत्ती

जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पहले कल्याण आरटीओ ने आयुक्त की सरकारी गाड़ी पर अनधिकृत फ्लैशिंग बत्ती लगाए जाने के मामले में कार्रवाई करते हुए जुर्माना लगाया था। उम्मीद की जा रही थी कि इसके बाद संबंधित वाहन से प्रतिबंधित उपकरण हटा दिए जाएंगे, लेकिन हाल की घटनाओं ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया।

सोमवार को कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बैठक में शामिल होने के लिए आयुक्त मनीषा आव्हाले जिस सरकारी वाहन से पहुंचीं, उस पर फिर वही फ्लैशिंग लाल-नीली बत्ती देखी गई। इस घटना ने यह संकेत दिया कि पूर्व में की गई कार्रवाई के बावजूद स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है।

कल्याण आरटीओ ने जारी की आधिकारिक नोटिस

मामले की गंभीरता को देखते हुए कल्याण उप प्रादेशिक परिवहन कार्यालय ने तत्काल हस्तक्षेप किया है। उप प्रादेशिक परिवहन अधिकारी आशुतोष बारकुल द्वारा उल्हासनगर महानगरपालिका आयुक्त को आधिकारिक नोटिस जारी की गई है।

नोटिस में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि वाहन क्रमांक MH-05-FP-9445 पर लाल एवं नीली फ्लैशिंग बत्तियों का उपयोग किया जा रहा है। आरटीओ ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 108 में किए गए संशोधनों का हवाला देते हुए कहा है कि आपातकालीन सेवाओं से जुड़े वाहनों को छोड़कर अन्य किसी भी सरकारी वाहन पर इस प्रकार की फ्लैशिंग बत्तियों का उपयोग वैध नहीं है।

नोटिस के माध्यम से संबंधित वाहन से फ्लैशिंग बत्ती तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही इसकी प्रतिलिपि महानगरपालिका के वाहन विभाग के उप आयुक्त को भी भेजी गई है, ताकि आदेश का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

क्या कहते हैं नियम?

केंद्र सरकार ने 1 मई 2017 से वीआईपी संस्कृति समाप्त करने के उद्देश्य से देशभर में लाल बत्ती के उपयोग पर व्यापक प्रतिबंध लागू किया था। इस निर्णय का उद्देश्य सरकारी पद और शक्ति प्रदर्शन की मानसिकता को समाप्त करना तथा आम नागरिकों और जनप्रतिनिधियों के बीच समानता का संदेश देना था।

वर्तमान नियमों के अनुसार केवल एम्बुलेंस, अग्निशमन विभाग और पुलिस जैसी आपातकालीन सेवाओं के वाहनों को ही लाल अथवा नीली फ्लैशिंग बत्तियों के उपयोग की अनुमति है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश जैसे सीमित संवैधानिक पदों को छोड़कर किसी भी मंत्री, जनप्रतिनिधि अथवा प्रशासनिक अधिकारी को अपने वाहन पर ऐसी बत्ती लगाने की अनुमति नहीं है।

जनता के बीच चर्चा का विषय बना मामला

इस पूरे प्रकरण ने आम नागरिकों के बीच भी चर्चा छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि जब प्रशासनिक अधिकारी स्वयं नियमों का पालन नहीं करेंगे तो आम जनता से कानून का सम्मान करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। नागरिकों का मानना है कि नियम सभी के लिए समान होने चाहिए और उनका पालन भी बिना किसी अपवाद के किया जाना चाहिए।

अब सबकी नजर अगले कदम पर

आरटीओ द्वारा जारी नोटिस के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन इस आदेश का तत्काल पालन करेगा? क्या आयुक्त की सरकारी गाड़ी से प्रतिबंधित फ्लैशिंग बत्ती हटाई जाएगी, या फिर यह विवाद आगे और बढ़ेगा?

फिलहाल आरटीओ की सख्त नोटिस के बाद प्रशासनिक गलियारों में इस मुद्दे की चर्चा तेज हो गई है और आम जनता की नजरें अब आयुक्त कार्यालय की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।














उल्हासनगर में बढ़ रही जनआक्रोश की भावना: आयुक्त मनीषा आव्हाले से मुलाकात नहीं होने पर नागरिकों ने जताई नाराजगी.!


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका की आयुक्त मनीषा आव्हाले से आम नागरिकों की नियमित मुलाकात नहीं हो पाने के कारण शहर में असंतोष का माहौल बनता दिखाई दे रहा है। नागरिकों का कहना है कि महानगरपालिका प्रशासन द्वारा प्रत्येक मंगलवार को दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक आयुक्त से मिलने का समय निर्धारित किया गया है, ताकि लोग अपनी समस्याएं, शिकायतें और सुझाव सीधे प्रशासन के सर्वोच्च अधिकारी तक पहुंचा सकें। हालांकि, पिछले कई सप्ताहों से नागरिकों को आयुक्त से मुलाकात का अवसर नहीं मिल पा रहा है।

शिकायत लेकर महानगरपालिका मुख्यालय पहुंचने वाले नागरिकों का आरोप है कि कई बार उन्हें आयुक्त कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा बताया जाता है कि आयुक्त मंत्रालय में किसी बैठक के लिए गई हैं, जबकि कुछ अवसरों पर अन्य सरकारी कार्यों में व्यस्त होने का कारण बताया जाता है। इसके चलते दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले नागरिकों को निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है।

शहर के कई नागरिकों का कहना है कि वे जलापूर्ति, सड़क मरम्मत, सफाई व्यवस्था, अवैध निर्माण, संपत्ति कर, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर आयुक्त से मिलने पहुंचते हैं, लेकिन लगातार मुलाकात नहीं हो पाने से उनकी समस्याओं के समाधान में देरी हो रही है। इससे लोगों में यह भावना बढ़ रही है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।

नागरिकों के बीच अब यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि यदि महानगरपालिका आयुक्त से ही मुलाकात संभव नहीं हो पा रही है, तो वे अपनी समस्याओं और शिकायतों के निराकरण के लिए किस अधिकारी के पास जाएं। कई लोगों का मानना है कि जनसुनवाई की व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों और प्रशासन के बीच सीधा संवाद स्थापित करना होता है, लेकिन यदि निर्धारित समय पर भी अधिकारी उपलब्ध नहीं रहते, तो इस व्यवस्था का महत्व कम हो जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों का कहना है कि महानगरपालिका प्रशासन को इस विषय पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। यदि आयुक्त किसी कारणवश निर्धारित समय पर उपलब्ध नहीं हैं, तो नागरिकों की शिकायतें सुनने और उन पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी को अधिकृत किया जाना चाहिए। साथ ही नागरिकों को पूर्व सूचना देने की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

इस पूरे मुद्दे को लेकर शहर में चर्चा का माहौल है और नागरिक उम्मीद कर रहे हैं कि महानगरपालिका प्रशासन जनसुनवाई व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाएगा, ताकि आम जनता की समस्याओं का समयबद्ध समाधान हो सके और प्रशासन के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत बना रहे।















उल्हासनगर के ज्वलंत मुद्दों को लेकर FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे से मुलाकात की तैयारी, सामाजिक संगठन और बुद्धिजीवी होंगे एकजुट।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर के कई सामाजिक संगठन, नागरिक मंच और शहर के कुछ प्रमुख बुद्धिजीवी जल्द ही FDA आयुक्त Tukaram Munde से मुलाकात कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि इस प्रस्तावित बैठक में शहर से जुड़े विभिन्न जनहित के मुद्दों, प्रशासनिक चुनौतियों तथा नागरिकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया जाएगा।

जानकारी के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल शहर में खाद्य सुरक्षा, अवैध गुटखा कारोबार, जनस्वास्थ्य से जुड़े विषयों तथा आम नागरिकों को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों पर आयुक्त का ध्यान आकर्षित करेगा। इसके अलावा, विभिन्न संगठनों द्वारा तैयार किए गए शिकायत पत्र और सुझाव भी आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि हाल के दिनों में FDA द्वारा राज्यभर में चलाए जा रहे सख्त अभियान और आयुक्त तुकाराम मुंढे की सक्रिय कार्यशैली को देखते हुए स्थानीय संगठनों ने सीधे संवाद का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया है। इस मुलाकात के माध्यम से शहर की समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कार्रवाई की मांग किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

हालांकि, इस प्रस्तावित बैठक की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन शहर के सामाजिक और नागरिक संगठनों के बीच इसे लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। यदि यह बैठक होती है, तो उल्हासनगर से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को राज्य स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर मिल सकता है।

फिलहाल सभी की निगाहें इस संभावित मुलाकात पर टिकी हैं, जिससे शहर की विभिन्न समस्याओं के समाधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।














उल्हासनगर में विकास पर ब्रेक! प्रशासन और नगरसेवकों के बीच बढ़ी खींचतान, विकास कार्यों की रफ्तार थमी, वार्डों में अटकी योजनाएं; जनता में बढ़ रहा असंतोष।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में इन दिनों प्रशासन और नव-निर्वाचित नगरसेवकों के बीच बढ़ती खींचतान का सीधा असर शहर के विकास कार्यों पर दिखाई देने लगा है। विभिन्न वार्डों में सड़क मरम्मत, नाला सफाई, पानी आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़े कई प्रस्ताव लंबित पड़े हैं, जिससे नागरिकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

सूत्रों के अनुसार, कई नगरसेवकों का आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर फाइलों को जानबूझकर धीमी गति से आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि अधिकारियों का कहना है कि नियमों और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है। इसी टकराव के चलते अनेक विकास योजनाओं की मंजूरी और कार्यादेश अटक गए हैं।

नगरसेवकों का दावा है कि चुनाव के दौरान जनता से किए गए विकास के वादों को पूरा करने में प्रशासनिक अड़चनें सबसे बड़ी बाधा बन रही हैं। कई जनप्रतिनिधियों ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों द्वारा उनके सुझावों और प्रस्तावों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि पारदर्शिता और नियमानुसार कार्यवाही सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है। बिना तकनीकी और वित्तीय मंजूरी के किसी भी काम को जल्दबाजी में शुरू नहीं किया जा सकता। अधिकारियों का यह भी तर्क है कि पिछली कई परियोजनाओं में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने के बाद सतर्कता बढ़ाई गई है।

इस खींचतान का सबसे अधिक असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। कई इलाकों में अधूरे विकास कार्य, खराब सड़कें, जलभराव और सफाई समस्याओं को लेकर लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच चल रही रस्साकशी में शहर का विकास पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आने वाले समय में यह विवाद और गहरा सकता है। वहीं, शहर के नागरिक अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से टकराव खत्म कर विकास कार्यों को गति देने की मांग कर रहे हैं।














उल्हासनगर मनपा में चुनावी घोटाले की चर्चा तेज, आयुक्त ने अधिकारियों-कर्मचारियों को जारी किया ‘कारण बताओ नोटिस’


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के आम चुनाव के लिए खरीदी गई चुनावी सामग्री में करोड़ों रुपये के कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आने से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान खरीदी गई सामग्री को बाजार मूल्य से कहीं अधिक दरों पर खरीदने तथा चुनाव समाप्त होने के बाद उसे महानगरपालिका के रिकॉर्ड और कब्जे में जमा न कर निजी स्तर पर ठिकाने लगाने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर जवाब तलब किया है।

सूत्रों के अनुसार, चुनाव विभाग के माध्यम से कंप्यूटर, कैमरे, पेन-कागज, टेबल-कुर्सियां, डस्टबिन, मंडप, पानी की बोतलें समेत अन्य आवश्यक सामग्री की बड़े पैमाने पर खरीद की गई थी। आरोप है कि इन वस्तुओं की खरीद में नियमों को दरकिनार करते हुए बाजार भाव से अधिक कीमतें दिखाई गईं, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

सबसे गंभीर बात यह सामने आई है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह सामग्री महानगरपालिका के स्वामित्व में वापस जमा होना अपेक्षित था, लेकिन बड़ी मात्रा में सामग्री का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इससे यह आशंका गहरा गई है कि कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से चुनावी सामग्री का गैरकानूनी तरीके से निपटारा किया गया।

बताया जा रहा है कि चुनाव विभाग के खर्चों का नियमित ऑडिट न होने का फायदा उठाकर वित्तीय गड़बड़ियों को अंजाम दिया गया। जब यह मामला आयुक्त मनीषा आव्हाले के संज्ञान में आया, तब उन्होंने तत्काल उस समय चुनाव विभाग में कार्यरत अतिरिक्त आयुक्त, उपायुक्त, संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा।

आयुक्त की इस कार्रवाई के बाद महानगरपालिका परिसर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं गहन जांच की मांग करते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक और आपराधिक कार्रवाई की मांग उठाई है।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में यदि अनियमितताएं साबित होती हैं, तो प्रशासन दोषियों पर कितनी सख्त कार्रवाई करता है और करोड़ों रुपये के कथित घोटाले की परतें कब तक खुलती हैं।














प्रॉपर्टी टैक्स बकाया पर दुकान-गोदाम सील नहीं कर सकती उल्हासनगर महानगर पालिका - बॉम्बे हाईकोर्ट


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी वैधानिक प्रावधान के अभाव में नगर निकाय बकाया संपत्ति कर वसूलने के लिए किसी परिसर को सील नहीं कर सकते। अदालत ने मंगलवार को उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) को निर्देश दिया कि वह कथित टैक्स बकाया के कारण सील किए गए एक फास्ट-फूड आउटलेट और गोदाम को तुरंत खोल दे।

जस्टिस गौतम अंखाड और जस्टिस संदीप डी. पाटिल की अवकाशकालीन पीठ ने यह आदेश दुकान मालिक लछमन दुसेजा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। दुसेजा की संपत्तियों को 30 मार्च को सील किया गया था।

पीठ ने कहा,

“प्रतिवादी निगम के वकील हमें ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं दिखा सके, जो संपत्ति कर का भुगतान न होने पर परिसर सील करने का अधिकार देता हो।”

अदालत ने UMC को दुसेजा के गोदाम और दुकान को तुरंत अनसील करने का आदेश दिया।

दुसेजा के अनुसार, UMC अधिकारियों ने 30 मार्च को उनके परिसरों का दौरा किया और दोनों संपत्तियों को सील करने से पहले अटैचमेंट आदेश जारी किया। निगम ने गोदाम पर ₹5.64 लाख और दुकान पर ₹1.30 लाख संपत्ति कर बकाया होने का दावा किया था।

दुसेजा की ओर से पेश अधिवक्ता एस.बी. राव ने दलील दी कि महाराष्ट्र म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट, 1949 और उसके तहत बनाए गए नियम नगर निकायों को संपत्ति कर वसूली के लिए परिसर सील करने का अधिकार नहीं देते। उन्होंने इस मुद्दे पर हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों का भी हवाला दिया।

अदालत ने यह दलील स्वीकार कर ली, क्योंकि UMC के वकील सुरेश कांबले इस कार्रवाई के समर्थन में कोई वैधानिक प्रावधान पेश नहीं कर सके।

दुसेजा ने अदालत को बताया कि वह संपत्ति कर चुकाने को तैयार हैं, लेकिन नगर निकाय द्वारा लगाए गए जुर्माने और विलंब शुल्क का विरोध कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने उन्हें बकाया कर जमा करने की अनुमति दी और मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की।














उल्हासनगर में बिजली चोरी पर बड़ा खुलासा, MSEDCL अधिकारी पर रिश्वत लेकर कनेक्शन जोड़ने का आरोप।


 


उल्हासनगर: दिनेश मिरचंदानी

महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) में कथित भ्रष्टाचार और बिजली चोरी को संरक्षण देने का गंभीर मामला सामने आया है। उल्हासनगर-3 स्थित स्नेहदीप अपार्टमेंट्स में हुई कार्रवाई के दौरान MSEDCL के एक वरिष्ठ अधिकारी पर बिजली चोरी पकड़ने के बाद कथित रूप से रिश्वत लेकर दोबारा बिजली कनेक्शन जोड़ने का आरोप लगा है। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो और फोटो सामने आने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया है।

सोसायटी प्रशासन का आरोप है कि 22 मई 2026 को MSEDCL उल्हासनगर डिवीजन के अतिरिक्त कार्यकारी अभियंता श्री भास्कर कोले अपनी टीम के साथ स्नेहदीप अपार्टमेंट्स पहुंचे थे। सोसायटी द्वारा लंबे समय से फ्लैट नंबर 105 (A-विंग) और फ्लैट नंबर 204 (B-विंग) में बड़े पैमाने पर बिजली चोरी और अवैध बिजली उपयोग की शिकायत की जा रही थी।

बिना मीटर चल रही थी भारी बिजली खपत

सोसायटी के अनुसार दोनों फ्लैटों में बिना मीटर के भारी बिजली उपयोग किया जा रहा था, जो बिजली अधिनियम की धारा 126 और 135 का उल्लंघन है। आरोप है कि इन फ्लैटों पर लाल पंजाबी और गोविंद पंजाबी नामक व्यक्तियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। बताया गया कि मूल फ्लैट मालिकों की वर्षों पहले मृत्यु हो चुकी है।

शिकायत के बाद MSEDCL की टीम मौके पर पहुंची और कथित रूप से अवैध बिजली लाइन काटी गई। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने पूरे मामले को विवादों में ला दिया।

“30 मिनट की बंद कमरे की डील” का आरोप

सोसायटी सदस्यों का आरोप है कि बिजली लाइन काटने के तुरंत बाद अधिकारी श्री भास्कर कोले अपनी टीम और एक निजी मध्यस्थ के साथ आरोपी फ्लैट के अंदर गए। करीब 30 मिनट तक टीम फ्लैट के भीतर रही और इस दौरान किसी भी सोसायटी सदस्य को अंदर नहीं आने दिया गया।

आरोप यह भी है कि मौके पर कोई पंचनामा तैयार नहीं किया गया और बाहर आने के बाद FIR दर्ज करने की बजाय उसी बिजली लाइन को दोबारा जोड़ दिया गया जिसे कुछ मिनट पहले अवैध बताते हुए काटा गया था।

रिश्वत लेकर मामला दबाने का आरोप

स्थानीय सूत्रों और सोसायटी प्रशासन का दावा है कि बंद कमरे में हुई बातचीत के दौरान करीब ₹25,000 की रिश्वत देकर मामले को दबा दिया गया। हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कथित फोटो और वीडियो अब सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर तेजी से चर्चा में हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब स्थानीय नागरिकों ने अधिकारी से सवाल किया कि बिजली चोरी करने वालों को संरक्षण क्यों दिया जा रहा है, तो उन्होंने कथित रूप से कहा:

“अब यह मामला लीगल डिपार्टमेंट का है, मेरा काम खत्म हो गया।”

इसके बाद अधिकारी अपनी टीम के साथ मौके से रवाना हो गए।

Vigilance और ACB को भेजे गए सबूत

सोसायटी सचिव भूषण बलदेव खत्री ने दावा किया है कि पूरे घटनाक्रम से जुड़े फोटो और दस्तावेज मुंबई स्थित चीफ विजिलेंस ऑफिसर (CVO), ठाणे एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB), मुख्यमंत्री कार्यालय और ऊर्जा मंत्रालय को भेज दिए गए हैं।

सोसायटी का यह भी आरोप है कि कार्रवाई के दौरान इस्तेमाल की गई MSEB की गाड़ी को जानबूझकर बिल्डिंग से दूर खड़ा किया गया ताकि पूरी कार्रवाई सार्वजनिक नजरों से दूर रहे।

“सरकारी खजाने की खुली लूट” – सोसायटी प्रशासन

सोसायटी प्रशासन ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि:

“यह सरकारी खजाने की खुलेआम लूट है। जिन अधिकारियों को बिजली चोरी रोकने की जिम्मेदारी दी गई है, वही आरोपियों को संरक्षण देते नजर आ रहे हैं। यदि 48 घंटे के भीतर FIR दर्ज कर कार्रवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की जाएगी।”

मीडिया को सौंपे गए दस्तावेज

सोसायटी प्रशासन ने मीडिया को निम्न दस्तावेज उपलब्ध कराने का दावा किया है:

MSEDCL को दी गई प्रारंभिक शिकायतों की प्रतियां

मौके पर ली गई तस्वीरें और कथित वीडियो

अधिकारी और टीम की मौजूदगी के फोटो

कथित अवैध बिजली इंस्टॉलेशन से जुड़े रिकॉर्ड

अब इस पूरे मामले में MSEDCL, Vigilance विभाग और ACB की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।























उल्हासनगर-5 के जींस मार्केट में हवाला और चेक डिस्काउंटिंग का बड़ा खेल? “हरगुन” नामक कारोबारी पर करोड़ों के फर्जी लेनदेन का आरोप, ED, INCOMETAX और EOW तक पहुंच सकती है शिकायत।

(फाइल इमेज)

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र के Ulhasnagar के उल्हासनगर-5 स्थित जींस मार्केट में कथित हवाला कारोबार, चेक डिस्काउंटिंग और फर्जी बैंक खातों के जरिए बड़े आर्थिक खेल का मामला सामने आने की चर्चा तेज हो गई है। मार्केट के कुछ व्यापारियों और सूत्रों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार, “हरगुन” नामक व्यक्ति लंबे समय से करोड़ों रुपये के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन से जुड़ी गतिविधियों को संचालित कर रहा है, जिससे भारत सरकार के राजस्व को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक, आरोपी ने अपने कर्मचारियों, करीबी रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर कई कथित फर्जी करंट अकाउंट खुलवा रखे हैं। “हरगुन” नामक व्यक्ति कर्मचारियों, करीबी रिश्तेदारों और जान-पहचान के लोगों के नाम पर फर्जी करंट अकाउंट खुलवाने के लिए मोटी रकम देता है। इन खातों के माध्यम से प्रतिदिन लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक का लेनदेन होने की बात सामने आ रही है। आरोप यह भी हैं कि कई ट्रांजैक्शन फर्जी बिलों और कागजी कंपनियों के आधार पर किए जा रहे हैं, ताकि वास्तविक कारोबारी गतिविधियों को छिपाया जा सके।

व्यापारिक सूत्रों का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क का उपयोग चेक डिस्काउंटिंग, हवाला ट्रांजैक्शन और टैक्स चोरी जैसी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि कुछ व्यापारियों ने इस मामले से जुड़े बैंक खातों, लेनदेन और दस्तावेजों की जानकारी जुटाना शुरू कर दिया है, जिसके आधार पर जल्द ही विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

जानकारी के अनुसार, इस मामले की शिकायत Enforcement Directorate, Income Tax Department, Central Bureau of Investigation और Economic Offences Wing समेत अन्य जांच एजेंसियों तक पहुंच सकती है। यदि शिकायत दर्ज होती है, तो बैंकिंग ट्रांजैक्शन, GST रिकॉर्ड, फर्जी बिलिंग और संदिग्ध खातों की गहन जांच की संभावना जताई जा रही है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि जांच आगे बढ़ने पर जींस मार्केट से जुड़े कुछ अन्य व्यापारियों और सहयोगियों के नाम भी सामने आ सकते हैं। हालांकि, अब तक किसी एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है और न ही आरोपों पर संबंधित व्यक्ति की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई है।

फिलहाल, उल्हासनगर के व्यापारिक क्षेत्र में इस कथित वित्तीय नेटवर्क को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है और सभी की नजर संभावित जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।