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अंबरनाथ MIDC में ‘Cluster-2’ की कथित प्लॉटिंग पर सवाल; 400 KV लाइन के सुरक्षा क्षेत्र की जांच की मांग।


अंबरनाथ: मंत्रालय टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

अंबरनाथ के अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्र स्थित आनंदनगर MIDC परिसर में हाई-वोल्टेज विद्युत लाइन और टावरों के आसपास प्रस्तावित औद्योगिक विकास को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत एवं RTI आवेदन में आरोप लगाया गया है कि 400 KV अतिरिक्त उच्चदाब विद्युत लाइन के कथित सुरक्षा क्षेत्र के आसपास औद्योगिक भूखंडों के आवंटन तथा ‘Cluster-2’ के नाम पर लगभग 100 से 120 प्लॉट विकसित किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

मामले में अब मुख्य सवाल यह है कि संबंधित भूखंडों और प्रस्तावित औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देते समय विद्युत सुरक्षा मानकों, लागू नियमों, स्वीकृत लेआउट और संबंधित NOC की तकनीकी वैधता की जांच किस स्तर पर की गई।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। उपलब्ध शिकायत/RTI मसौदे के आधार पर उठाए गए सवालों का वास्तविक उत्तर संबंधित मंजूरी फाइल, NOC, तकनीकी रिपोर्ट, स्थल निरीक्षण और अधिकृत विभागीय रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

400 KV लाइन के पास 200 वर्ग मीटर भूखंड आवंटन का दावा

शिकायत में दावा किया गया है कि महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) की ओर से M/s Arul Cluster Association को 200 वर्ग मीटर का भूखंड आवंटित किया गया है और इस प्रक्रिया में संबंधित विद्युत प्राधिकरण की NOC का महत्व बताया गया है।

अब यह जांच का विषय है कि उक्त भूखंड 400 KV अतिरिक्त उच्चदाब विद्युत लाइन के Right of Way अथवा निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र के भीतर या उसके निकट आता है या नहीं।

शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया है कि यदि संबंधित क्षेत्र विद्युत सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है, तो NOC जारी करने से पहले क्या प्रत्यक्ष स्थल निरीक्षण किया गया था? क्या वास्तविक सुरक्षा दूरी मापी गई? क्या टावर की स्थिति और विद्युत लाइन का लेआउट स्वीकृत नक्शे से मिलाया गया? और क्या MIDC ने संबंधित NOC का स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन किया?

‘Cluster-2’ में 100 से 120 प्लॉट विकसित करने का आरोप

MIDC के चीफ इंजीनियर प्रकाश चव्हाण को दिए गए एक पत्र में अनिल लक्ष्मण भोईर की ओर से आरोप लगाया गया है कि एन्व्हेंशिया कंपनी के सामने से आर.आर. सर्कल तथा आर.आर. सर्कल से ठाकुरपाड़ा क्षेत्र तक हाई-वोल्टेज विद्युत लाइनों और टावरों के आसपास बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग किए जाने की जानकारी सामने आई है।

पत्र में दावा किया गया है कि ‘Cluster-2’ के नाम पर लगभग 100 से 120 प्लॉट विकसित किए जा रहे हैं और भविष्य में इन पर विभिन्न कंपनियों तथा औद्योगिक निर्माणों की संभावना है।

हालांकि, इस कथित प्लॉटिंग की आधिकारिक मंजूरी, स्वीकृत लेआउट, भूखंडों की वास्तविक संख्या और विद्युत सुरक्षा मानकों के अनुपालन की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

ऐसे में प्रमुख सवाल है कि यदि यह प्लॉटिंग अधिकृत है तो उसका स्वीकृत लेआउट क्या है और क्या उसे मंजूरी देते समय 400 KV लाइन के सुरक्षा क्षेत्र को ध्यान में रखा गया था?

GNP परियोजना पर भी उठे सवाल, लेकिन आरोपों की पुष्टि बाकी

मामले में GNP कंपनी, निखिल लटके और उदय ढाले की कथित भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में यह आरोप लगाया गया है कि संबंधित परियोजना को मंजूरी दिलाने में इनकी भूमिका रही तथा कुछ MIDC अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मंजूरी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

हालांकि, यह एक गंभीर आरोप है और बिना आधिकारिक रिकॉर्ड या जांच के इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

इसलिए अब जांच के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि—

- GNP परियोजना का प्रस्ताव किस संस्था या व्यक्ति ने प्रस्तुत किया?

- परियोजना की जांच किन अधिकारियों ने की?

- निखिल लटके और उदय ढाले की आधिकारिक भूमिका क्या थी?

- क्या उनके नाम किसी फाइल, प्रस्ताव, बैठक, अनुशंसा या मंजूरी रिकॉर्ड में दर्ज हैं?

- परियोजना को मंजूरी देते समय विद्युत सुरक्षा से संबंधित कौन-सी तकनीकी रिपोर्ट उपलब्ध थी?

- अंतिम मंजूरी किस अधिकारी ने और किस आधार पर दी?

इन सवालों का उत्तर संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।

‘MIDC अधिकारियों की मिलीभगत’ के आरोप की भी होगी दस्तावेजों से जांच

शिकायत में MIDC अधिकारियों की कथित मिलीभगत से परियोजना को मंजूरी देने का आरोप लगाया गया है। लेकिन किसी अधिकारी की भूमिका या कथित मिलीभगत स्थापित करने के लिए केवल शिकायत अथवा आरोप पर्याप्त नहीं हैं।

इसके लिए पूरी फाइल की जांच आवश्यक होगी—मसलन प्रस्ताव किस स्तर से शुरू हुआ, किस अधिकारी ने परीक्षण किया, किस तकनीकी विभाग ने रिपोर्ट दी, NOC किस अधिकारी ने स्वीकार की, स्थल निरीक्षण किसने किया और अंतिम मंजूरी किस स्तर पर दी गई।

यदि फाइल रिकॉर्ड में नियमों के अनुरूप प्रक्रिया का पालन पाया जाता है, तो प्रशासन की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि दस्तावेजों में गंभीर विसंगति या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित जिम्मेदारी तय करने का आधार बन सकता है।

RTI के जरिए मांगे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज

इस मामले में RTI के माध्यम से कथित रूप से पूरी मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज हासिल करने का प्रयास किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से—

- M/s Arul Cluster Association द्वारा प्रस्तुत NOC की प्रमाणित प्रति

- NOC के सत्यापन से संबंधित रिपोर्ट और फाइल नोटिंग

- भूखंड आवंटन की पूरी नोटशीट और मंजूरी फाइल

- संबंधित अधिकारियों की टिप्पणियां एवं अनुमोदन

- 24 नवंबर 2023 की बैठक के मिनट्स एवं रेजोल्यूशन

- Arul Cluster Association का पंजीकरण, संविधान और पदाधिकारियों की जानकारी

- सुरक्षा क्षेत्र में भूखंड आवंटन से संबंधित MIDC नियम, सरकारी आदेश एवं नीतिगत प्रावधान

- संबंधित लेआउट एवं तकनीकी दस्तावेज

- स्थल निरीक्षण और सुरक्षा जांच रिपोर्ट

मांगी गई हैं।

इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मंजूरी प्रक्रिया वास्तव में किस आधार पर पूरी की गई थी।

NOC की वैधता से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका तकनीकी आधार

इस पूरे मामले में NOC सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक बनकर सामने आ रही है।

सिर्फ NOC मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी आवश्यक है कि NOC किस अधिकारी ने जारी की, कब जारी की गई, किस स्थल निरीक्षण के आधार पर जारी हुई और क्या उस समय वास्तविक सुरक्षा दूरी का तकनीकी परीक्षण किया गया था।

विशेष रूप से यह जांच जरूरी होगी कि—

क्या टावर की वास्तविक स्थिति का सर्वे किया गया था?

क्या विद्युत लाइन की स्थिति और प्रस्तावित निर्माण के बीच दूरी मापी गई थी?

क्या स्वीकृत लेआउट में विद्युत सुरक्षा क्षेत्र दर्शाया गया है?

क्या संबंधित विद्युत प्राधिकरण की तकनीकी सहमति उपलब्ध है?

और क्या MIDC ने NOC का स्वतंत्र सत्यापन किया?

400 KV लाइन के सुरक्षा कॉरिडोर पर तकनीकी जांच जरूरी

शिकायत में Central Electricity Authority (CEA) Regulations, 2022 और संबंधित भारतीय मानकों का हवाला दिया गया है। मसौदे में 400 KV ट्रांसमिशन लाइन के संदर्भ में लगभग 46 से 52 मीटर के Right of Way/सुरक्षा कॉरिडोर का उल्लेख भी किया गया है।

हालांकि, वास्तविक लागू सुरक्षा दूरी केवल किसी एक आंकड़े के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती। यह संबंधित तकनीकी परिस्थितियों, टावर की संरचना, लाइन की व्यवस्था और उस समय लागू आधिकारिक नियमों के अनुसार संबंधित सक्षम तकनीकी प्राधिकरण द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

इसलिए इस मामले में कागजी दावे के बजाय संयुक्त स्थल सर्वेक्षण और आधिकारिक तकनीकी माप अधिक निर्णायक साबित होंगे।

BCC जारी करने से पहले संयुक्त स्थल निरीक्षण की मांग

अनिल भोईर की ओर से दिए गए पत्र में निर्माणों को Building Completion Certificate (BCC) देने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।

मांग की गई है कि कार्यकारी अभियंता, अंबरनाथ; चीफ इंजीनियर, अंधेरी तथा संबंधित विद्युत विभाग के अधिकारियों द्वारा संयुक्त स्थल निरीक्षण किया जाए।

इसके बाद—

1. विद्युत लाइन और टावर से वास्तविक दूरी मापी जाए।

2. स्वीकृत लेआउट से मौके की स्थिति का मिलान किया जाए।

3. संबंधित NOC की तकनीकी जांच की जाए।

4. सुरक्षा मानकों के अनुपालन की रिपोर्ट तैयार की जाए।

5. रिपोर्ट के आधार पर ही BCC पर आगे निर्णय लिया जाए।

“BCC जरूरी है या मजदूरों की सुरक्षा?”—उठाया गया सवाल

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि औद्योगिक विकास और रोजगार का विरोध नहीं है, लेकिन विकास के साथ श्रमिकों और आम नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पत्र में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि हाई-वोल्टेज लाइन के आसपास निर्माण कार्य चल रहे हैं तो किसी संभावित दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी।

इसी संदर्भ में पत्र का संदेश है कि कागजी मंजूरी, NOC या BCC किसी दुर्घटना के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते।

इसलिए मांग की गई है कि पहले वास्तविक सुरक्षा स्थिति का तकनीकी सत्यापन किया जाए और उसके बाद ही निर्माण संबंधी प्रमाणपत्रों पर निर्णय लिया जाए।

अनधिकृत प्लॉटिंग या नियम उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई की मांग

शिकायत में यह भी मांग की गई है कि यदि जांच में अनधिकृत प्लॉटिंग, नियम-विरुद्ध निर्माण अथवा विद्युत सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित भू-स्वामियों, डेवलपर्स, कंपनियों अथवा जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।

यदि पहले से कोई NOC, लाइसेंस अथवा BCC जारी किया गया है, तो उसके आधार, निरीक्षण रिपोर्ट और तकनीकी अनुमोदन भी सार्वजनिक किए जाने की मांग की गई है।

दस्तावेज गलत पाए जाने पर कार्रवाई की मांग, लेकिन अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं

शिकायत के मसौदे में यह भी कहा गया है कि यदि जांच के दौरान कोई दस्तावेज फर्जी, गलत अथवा गलत जानकारी के आधार पर प्राप्त किया गया पाया जाता है, तो लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए।

लेकिन वर्तमान उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी दस्तावेज के आधिकारिक रूप से फर्जी घोषित किए जाने या इस संबंध में कोई अपराध सिद्ध होने की पुष्टि नहीं है।

इसलिए फिलहाल इसे केवल जांच की मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

15 दिनों में Action Taken Report की मांग

अनिल भोईर के पत्र में मामले की विस्तृत जांच कर 15 दिनों के भीतर लिखित Action Taken Report देने की मांग की गई है।

साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि संयुक्त स्थल निरीक्षण और सुरक्षा सत्यापन के बिना BCC देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है, तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा।

अब प्रशासन के सामने छह बड़े सवाल

इस पूरे मामले में दस्तावेज सामने आने तक निम्न सवाल महत्वपूर्ण बने हुए हैं—

1. ‘Cluster-2’ की आधिकारिक स्थिति और मंजूरी क्या है?

2. लगभग 100 से 120 प्लॉट की कथित प्लॉटिंग किस स्वीकृत लेआउट के आधार पर की गई है?

3. 400 KV विद्युत लाइन और प्रस्तावित निर्माणों के बीच वास्तविक सुरक्षा दूरी कितनी है?

4. संबंधित NOC किस स्थल निरीक्षण और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर जारी की गई?

5. GNP परियोजना की मंजूरी में किन अधिकारियों ने फाइल की जांच की और अंतिम मंजूरी किस स्तर पर दी गई?

6. निखिल लटके और उदय ढाले की परियोजना में आधिकारिक भूमिका क्या थी?

RTI से सामने आएगी मंजूरी प्रक्रिया की पूरी तस्वीर?

अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका RTI से मिलने वाले दस्तावेजों की हो सकती है।

राजनीतिक आरोप, शिकायतें या मौखिक दावे अपनी जगह हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति का आकलन मूल फाइल, नोटशीट, NOC, तकनीकी रिपोर्ट, स्वीकृत लेआउट, बैठक के प्रस्ताव और स्थल निरीक्षण रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।

यदि सभी मंजूरियां नियमानुसार हुई हैं, तो संबंधित प्रशासन के पास दस्तावेजों के जरिए स्थिति स्पष्ट करने का अवसर होगा। दूसरी ओर, यदि दस्तावेजों में नियमों के उल्लंघन, विसंगतियां या सुरक्षा संबंधी कमियां सामने आती हैं, तो आगे की जांच और जिम्मेदारी तय करने का आधार भी तैयार हो सकता है।

निष्कर्ष: औद्योगिक विकास जरूरी, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं

अंबरनाथ MIDC में औद्योगिक विकास रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन हाई-वोल्टेज विद्युत लाइन और टावरों के आसपास प्रस्तावित निर्माण के मामले में सार्वजनिक एवं श्रमिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

‘Cluster-2’ की कथित प्लॉटिंग से लेकर 400 KV विद्युत कॉरिडोर, NOC, भूखंड आवंटन, GNP परियोजना और BCC तक—हर स्तर पर दस्तावेजी और तकनीकी सत्यापन आवश्यक दिखाई देता है।

इस पूरे प्रकरण में फिलहाल किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने के बजाय यह जरूरी है कि MIDC और संबंधित विद्युत प्राधिकरण संयुक्त स्थल निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें और RTI के माध्यम से मांगे गए रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं।

आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि फाइल पर मंजूरी किसने दी, बल्कि यह भी है कि क्या मौके पर वास्तविक सुरक्षा मानकों का पालन हुआ?

कागज पर मंजूरी महत्वपूर्ण है या मजदूरों की सुरक्षा—इसका जवाब अब दस्तावेजों, तकनीकी जांच और प्रत्यक्ष स्थल निरीक्षण से ही सामने आना चाहिए।

















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