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₹85 करोड़ के टेंडरों पर उल्हासनगर महापालिका में बवाल, स्टैंडिंग कमेटी को दरकिनार करने के आरोप।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका में करीब ₹85 करोड़ के विकास कार्यों के टेंडरों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि इन करोड़ों रुपये के टेंडरों को स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमेटी) की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किए बिना ही महानगरपालिका प्रशासन ने अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए स्वीकृति दे दी। इस घटनाक्रम ने महापालिका की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

महापालिका सूत्रों के मुताबिक, स्टैंडिंग कमेटी के 16 सदस्यों का गठन होने के बावजूद इन विकास कार्यों के प्रस्ताव समिति के समक्ष चर्चा और अनुमोदन के लिए नहीं रखे गए। आरोप है कि एक प्रभावशाली राजनीतिक नेता के कथित हस्तक्षेप और कुछ स्थानीय बिचौलियों की भूमिका के चलते टेंडरों का आवंटन सीधे कर दिया गया।

सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले पर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना (शिंदे गुट) के स्टैंडिंग कमेटी सदस्यों ने कड़ी आपत्ति जताई है। इसके बाद यह मामला प्रशासनिक दायरे से निकलकर राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।

जानकारी के अनुसार, पी.पी. कॉन्ट्रैक्टर को दलित बस्ती विकास योजना के अंतर्गत ₹21 करोड़ और ₹10 करोड़, कुल ₹31 करोड़ के कार्य आवंटित किए गए हैं। वहीं, दलित बस्ती क्षेत्र में गार्डन सौंदर्यीकरण, समाज मंदिर निर्माण तथा अन्य विकास कार्यों से जुड़े लगभग ₹27 करोड़ के टेंडर जय भारत कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिए गए हैं।

इसके अलावा, शहाड रेलवे स्टेशन के बाहर प्रस्तावित चार लेन सड़क निर्माण परियोजना के लिए राज्य सरकार से प्राप्त करीब ₹25 करोड़ की निधि से जुड़े कार्य भी जय भारत कंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है। इस प्रकार विभिन्न विकास योजनाओं से जुड़े लगभग ₹85 करोड़ के टेंडरों को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।

आरोप यह भी है कि टेंडरों को स्टैंडिंग कमेटी के समक्ष रखने के बजाय सीधे प्रशासनिक स्तर पर मंजूरी दी गई, जिससे वैधानिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी नगरसेवकों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका को ही नजरअंदाज किया जाएगा, तो स्टैंडिंग कमेटी के गठन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

इस बीच यह भी चर्चा है कि पिछले लगभग दो महीनों से महापालिका की सर्वसाधारण सभा आयोजित नहीं की गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि टेंडर विवाद पर संभावित बहस और जवाबदेही से बचने के लिए सभा बुलाने में लगातार देरी की जा रही है।

हालांकि, इन आरोपों पर महानगरपालिका प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन की चुप्पी के चलते विवाद और गहराता जा रहा है।

अब सभी की निगाहें महानगरपालिका के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित टेंडरों की समीक्षा की जाती है या फिर पूरे मामले को नियमानुसार स्टैंडिंग कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

फिलहाल, ₹85 करोड़ के टेंडरों को लेकर उठे इस विवाद ने उल्हासनगर महानगरपालिका की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में प्रशासन का रुख और संभावित निर्णय इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।यदि चाहें, इसे और अधिक खोजी (Investigative) या राष्ट्रीय समाचार पत्र की शैली में भी तैयार किया जा सकता है।














ड्रग्स के खिलाफ डरें नहीं, शिकायत करें": IRS अधिकारी समीर वानखेड़े ने जनता को दिए अहम कानूनी अधिकारों की जानकारी।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

देश में बढ़ते नशे और ड्रग्स के खतरे के बीच IRS अधिकारी समीर वानखेड़े ने आम जनता, अभिभावकों और युवाओं से नशे के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि समाज को नशामुक्त बनाने की लड़ाई केवल पुलिस या सरकारी एजेंसियों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।

समीर वानखेड़े ने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में ड्रग्स या नशीले पदार्थों की बिक्री, तस्करी अथवा सेवन से जुड़ी जानकारी हो, तो लोग बिना किसी डर के संबंधित पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराएं। यदि शिकायत के बावजूद किसी पुलिस थाने का वरिष्ठ अधिकारी कार्रवाई करने में टालमटोल करता है, शिकायत को गंभीरता से नहीं लेता या शिकायतकर्ता को सहयोग देने से बचता है, तो ऐसे अधिकारियों के खिलाफ भी नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

उन्होंने अभिभावकों से विशेष रूप से अपील करते हुए कहा कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर सतर्क नजर रखें, उनके मित्रों और दिनचर्या के बारे में जानकारी रखें तथा किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि दिखाई देने पर तुरंत संबंधित एजेंसियों को सूचित करें। समय रहते उठाया गया एक कदम किसी युवा का भविष्य बचा सकता है।

समीर वानखेड़े ने कहा कि ड्रग्स केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को बर्बाद कर देता है। इसलिए इस सामाजिक बुराई के खिलाफ हर नागरिक को निर्भीक होकर आगे आना होगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे नशे के कारोबारियों के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाएं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों का सहयोग करें, ताकि युवाओं को इस दलदल से बचाया जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि समाज और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से ही नशे के नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। यदि नागरिक जागरूक होकर अपनी जिम्मेदारी निभाएं, तो देश को नशामुक्त बनाने के अभियान को नई मजबूती मिलेगी। वानखेड़े ने सभी नागरिकों से इस जनजागरूकता अभियान का हिस्सा बनने और नशे के खिलाफ चल रही लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।














उल्हासनगर के अवैध डंपिंग ग्राउंड पर आखिर किसके आदेश से लगीं पानी की टंकियां? आग बुझाने में हो रहा पीने के पानी का इस्तेमाल, कई गंभीर सवाल खड़े।





उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के डंपिंग ग्राउंड को लेकर एक और गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि डंपिंग ग्राउंड में समय-समय पर लगने वाली आग बुझाने के लिए पीने योग्य पानी का उपयोग किया जा रहा है। इतना ही नहीं, वहां लगाई गई पानी की टंकियों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये टंकियां किसके आदेश पर लगाई गईं और क्या इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक अनुमति ली गई थी?

इस मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब जलापूर्ति विभाग के कार्यकारी अभियंता अशोक घुले ने इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए स्वीकार किया कि डंपिंग ग्राउंड पर पानी की टंकियां लगाने के लिए महानगरपालिका के स्वास्थ्य विभाग की ओर से लिखित पत्र जारी किया गया था।

यह जानकारी उन्होंने नगरसेवक प्रधान पाटील, राजू गोपलानी और विपुल मयेकर के साथ हुई चर्चा के दौरान दी। इस खुलासे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि स्वास्थ्य विभाग ने लिखित रूप से टंकियां लगाने की अनुमति या निर्देश दिए थे, तो क्या पूरी प्रक्रिया नियमानुसार अपनाई गई थी? साथ ही, क्या पीने योग्य पानी का उपयोग डंपिंग ग्राउंड में आग बुझाने के लिए करना उचित और वैध है?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शहर में कई क्षेत्रों में पहले से ही पानी की कमी बनी रहती है। ऐसे में यदि पीने योग्य पानी का इस्तेमाल डंपिंग ग्राउंड की आग बुझाने में किया जा रहा है, तो यह संसाधनों के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है। लोगों का यह भी कहना है कि डंपिंग ग्राउंड में बार-बार आग लगने की घटनाओं पर स्थायी समाधान खोजने के बजाय केवल पानी डालकर स्थिति संभालने की कोशिश की जा रही है।

इस पूरे प्रकरण में अब कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं—

डंपिंग ग्राउंड पर पानी की टंकियां किसकी अनुमति से लगाई गईं?

क्या इन्हें लगाने के लिए सभी आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया?

आग बुझाने के लिए पीने योग्य पानी का उपयोग किसके निर्देश पर किया जा रहा है?

यदि स्वास्थ्य विभाग ने पत्र जारी किया था, तो उसकी शर्तें और उद्देश्य क्या थे?

इस पूरे मामले की जवाबदेही आखिर किसकी तय होगी?

बर्बाद किए गए पानी की भरपाई आखिर कौन करेगा?"

अब देखना होगा कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाती है। फिलहाल, इस खुलासे ने महानगरपालिका की कार्यप्रणाली और डंपिंग ग्राउंड के प्रबंधन पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रहार संगठन के शरद पोळके ने कई अहम सवाल उठाए हैं, लेकिन अब तक उनका कोई जवाब नहीं दिया गया है।
























TDCC बैंक चुनाव में भाजपा विधायक किशन कथोरे का जलवा बरकरार, सहकार पैनल ने प्रचंड जीत के साथ लहराया परचम।


ठाणे: दिनेश मीरचंदानी

ठाणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (TDCC Bank) के चुनाव में भाजपा विधायक किशन कथोरे के नेतृत्व वाले सहकार पैनल ने शानदार जीत हासिल कर एक बार फिर अपने मजबूत जनाधार और प्रभाव का परिचय दिया है। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सहकारी क्षेत्र में विधायक किशन कथोरे की पकड़ पहले की तरह मजबूत बनी हुई है।

सहकार पैनल की इस बड़ी जीत के साथ बैंक की राजनीति में उसका वर्चस्व और अधिक मजबूत हो गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह परिणाम विधायक किशन कथोरे की संगठनात्मक क्षमता, कार्यकर्ताओं के साथ मजबूत तालमेल और सहकारी क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका का प्रतिफल है।

परिणाम घोषित होते ही समर्थकों और कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल बन गया। कई स्थानों पर मिठाइयां बांटी गईं, ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच जीत का जश्न मनाया गया और विजयी उम्मीदवारों का भव्य स्वागत किया गया। समर्थकों ने इसे सहकार, विकास और मजबूत नेतृत्व की जीत बताया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, TDCC बैंक चुनाव के नतीजे केवल बैंक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर आने वाले समय में ठाणे जिले की राजनीतिक और सहकारी गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है। इस जीत को विधायक किशन कथोरे के बढ़ते प्रभाव और मजबूत जनसमर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

जीत के बाद विधायक किशन कथोरे ने सभी विजयी उम्मीदवारों, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता सहकार क्षेत्र से जुड़े प्रत्येक सदस्य के विश्वास और सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि नई टीम किसानों, खाताधारकों और सहकारी संस्थाओं के हितों की रक्षा करते हुए बैंक को और अधिक मजबूत, आधुनिक तथा पारदर्शी बनाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेगी।

उन्होंने भरोसा जताया कि बैंक की वित्तीय स्थिति को और सुदृढ़ करने, आधुनिक बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करने तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के खाताधारकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में नई टीम प्रभावी कदम उठाएगी।

सहकार पैनल की इस ऐतिहासिक जीत को ठाणे जिले की सहकारी राजनीति में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा विधायक किशन कथोरे के निरंतर बढ़ते प्रभाव और मजबूत नेतृत्व का प्रमाण माना जा रहा है, जिसने एक बार फिर विरोधियों को स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है।














उल्हासनगर-5 की प्रतिष्ठित ट्रस्ट पर करोड़ों की संपत्ति में कथित घोटाले का साया, पुणे की बहुमूल्य जमीन कौड़ियों के भाव बेचने के आरोप; फर्जी हस्ताक्षरों से सौदे की भी चर्चा।


(फाइल इमेज)

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित एक प्रतिष्ठित ट्रस्ट इन दिनों गंभीर विवादों के घेरे में है। ट्रस्ट की पुणे स्थित बहुमूल्य जमीन को कथित तौर पर बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत पर बेचने की चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों और स्थानीय नागरिकों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति का सौदा पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया, जिससे ट्रस्ट को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा।

सूत्रों के अनुसार, इस कथित सौदे में ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों, ट्रस्टियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जमीन के दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा दिखाया गया। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो मामला ट्रस्ट प्रशासन में गंभीर अनियमितताओं और धोखाधड़ी का रूप ले सकता है।

बताया जा रहा है कि ट्रस्ट की संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कुछ लोगों का दावा है कि वर्षों से ट्रस्ट की संपत्तियों और वित्तीय मामलों में कथित अनियमितताएं होती रही हैं, लेकिन अब पुणे की जमीन के सौदे ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इससे ट्रस्ट के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां जल्द ही सार्वजनिक हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो ट्रस्ट के कई वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच के दायरे में आने की संभावना है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे ट्रस्ट के अंदरूनी कामकाज पर नया विवाद खड़ा हो सकता है।

हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित ट्रस्ट या आरोपों के घेरे में आए किसी भी व्यक्ति की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि भविष्य में उनका पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।














मुंबई के गोरेगांव नेस्को ड्रग्स केस में बड़ा मोड़: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से जल्द मिल सकते हैं IRS अधिकारी समीर वानखेड़े, आरोपियों पर मकोका लगाने की करेंगे मांग।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

मुंबई के बहुचर्चित गोरेगांव स्थित नेस्को ड्रग्स मामले में जल्द ही बड़ा घटनाक्रम सामने आ सकता है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, IRS अधिकारी समीर वानखेड़े महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर मामले की गंभीरता से अवगत कराने के साथ-साथ आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत कार्रवाई करने का आग्रह कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि वानखेड़े का मानना है कि यदि जांच में यह स्पष्ट होता है कि ड्रग्स तस्करी किसी संगठित गिरोह या आपराधिक नेटवर्क के माध्यम से संचालित की जा रही थी, तो केवल सामान्य कानूनी धाराएं पर्याप्त नहीं होंगी। ऐसे में मकोका के तहत कार्रवाई से पूरे नेटवर्क की आर्थिक और आपराधिक गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा तथा मामले में शामिल सभी लोगों तक जांच का दायरा बढ़ाया जा सकेगा।

बताया जा रहा है कि प्रस्तावित मुलाकात के दौरान नेस्को ड्रग्स केस की जांच की वर्तमान स्थिति, ड्रग्स सिंडिकेट की कार्यप्रणाली, अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की संभावना तथा आगे की कानूनी रणनीति जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।

हालांकि, इस संभावित मुलाकात को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और समीर वानखेड़े की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन यदि यह बैठक होती है और मकोका लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो इसे महाराष्ट्र में संगठित ड्रग्स अपराध के खिलाफ सरकार के कड़े रुख के रूप में देखा जाएगा।

यह मामला पहले से ही काफी चर्चा में है और अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में सरकार और जांच एजेंसियां इस दिशा में क्या निर्णय लेती हैं।













उल्हासनगर के ऐतिहासिक स्विमिंग पूल पर बड़ा विवाद: तय शुल्क ₹51 प्रति घंटा, वसूले जा रहे ₹245? लीज, अतिक्रमण और अनुबंध पर उठे कई गंभीर सवाल।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) की स्वामित्व वाली ऐतिहासिक सार्वजनिक स्विमिंग पूल संपत्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों, समझौते (Agreement), पत्राचार और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया जा रहा है कि स्विमिंग शुल्क, अनुबंध की शर्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, कथित अतिक्रमण तथा लीज संबंधी कई मामलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।

समझौते के अनुसार कितना होना चाहिए स्विमिंग शुल्क?

समझौते के अनुसार वर्ष 2003 में स्विमिंग शुल्क ₹10 प्रति घंटा निर्धारित किया गया था। अनुबंध की शर्तों में यह भी उल्लेख है कि प्रत्येक 5 वर्ष में अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही शुल्क वृद्धि की जा सकती है।

इसी आधार पर शुल्क की गणना इस प्रकार बनती है—

2003 से 2008: ₹10 प्रति घंटा

2008 से 2013: ₹15 प्रति घंटा

2013 से 2018: ₹22.50 प्रति घंटा

2018 से 2023: ₹33.75 प्रति घंटा

2023 से 2028: ₹51 प्रति घंटा

इस गणना के अनुसार वर्तमान अवधि में अधिकतम वैध शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए।

फिर ₹245 प्रति घंटा कैसे वसूला जा रहा है?

आरोप है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब प्रा. लि. द्वारा उल्हासनगर तथा आसपास के नागरिकों से ₹245 प्रति घंटा स्विमिंग शुल्क लिया जा रहा है।

इस संबंध में क्लब के संचालक आसान बालानी द्वारा UMC को दिया गया एक पत्र भी सामने आया है। इस पत्र में दावा किया गया है कि क्लब ₹245 प्रति घंटा शुल्क लेने का पात्र है, हालांकि कम प्रतिसाद (Low Response) और लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से फिलहाल ₹200 प्रति घंटा शुल्क लिया जा रहा है।

शुल्क निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल

दस्तावेजों का अध्ययन करने वाले लोगों का दावा है कि ₹245 प्रति घंटा शुल्क का औचित्य प्रस्तुत करने में कई विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।

आरोपों के अनुसार—

जहाँ समझौते के अनुसार वर्तमान शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए, वहीं पत्र में इसे ₹102 प्रति घंटा दर्शाया गया है।

अनुबंध में लॉकर शुल्क ₹100 प्रति वर्ष निर्धारित है, लेकिन उसे भी शुल्क निर्धारण में अलग तरीके से जोड़कर अधिक राशि दर्शाने का प्रयास किया गया है।

अनुबंध की शर्तों के अनुसार लाइफगार्ड और फर्स्ट एड उपलब्ध कराना ठेकेदार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसके लिए नागरिकों से अलग से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

इन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि महानगरपालिका के समक्ष प्रस्तुत किया गया शुल्क संबंधी स्पष्टीकरण वास्तविक अनुबंध शर्तों से मेल नहीं खाता।

स्विमिंग पूल के सूचना बोर्ड पर भी उठे सवाल

स्विमिंग पूल परिसर में लगे सूचना बोर्ड और उपलब्ध वीडियो के आधार पर भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

बोर्ड के अनुसार—

पुरुषों के लिए केवल 2 घंटे का समय निर्धारित है।

महिलाओं के लिए भी केवल 2 घंटे का समय उपलब्ध है।

बच्चों के लिए कोई स्पष्ट समय-सारणी प्रदर्शित नहीं की गई है।

विजिटर्स से ₹200 प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

प्रत्येक बार एक घंटे की स्विमिंग के लिए डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाना अनिवार्य बताया गया है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्विमिंग स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक गतिविधि है और महानगरपालिका की सार्वजनिक संपत्ति होने के कारण यह सुविधा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक आम जनता के लिए पर्याप्त समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व वाली संपत्ति

यह केवल एक स्विमिंग पूल नहीं, बल्कि उल्हासनगर के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है। बताया जाता है कि 8 अगस्त 1949 को इसी स्थान पर उल्हासनगर शहर की आधारशिला रखी गई थी। ऐसे ऐतिहासिक स्थल के उपयोग और प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।

अतिरिक्त भूमि और कथित अतिक्रमण का मामला

आरोप है कि वर्ष 2014 में महानगरपालिका ने स्विमिंग पूल के पीछे 512 वर्गमीटर अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई थी।

इसके बावजूद यह भी आरोप लगाया गया है कि—

महानगरपालिका के दो कार्यालयों पर बिना अनुमति कब्जा कर वहाँ स्विमिंग पूल का काउंटर बनाया गया।

स्विमिंग पूल के समीप स्थित पुराने ऑक्ट्रॉय नाके की भूमि पर भी कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया।

यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर मामला माना जा सकता है।

कोरोना काल में किराया माफी और अनुबंध विस्तार पर भी सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार महानगरपालिका ने कोरोना काल के दौरान क्लब को दो वर्षों का किराया माफ किया तथा दो वर्षों का अनुबंध विस्तार भी प्रदान किया।

अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि—

क्या महानगरपालिका को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार था?

क्या इसके लिए राज्य शासन की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी?

यदि शासन की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई थी?

2055 तक लीज देने का दावा, जबकि अनुबंध 2044 तक?

सबसे गंभीर प्रश्न 25 सितंबर 2025 को किए गए एक कथित लीज समझौते को लेकर उठाया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब ने महानगरपालिका की इस संपत्ति को सिंघानिया स्कूल को 30 वर्षों के लिए, अर्थात 25 सितंबर 2055 तक, लीज पर देने का समझौता किया।

यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है।

यदि महानगरपालिका के साथ क्लब का अनुबंध केवल वर्ष 2044 तक ही प्रभावी है, तो फिर वह उसी संपत्ति को 2055 तक किसी तीसरे पक्ष को लीज पर कैसे दे सकता है?

क्या इसके लिए महानगरपालिका की अनुमति ली गई थी? यदि ली गई थी, तो किस नियम के तहत? और यदि नहीं, तो ऐसे समझौते की वैधानिक स्थिति क्या होगी?

अब उठ रही है निष्पक्ष जांच की मांग

इन सभी आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद नागरिकों द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। मांग की जा रही है कि स्विमिंग शुल्क निर्धारण, अनुबंध की शर्तों, कथित अतिक्रमण, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, किराया माफी, अनुबंध विस्तार तथा कथित लीज समझौते की विस्तृत जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।