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'गोल मैदान' क्रिकेट प्रोजेक्ट पर विवाद गहराया, सामाजिक कार्यकर्ता मनोज साधवानी ने ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए वर्क ऑर्डर रद्द करने, भुगतान रोकने और ब्लैकलिस्ट करने की मांग की।


 









उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) के अंतर्गत 'गोल मैदान' में क्रिकेट मैदान के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज साधवानी ने महानगरपालिका आयुक्त को विस्तृत शिकायत-पत्र सौंपकर संबंधित वर्क ऑर्डर को तत्काल रद्द करने, ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने तथा करोड़ों रुपये के कथित भुगतान पर रोक लगाने की मांग की है।

शिकायत के अनुसार, वर्क ऑर्डर क्रमांक UMC/PWD/EE/2022-23/230 दिनांक 21 जुलाई 2022 को जारी किया गया था। पत्र में दावा किया गया है कि इस परियोजना के लिए निधि पैनल क्रमांक 5 की पूर्व नगरसेविका गीता साधवानी के प्रयासों से स्वीकृत हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि ठेकेदार ने वर्क ऑर्डर और निविदा की शर्तों का पालन नहीं किया तथा निर्धारित छह माह की अवधि समाप्त होने के बाद भी परियोजना का 5 प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं किया।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि मौके पर जो कार्य किया गया है, वह अत्यंत निम्न गुणवत्ता का है और उसे स्वीकृत एस्टिमेट तथा तकनीकी ड्रॉइंग के अनुरूप नहीं किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि इससे परियोजना की गुणवत्ता और सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

शिकायत-पत्र में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि संबंधित ठेकेदार मेसर्स जय भारत कंस्ट्रक्शन्स ने 26 मई 2026 को लगभग ₹1,00,08,652.94 का बिल प्रस्तुत किया, जिसे 13 जुलाई 2026 को भुगतान के लिए लेखा विभाग भेज दिया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि वास्तविकता में इस मूल्य का कार्य स्थल पर नहीं हुआ है और इसलिए प्रस्तुत बिल पूरी तरह फर्जी एवं बनावटी है।

पत्र में आगे आरोप लगाया गया है कि यह कथित बिल मेसर्स अनिरुद्ध नखावा तथा उल्हासनगर महानगरपालिका के लोक निर्माण विभाग (PWD) के कुछ अभियंताओं और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से तैयार किया गया। शिकायतकर्ता ने इन आरोपों की निष्पक्ष और विस्तृत जांच कराने की मांग भी की है।

मनोज साधवानी ने आयुक्त से मांग की है कि संबंधित वर्क ऑर्डर को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए, ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाए तथा मुख्य लेखा अधिकारी को निर्देश दिए जाएं कि विस्तृत जांच पूरी होने तक किसी भी बिल का भुगतान न किया जाए। उनका कहना है कि यदि जांच से पहले भुगतान किया गया तो इससे सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंच सकता है और इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों पर होगी।

शिकायत-पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि जांच पूरी किए बिना भुगतान किया गया तो वे इस मामले को माननीय मुंबई उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उठाएंगे।

शिकायत के साथ कथित तौर पर कार्यस्थल के फोटोग्राफ भी संलग्न किए गए हैं, जिन्हें शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों के समर्थन में प्रस्तुत किया है। शिकायत की प्रतिलिपि नगर विकास विभाग, मंत्रालय, जिलाधिकारी ठाणे, उल्हासनगर के महापौर, उप-आयुक्त (मुख्यालय) तथा मुख्य लेखा अधिकारी को भी भेजी गई है।

अब इस पूरे मामले में निगाहें उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए प्रशासन क्या कदम उठाता है और संबंधित वर्क ऑर्डर तथा भुगतान प्रक्रिया पर क्या निर्णय लिया जाता है।

(नोट: यह समाचार शिकायत-पत्र में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित पक्ष का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)यदि चाहें, मैं इसे और अधिक अखबार की खोजी (Investigative) शैली या ब्रेकिंग न्यूज़ शैली में भी तैयार कर सकता हूँ।
















UMC के PWD विभाग में डेप्युटी इंजीनियर संदीप जाधव और कर्मचारी दीप्ति लाडे की बदली को लेकर नागरिकों ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से पूछा— आखिर उनका तबादला कब होगा?


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) के लोक निर्माण विभाग (PWD) में वर्षों से कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर एक बार फिर शहर में चर्चा तेज हो गई है। नागरिकों ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से सवाल किया है कि PWD विभाग में डेप्युटी इंजीनियर संदीप जाधव और कर्मचारी दीप्ति लाडे का स्थानांतरण आखिर अब तक क्यों नहीं किया गया और उनकी बदली कब होगी?

स्थानीय नागरिकों का दावा है कि दोनों पिछले 20 से अधिक वर्षों से इसी विभाग में कार्यरत हैं। इसे लेकर लोगों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही विभाग में पदस्थ रहने से प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनका मानना है कि समय-समय पर स्थानांतरण होने से प्रशासनिक व्यवस्था अधिक प्रभावी और निष्पक्ष बनी रहती है।

नागरिकों का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार के स्थानांतरण संबंधी प्रचलित सरकारी आदेश (GR) के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को तीन वर्ष से अधिक एक ही विभाग या पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद उसका स्थानांतरण किया जाना अपेक्षित होता है, ताकि प्रशासनिक संतुलन और कार्यप्रणाली की पारदर्शिता बनी रहे।

इसी आधार पर शहर के लोगों का सवाल है कि यदि यह नीति अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर लागू होती है, तो PWD विभाग में कार्यरत इन दोनों कर्मचारियों के मामले में अब तक इसका पालन क्यों नहीं किया गया। नागरिकों का कहना है कि यदि किसी विशेष प्रशासनिक कारण से उनका स्थानांतरण नहीं किया गया है, तो इसकी जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए, जिससे किसी प्रकार की भ्रम या चर्चा की स्थिति समाप्त हो सके।

शहर के कई नागरिकों का मानना है कि स्थानांतरण नीति का उद्देश्य केवल कर्मचारियों का तबादला करना नहीं, बल्कि प्रशासन में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है। ऐसे में किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के लंबे समय तक एक ही विभाग में बने रहने पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठना लाज़िमी है।

नागरिकों ने आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि इस पूरे मामले पर स्पष्ट रुख अपनाया जाए और यह बताया जाए कि संदीप जाधव एवं दीप्ति लाडे की बदली अब तक क्यों नहीं हुई। साथ ही, यदि स्थानांतरण संबंधी नियम लागू होते हैं, तो उनके अनुरूप आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

अब देखना यह होगा कि उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन इस मामले पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या स्थानांतरण नीति के अनुरूप आगे कोई कार्रवाई की जाती है। फिलहाल, यह मुद्दा शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और नागरिक प्रशासन के जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

















उल्हासनगर महानगरपालिका मुख्यालय बना 'खतरे की इमारत'! 50 साल पुरानी जर्जर बिल्डिंग में रोजाना मेयर, 78 पार्षद और 1,000 अधिकारी-कर्मचारियों की जान जोखिम में।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) का करीब 50 वर्ष पुराना मुख्यालय अब गंभीर रूप से जर्जर और असुरक्षित स्थिति में पहुंच चुका है। इमारत की खराब हालत ने न केवल जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यहां रोजाना आने वाले हजारों नागरिकों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

उल्हासनगर महानगरपालिका मुख्यालय में प्रतिदिन शहर के मेयर, 78 पार्षद, लगभग 1,000 अधिकारी-कर्मचारी और बड़ी संख्या में नागरिक अपने विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए पहुंचते हैं। लेकिन भवन की लगातार बिगड़ती स्थिति के कारण किसी भी समय बड़ा हादसा होने की आशंका जताई जा रही है। कई स्थानों पर दीवारों में दरारें, छत और प्लास्टर के टूटने जैसी समस्याएं भवन की जर्जर हालत को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।

सूत्रों के अनुसार, इमारत की स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने नई  उल्हासनगर महानगर पालिका इमारत के निर्माण की प्रक्रिया को गति देने के साथ-साथ मुख्यालय को अस्थायी रूप से किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की तैयारियां भी तेज कर दी हैं। इसका उद्देश्य कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिस भवन से पूरे शहर का प्रशासन संचालित होता है, वही अब सुरक्षा के लिहाज से सबसे बड़ा चिंता का विषय बन गया है। उनका मानना है कि किसी संभावित दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय प्रशासन को तत्काल प्रभाव से आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

अब सभी की उल्हासनगर महानजर पालिका प्रशासन के अगले फैसले पर टिकी है कि नई इमारत का निर्माण और कार्यालय का स्थानांतरण कितनी तेजी से पूरा किया जाता है, ताकि भविष्य में किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।
















उल्हासनगर मनपा के अधिकारी गणेश शिंपी के खिलाफ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को शिकायत। राष्ट्र कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश राममूर्ति तिवारी ने कार्यप्रणाली, कथित भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों की SIT/ACB/ED से स्वतंत्र जांच की मांग की।


 



उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के एक वरिष्ठ अधिकारी को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक नया विवाद सामने आया है। राष्ट्र कल्याण पार्टी के अध्यक्ष शैलेश राममूर्ति तिवारी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक विस्तृत शिकायत पत्र भेजकर उल्हासनगर महानगरपालिका के अधिकारी गणेश अरविंद शिंपी के विरुद्ध लगाए गए विभिन्न कथित आरोपों की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।

3 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री को भेजे गए इस ज्ञापन में कहा गया है कि संबंधित अधिकारी की कार्यप्रणाली, संवेदनशील पदों पर उनकी नियुक्तियां, कथित प्रशासनिक अनियमितताएं, कथित भ्रष्टाचार, कथित आय से अधिक संपत्ति तथा अन्य संबंधित मामलों की जांच विशेष जांच दल (SIT) अथवा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी सक्षम एजेंसियों से कराई जाए।

ज्ञापन में दावा किया गया है कि संबंधित अधिकारी के विरुद्ध नागरिकों की ओर से समय-समय पर विभिन्न प्रकार की गंभीर शिकायतें और आरोप सामने आते रहे हैं। साथ ही, यह भी उल्लेख किया गया है कि उनके विरुद्ध जांच या कार्रवाई लंबित होने की चर्चाएं विभिन्न स्तरों पर होती रही हैं। ऐसे में, शिकायतकर्ता का कहना है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारी के पास महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रशासनिक जिम्मेदारियां बने रहने से प्रशासन की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि यदि आरोपों में कोई सच्चाई हो तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित हो सके और यदि आरोप निराधार हों तो संबंधित अधिकारी को भी स्पष्ट रूप से न्याय मिल सके।

यह मामला अब प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, इस शिकायत में लगाए गए सभी आरोप शिकायतकर्ता के दावे हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि या किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा सत्यापन होना अभी शेष है। संबंधित अधिकारी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में जांच के निष्कर्ष आने तक इन आरोपों को सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।

















उल्हासनगर मनपा के पीडब्ल्यूडी विभाग में कथित फर्जी बिलों का मामला गरमाया, 'शंकर' और डिप्टी इंजीनियर संदीप जाधव की भूमिका पर उठे सवाल; कनेक्शन की निष्पक्ष जांच की मांग तेज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में कथित फर्जी बिल घोटाले को लेकर नए आरोप सामने आए हैं। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे कथित प्रकरण में 'शंकर' नामक एक व्यक्ति की भूमिका अहम बताई जा रही है। दावा किया जा रहा है कि उक्त व्यक्ति लंबे समय से पीडब्ल्यूडी विभाग में कथित फर्जी बिल तैयार कराने और उनसे जुड़े कार्यों में सक्रिय रहा है। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

सूत्रों का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए, तो कई महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा हो सकता है। विशेष रूप से पीडब्ल्यूडी विभाग के डिप्टी इंजीनियर संदीप जाधव और शंकर नामक व्यक्ति की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) की जांच किए जाने की मांग उठ रही है। आरोप है कि दोनों के बीच हुई बातचीत और संपर्कों की जांच से कथित फर्जी बिलों के पूरे नेटवर्क की जानकारी सामने आ सकती है।

इतना ही नहीं, सूत्रों का यह भी दावा है कि शंकर नामक व्यक्ति के कार्यालय और निवास स्थान पर कथित फर्जी बिलों, भुगतान संबंधी दस्तावेजों तथा अन्य महत्वपूर्ण रिकॉर्ड मौजूद हो सकते हैं। ऐसे में संबंधित स्थानों की जांच और दस्तावेजों को जब्त कर उनकी फोरेंसिक जांच कराने की मांग भी की जा रही है, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।

सूत्रों के अनुसार, यदि संबंधित व्यक्ति का पीडब्ल्यूडी विभाग में आना-जाना तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया जाए, तो कथित रूप से फर्जी बिल तैयार होने की प्रक्रिया पर भी रोक लग सकती है। इस कारण जांच पूरी होने तक आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाने की भी मांग की जा रही है।

इस कथित घोटाले को लेकर शहर में विभिन्न स्तरों पर चर्चाओं का दौर जारी है। नागरिकों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का गंभीर मामला हो सकता है। इसलिए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

उल्हासनगर की जनता ने महानगरपालिका आयुक्त मनीषा आव्हाले से मांग की है कि इस पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से विस्तृत जांच कराई जाए। साथ ही, यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों एवं अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की कथित अनियमितताओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

नोट: इस समाचार में उल्लिखित सभी आरोप सूत्रों और स्थानीय स्तर पर सामने आए दावों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। संबंधित पक्ष का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।


















अंबरनाथ में शिवसेना की अंदरूनी खींचतान फिर आई सामने, शिवसेना के वरिष्ठ नेता अरविंद वाळेकर ने विधायक डॉ. बालाजी किणीकर पर जमकर निशाना साधा; राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज।


अंबरनाथ: दिनेश मीरचंदानी

अंबरनाथ की राजनीति में शिवसेना (शिंदे गुट) के भीतर बढ़ते मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व नगराध्यक्ष अरविंद वाळेकर ने अपने हालिया बयान में बिना किसी का नाम लिए विधायक डॉ. बालाजी किणीकर के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

अरविंद वाळेकर ने कहा कि अंबरनाथ की जनता आज भी पानी, बिजली, सड़क, सफाई और अन्य मूलभूत नागरिक सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रही है। उनका आरोप है कि जनप्रतिनिधियों का पूरा ध्यान इन समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होने के बजाय राजनीतिक गतिविधियों और शक्ति प्रदर्शन पर अधिक दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि जनता विकास और जवाबदेही चाहती है, लेकिन उसे केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं।

वाळेकर ने अपने बयान में यह भी संकेत दिया कि लंबे समय तक आम नागरिकों की समस्याओं की अनदेखी करने वाले जनप्रतिनिधियों को अब जनता लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि जनता सब कुछ देख रही है और उचित समय आने पर अपना फैसला सुनाएगी।

उनके इस बयान को शिवसेना के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर संगठन के भीतर नेतृत्व और कार्यशैली को लेकर असंतोष धीरे-धीरे खुलकर सामने आ रहा है। पार्टी के नेताओं के सार्वजनिक बयान संगठन के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं।

हालांकि शिवसेना नेतृत्व पहले भी अंबरनाथ में किसी प्रकार की गुटबाजी से इनकार करता रहा है, लेकिन समय-समय पर सामने आने वाले नेताओं के बयानों ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अरविंद वाळेकर के ताजा बयान के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि अंबरनाथ इकाई में सब कुछ सामान्य नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि संगठन के भीतर मतभेदों को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो इसका असर आगामी चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है। फिलहाल वाळेकर के बयान ने अंबरनाथ की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और अब सभी की नजरें शिवसेना नेतृत्व की संभावित प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।


















विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब के कथित बोर्ड रेजोल्यूशन पर नया विवाद, निदेशक तरुण हिरानंदानी ने हस्ताक्षर बताए फर्जी; 29 मार्च 2025 की बैठक के अस्तित्व पर भी उठाए सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब के कथित 29 मार्च 2025 के बोर्ड रेजोल्यूशन को लेकर विवाद और गहरा गया है। क्लब के निदेशक तरुण हिरानंदानी ने एक विस्तृत लिखित बयान जारी करते हुए दावा किया है कि उक्त बोर्ड प्रस्ताव पर उनके नाम से दर्शाए गए हस्ताक्षर उनके नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह से फर्जी (Forged) हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी उस बोर्ड प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए और न ही उसे अपनी स्वीकृति प्रदान की।

तरुण हिरानंदानी ने अपने बयान में स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह 29 मार्च 2025 को कंपनी की किसी भी बोर्ड बैठक के आयोजन से भी पूरी तरह इनकार करते हैं। उनका कहना है कि उनकी जानकारी और विश्वास के अनुसार उस दिन कंपनी की कोई बोर्ड बैठक आयोजित ही नहीं हुई थी। ऐसे में उस बैठक के आधार पर तैयार किए गए किसी भी बोर्ड रेजोल्यूशन की वैधता और प्रामाणिकता स्वतः संदेह के घेरे में आ जाती है।

उन्होंने कहा कि यदि कंपनी यह दावा करती है कि 29 मार्च 2025 को विधिवत बोर्ड बैठक आयोजित हुई थी, तो उसे इस दावे के समर्थन में ठोस और दस्तावेजी साक्ष्य सार्वजनिक करने चाहिए। इसके लिए उन्होंने कंपनी से चार महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत करने की मांग की है।

इनमें सबसे पहले बोर्ड बैठक की कार्यवाही (Minutes of Meeting) की प्रमाणित प्रति, दूसरे यदि उपलब्ध हो तो बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग या वीडियोग्राफी, तीसरे बैठक में उपस्थित निदेशकों और सदस्यों का उपस्थिति रजिस्टर अथवा अन्य कोई दस्तावेज जिससे यह सिद्ध हो सके कि वह स्वयं बैठक में उपस्थित थे, तथा चौथे भवन परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, जिससे यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो सके कि 29 मार्च 2025 को उन्होंने कार्यालय परिसर में प्रवेश किया था और कथित बोर्ड बैठक में भाग लिया था।

तरुण हिरानंदानी ने यह भी कहा कि कंपनी का कार्यालय ऐसे भवन में स्थित है जहाँ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। यदि वास्तव में उस दिन बोर्ड बैठक आयोजित हुई थी और वह उसमें शामिल हुए थे, तो कंपनी के लिए संबंधित सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करना कठिन नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इस पूरे विवाद की सच्चाई सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि यदि कंपनी उपरोक्त में से कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहती है, तो यह स्पष्ट माना जाना चाहिए कि 29 मार्च 2025 को कोई बोर्ड बैठक आयोजित नहीं हुई थी। साथ ही उन्होंने दोहराया कि कथित बोर्ड रेजोल्यूशन पर उनके नाम से किए गए हस्ताक्षर पूरी तरह फर्जी, मनगढ़ंत और धोखाधड़ीपूर्वक उनके ज्ञान एवं सहमति के बिना तैयार किए गए हैं।

तरुण हिरानंदानी ने स्पष्ट किया कि वह उक्त बोर्ड प्रस्ताव की वैधता, प्रामाणिकता और सत्यता को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं तथा भविष्य में इस संबंध में उपलब्ध कानूनी अधिकारों का उपयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

इस मामले में अब सबकी निगाहें कंपनी के आधिकारिक पक्ष पर टिकी हुई हैं। यदि कंपनी बोर्ड बैठक और बोर्ड रेजोल्यूशन की वैधता का दावा करती है, तो उसके समक्ष संबंधित दस्तावेज, उपस्थिति रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण होगा। वहीं, यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इस कथित बोर्ड रेजोल्यूशन को लेकर उठे सवाल और भी गंभीर हो सकते हैं।

नोट: विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब और सिंघानिया स्कूल के बीच हुए कथित समझौते में कई गंभीर अनियमितताओं और सवालों की बात सामने आ रही है। इस पूरे मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और दस्तावेजों का खुलासा हमारे अगले अंक में किया जाएगा।