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उल्हासनगर-5 की प्रतिष्ठित ट्रस्ट पर करोड़ों की संपत्ति में कथित घोटाले का साया, पुणे की बहुमूल्य जमीन कौड़ियों के भाव बेचने के आरोप; फर्जी हस्ताक्षरों से सौदे की भी चर्चा।


(फाइल इमेज)

उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित एक प्रतिष्ठित ट्रस्ट इन दिनों गंभीर विवादों के घेरे में है। ट्रस्ट की पुणे स्थित बहुमूल्य जमीन को कथित तौर पर बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत पर बेचने की चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों और स्थानीय नागरिकों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति का सौदा पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया, जिससे ट्रस्ट को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा।

सूत्रों के अनुसार, इस कथित सौदे में ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों, ट्रस्टियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जमीन के दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा दिखाया गया। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो मामला ट्रस्ट प्रशासन में गंभीर अनियमितताओं और धोखाधड़ी का रूप ले सकता है।

बताया जा रहा है कि ट्रस्ट की संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कुछ लोगों का दावा है कि वर्षों से ट्रस्ट की संपत्तियों और वित्तीय मामलों में कथित अनियमितताएं होती रही हैं, लेकिन अब पुणे की जमीन के सौदे ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इससे ट्रस्ट के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और जानकारियां जल्द ही सार्वजनिक हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो ट्रस्ट के कई वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच के दायरे में आने की संभावना है। बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं, जिससे ट्रस्ट के अंदरूनी कामकाज पर नया विवाद खड़ा हो सकता है।

हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित ट्रस्ट या आरोपों के घेरे में आए किसी भी व्यक्ति की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि भविष्य में उनका पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।














मुंबई के गोरेगांव नेस्को ड्रग्स केस में बड़ा मोड़: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से जल्द मिल सकते हैं IRS अधिकारी समीर वानखेड़े, आरोपियों पर मकोका लगाने की करेंगे मांग।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

मुंबई के बहुचर्चित गोरेगांव स्थित नेस्को ड्रग्स मामले में जल्द ही बड़ा घटनाक्रम सामने आ सकता है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, IRS अधिकारी समीर वानखेड़े महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर मामले की गंभीरता से अवगत कराने के साथ-साथ आरोपियों के खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत कार्रवाई करने का आग्रह कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि वानखेड़े का मानना है कि यदि जांच में यह स्पष्ट होता है कि ड्रग्स तस्करी किसी संगठित गिरोह या आपराधिक नेटवर्क के माध्यम से संचालित की जा रही थी, तो केवल सामान्य कानूनी धाराएं पर्याप्त नहीं होंगी। ऐसे में मकोका के तहत कार्रवाई से पूरे नेटवर्क की आर्थिक और आपराधिक गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा तथा मामले में शामिल सभी लोगों तक जांच का दायरा बढ़ाया जा सकेगा।

बताया जा रहा है कि प्रस्तावित मुलाकात के दौरान नेस्को ड्रग्स केस की जांच की वर्तमान स्थिति, ड्रग्स सिंडिकेट की कार्यप्रणाली, अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की संभावना तथा आगे की कानूनी रणनीति जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।

हालांकि, इस संभावित मुलाकात को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और समीर वानखेड़े की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन यदि यह बैठक होती है और मकोका लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो इसे महाराष्ट्र में संगठित ड्रग्स अपराध के खिलाफ सरकार के कड़े रुख के रूप में देखा जाएगा।

यह मामला पहले से ही काफी चर्चा में है और अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में सरकार और जांच एजेंसियां इस दिशा में क्या निर्णय लेती हैं।













उल्हासनगर के ऐतिहासिक स्विमिंग पूल पर बड़ा विवाद: तय शुल्क ₹51 प्रति घंटा, वसूले जा रहे ₹245? लीज, अतिक्रमण और अनुबंध पर उठे कई गंभीर सवाल।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) की स्वामित्व वाली ऐतिहासिक सार्वजनिक स्विमिंग पूल संपत्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों, समझौते (Agreement), पत्राचार और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया जा रहा है कि स्विमिंग शुल्क, अनुबंध की शर्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, कथित अतिक्रमण तथा लीज संबंधी कई मामलों में नियमों का पालन नहीं किया गया है।

समझौते के अनुसार कितना होना चाहिए स्विमिंग शुल्क?

समझौते के अनुसार वर्ष 2003 में स्विमिंग शुल्क ₹10 प्रति घंटा निर्धारित किया गया था। अनुबंध की शर्तों में यह भी उल्लेख है कि प्रत्येक 5 वर्ष में अधिकतम 50 प्रतिशत तक ही शुल्क वृद्धि की जा सकती है।

इसी आधार पर शुल्क की गणना इस प्रकार बनती है—

2003 से 2008: ₹10 प्रति घंटा

2008 से 2013: ₹15 प्रति घंटा

2013 से 2018: ₹22.50 प्रति घंटा

2018 से 2023: ₹33.75 प्रति घंटा

2023 से 2028: ₹51 प्रति घंटा

इस गणना के अनुसार वर्तमान अवधि में अधिकतम वैध शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए।

फिर ₹245 प्रति घंटा कैसे वसूला जा रहा है?

आरोप है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब प्रा. लि. द्वारा उल्हासनगर तथा आसपास के नागरिकों से ₹245 प्रति घंटा स्विमिंग शुल्क लिया जा रहा है।

इस संबंध में क्लब के संचालक आसान बालानी द्वारा UMC को दिया गया एक पत्र भी सामने आया है। इस पत्र में दावा किया गया है कि क्लब ₹245 प्रति घंटा शुल्क लेने का पात्र है, हालांकि कम प्रतिसाद (Low Response) और लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से फिलहाल ₹200 प्रति घंटा शुल्क लिया जा रहा है।

शुल्क निर्धारण पर उठे गंभीर सवाल

दस्तावेजों का अध्ययन करने वाले लोगों का दावा है कि ₹245 प्रति घंटा शुल्क का औचित्य प्रस्तुत करने में कई विसंगतियाँ दिखाई देती हैं।

आरोपों के अनुसार—

जहाँ समझौते के अनुसार वर्तमान शुल्क ₹51 प्रति घंटा होना चाहिए, वहीं पत्र में इसे ₹102 प्रति घंटा दर्शाया गया है।

अनुबंध में लॉकर शुल्क ₹100 प्रति वर्ष निर्धारित है, लेकिन उसे भी शुल्क निर्धारण में अलग तरीके से जोड़कर अधिक राशि दर्शाने का प्रयास किया गया है।

अनुबंध की शर्तों के अनुसार लाइफगार्ड और फर्स्ट एड उपलब्ध कराना ठेकेदार की अनिवार्य जिम्मेदारी है। इसके लिए नागरिकों से अलग से शुल्क नहीं लिया जा सकता।

इन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि महानगरपालिका के समक्ष प्रस्तुत किया गया शुल्क संबंधी स्पष्टीकरण वास्तविक अनुबंध शर्तों से मेल नहीं खाता।

स्विमिंग पूल के सूचना बोर्ड पर भी उठे सवाल

स्विमिंग पूल परिसर में लगे सूचना बोर्ड और उपलब्ध वीडियो के आधार पर भी कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

बोर्ड के अनुसार—

पुरुषों के लिए केवल 2 घंटे का समय निर्धारित है।

महिलाओं के लिए भी केवल 2 घंटे का समय उपलब्ध है।

बच्चों के लिए कोई स्पष्ट समय-सारणी प्रदर्शित नहीं की गई है।

विजिटर्स से ₹200 प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

प्रत्येक बार एक घंटे की स्विमिंग के लिए डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाना अनिवार्य बताया गया है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्विमिंग स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक गतिविधि है और महानगरपालिका की सार्वजनिक संपत्ति होने के कारण यह सुविधा सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक आम जनता के लिए पर्याप्त समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व वाली संपत्ति

यह केवल एक स्विमिंग पूल नहीं, बल्कि उल्हासनगर के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी है। बताया जाता है कि 8 अगस्त 1949 को इसी स्थान पर उल्हासनगर शहर की आधारशिला रखी गई थी। ऐसे ऐतिहासिक स्थल के उपयोग और प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है।

अतिरिक्त भूमि और कथित अतिक्रमण का मामला

आरोप है कि वर्ष 2014 में महानगरपालिका ने स्विमिंग पूल के पीछे 512 वर्गमीटर अतिरिक्त भूमि उपलब्ध कराई थी।

इसके बावजूद यह भी आरोप लगाया गया है कि—

महानगरपालिका के दो कार्यालयों पर बिना अनुमति कब्जा कर वहाँ स्विमिंग पूल का काउंटर बनाया गया।

स्विमिंग पूल के समीप स्थित पुराने ऑक्ट्रॉय नाके की भूमि पर भी कथित रूप से अवैध कब्जा किया गया।

यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर मामला माना जा सकता है।

कोरोना काल में किराया माफी और अनुबंध विस्तार पर भी सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार महानगरपालिका ने कोरोना काल के दौरान क्लब को दो वर्षों का किराया माफ किया तथा दो वर्षों का अनुबंध विस्तार भी प्रदान किया।

अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि—

क्या महानगरपालिका को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार था?

क्या इसके लिए राज्य शासन की पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी?

यदि शासन की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह प्राप्त की गई थी?

2055 तक लीज देने का दावा, जबकि अनुबंध 2044 तक?

सबसे गंभीर प्रश्न 25 सितंबर 2025 को किए गए एक कथित लीज समझौते को लेकर उठाया जा रहा है।

दावा किया जा रहा है कि विराट अंबे स्पोर्ट्स क्लब ने महानगरपालिका की इस संपत्ति को सिंघानिया स्कूल को 30 वर्षों के लिए, अर्थात 25 सितंबर 2055 तक, लीज पर देने का समझौता किया।

यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है।

यदि महानगरपालिका के साथ क्लब का अनुबंध केवल वर्ष 2044 तक ही प्रभावी है, तो फिर वह उसी संपत्ति को 2055 तक किसी तीसरे पक्ष को लीज पर कैसे दे सकता है?

क्या इसके लिए महानगरपालिका की अनुमति ली गई थी? यदि ली गई थी, तो किस नियम के तहत? और यदि नहीं, तो ऐसे समझौते की वैधानिक स्थिति क्या होगी?

अब उठ रही है निष्पक्ष जांच की मांग

इन सभी आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद नागरिकों द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है। मांग की जा रही है कि स्विमिंग शुल्क निर्धारण, अनुबंध की शर्तों, कथित अतिक्रमण, अतिरिक्त भूमि के उपयोग, किराया माफी, अनुबंध विस्तार तथा कथित लीज समझौते की विस्तृत जांच कराई जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।













विधायक श्रीकांत भारतीय की पहल रंग लाई, महाराष्ट्र में जल्द आएगी स्वतंत्र ई-स्पोर्ट्स नीति।


 

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र में तेजी से उभर रहे ई-स्पोर्ट्स क्षेत्र को लेकर राज्य सरकार जल्द ही एक स्वतंत्र और व्यापक नीति लेकर आएगी। यह महत्वपूर्ण घोषणा आज महाराष्ट्र विधान परिषद में ई-स्पोर्ट्स विषय पर हुई विस्तृत चर्चा के दौरान की गई। इस घोषणा को राज्य के लाखों युवाओं, डिजिटल उद्यमियों और गेमिंग उद्योग से जुड़े पेशेवरों के लिए एक बड़ी पहल माना जा रहा है।

विधान परिषद में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से इस मुद्दे को उठाते हुए विधायक श्रीकांत भारतीय ने कहा कि बदलते डिजिटल दौर में ई-स्पोर्ट्स केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक तेजी से विकसित हो रहा पेशेवर और रोजगारपुरक क्षेत्र बन चुका है। उन्होंने राज्य के युवाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए महाराष्ट्र के लिए एक अलग और स्पष्ट ई-स्पोर्ट्स नीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स में अंतर समझना जरूरी

चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण विषय यह भी रहा कि ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। सदन में स्पष्ट किया गया कि ऑनलाइन गेमिंग मुख्य रूप से व्यक्तिगत मनोरंजन और अवकाश से जुड़ी गतिविधि है, जबकि ई-स्पोर्ट्स एक कौशल आधारित, प्रतिस्पर्धात्मक और संगठित पेशेवर क्षेत्र है, जिसमें खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, रणनीति, टीमवर्क और उच्च स्तरीय प्रतिस्पर्धा के आधार पर अवसर प्राप्त होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ई-स्पोर्ट्स को खेल उद्योग का एक नया आयाम माना जा रहा है, जिसे विश्व स्तर पर तेजी से मान्यता मिल रही है। ऐसे में महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य के लिए इस क्षेत्र को संस्थागत समर्थन देना समय की मांग है।

सरकार बनाएगी विशेषज्ञ समिति

चर्चा का उत्तर देते हुए संबंधित मंत्री ने सदन को जानकारी दी कि आगामी अधिवेशन से पहले महाराष्ट्र सरकार ई-स्पोर्ट्स के लिए एक स्वतंत्र नीति की घोषणा करेगी। इसके लिए विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों और संबंधित क्षेत्र के जानकारों की एक समिति गठित की जाएगी।

यह समिति राज्य में ई-स्पोर्ट्स के विकास, खिलाड़ियों को प्रोत्साहन, प्रशिक्षण सुविधाओं, प्रतियोगिताओं के आयोजन, निवेश आकर्षित करने तथा रोजगार सृजन की संभावनाओं पर विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर अंतिम नीति तैयार की जाएगी।

रोजगार और स्टार्टअप के नए अवसर

ई-स्पोर्ट्स उद्योग केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। इसके साथ अनेक सहायक क्षेत्रों का विकास भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में कंटेंट क्रिएशन, लाइव स्ट्रीमिंग, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, इवेंट मैनेजमेंट, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, गेम एनालिटिक्स, साइकोलॉजिकल काउंसलिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और कानूनी परामर्श जैसी सेवाओं में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकते हैं।

राज्य सरकार की प्रस्तावित नीति से न केवल खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि डिजिटल स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी कंपनियों और युवा उद्यमियों के लिए भी नए रास्ते खुल सकते हैं।

महाराष्ट्र को डिजिटल स्पोर्ट्स हब बनाने की दिशा में कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार सुविचारित नीति लागू करती है तो महाराष्ट्र देश में ई-स्पोर्ट्स और डिजिटल प्रतिस्पर्धी खेलों का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे राज्य में निवेश बढ़ेगा, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के आयोजन का मार्ग प्रशस्त होगा और युवाओं को वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा।

विधायक श्रीकांत भारतीय ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पहल महाराष्ट्र के लाखों युवाओं को नई दिशा देने के साथ-साथ राज्य को डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधुनिक खेल संस्कृति के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का काम करेगी।

राज्य सरकार की इस घोषणा को ई-स्पोर्ट्स उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण नीति-निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत माना जा रहा है, जिस पर अब युवाओं और उद्योग जगत की निगाहें टिकी हुई हैं।













भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी 23 कर्मचारी आज भी सेवा में बरकरार! उल्हासनगर मनपा की जवाबदेही कटघरे में, आयुक्त मनीषा आव्हाले से जनता पूछ रही है सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका (UMC) में प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर में चर्चा का विषय बना एक दावा यह है कि भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ACB) द्वारा विभिन्न मामलों में रंगे हाथों पकड़े गए लगभग 23 कर्मचारी और अधिकारी आज भी महानगरपालिका में कार्यरत हैं। इस मुद्दे ने प्रशासनिक जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारी नीति की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी को ACB ने रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है, तो ऐसे मामलों में विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई समयबद्ध तरीके से होना आवश्यक है। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया लंबित है, जिसके कारण संबंधित अधिकारी-कर्मचारी निर्भय होकर अपने पदों पर कार्य कर रहे हैं।

नागरिकों का सवाल: भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नारा?

शहर के जागरूक नागरिकों का कहना है कि राज्य सरकार और प्रशासन भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात करते हैं, लेकिन यदि रिश्वतखोरी के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी वर्षों तक सेवा में बने रहते हैं, तो इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जाता है।

नागरिकों का सवाल है कि—

ACB द्वारा पकड़े गए कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?

कितने कर्मचारियों को निलंबित किया गया?

कितनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुए?

कितनों पर अंतिम कार्रवाई हुई?

और कितने कर्मचारी आज भी संवेदनशील पदों पर कार्यरत हैं?

प्रशासन की भूमिका पर उठे प्रश्न

इस पूरे मामले में मनपा प्रशासन की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। आलोचकों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कठोर कार्रवाई न होने से कर्मचारियों में जवाबदेही की भावना कमजोर पड़ती है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अंतिम कार्रवाई कानूनन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होती है और प्रत्येक मामले को नियमों के अनुसार देखा जाता है।

सामाजिक संगठनों ने मांगी पारदर्शिता

कई सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि मनपा प्रशासन ACB मामलों से जुड़े सभी कर्मचारियों की स्थिति सार्वजनिक करे। उनका कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में पकड़े गए अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई और उनकी वर्तमान नियुक्ति की स्थिति क्या है।

जनता के बीच चर्चा का विषय बना मामला

शहर में यह मुद्दा सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं का विषय बना हुआ है। नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि यदि भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए कर्मचारी बिना किसी कठोर कार्रवाई के सेवा में बने रहते हैं, तो भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का लक्ष्य कैसे हासिल होगा?

अब निगाहें उल्हासनगर महानगरपालिका प्रशासन और आयुक्त मनीषा आव्हाले पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि ACB के मामलों में फंसे कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है और भविष्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाने वाला है।

(नोट: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रसारित दावों और उठाए गए सवालों पर आधारित है। संबंधित कर्मचारियों अथवा प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)














लखनऊ अग्निकांड के बाद बड़ा सवाल: क्या उल्हासनगर के कोचिंग क्लासेस में भी मंडरा रहा है मौत का खतरा?


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में कई छात्रों की जान चली गई, जबकि दर्जनों छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। आग लगने के बाद भवन में फंसे छात्रों की चीख-पुकार, खिड़कियों और ऊपरी मंजिलों से जान बचाने के लिए छलांग लगाने के दृश्य ने देशभर के अभिभावकों को भयभीत कर दिया।

लखनऊ की इस त्रासदी के बाद अब सवाल उल्हासनगर की ओर भी उठने लगे हैं। शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुके उल्हासनगर में सैकड़ों कोचिंग क्लासेस, ट्यूशन सेंटर, लाइब्रेरी और प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन हजारों विद्यार्थी पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या इन संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं? क्या कोई बड़ा हादसा होने से पहले प्रशासन जागेगा?

संकरी गलियां, भीड़भाड़ वाली इमारतें और सुरक्षा पर सवाल

उल्हासनगर के कई कोचिंग क्लासेस ऐसी बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही सीढ़ी उपलब्ध है। कई जगहों पर पार्किंग क्षेत्र, कॉरिडोर और सीढ़ियां भी अतिक्रमण या सामान से भरी हुई दिखाई देती हैं। यदि ऐसी स्थिति में आग लग जाए या कोई अन्य आपातकालीन घटना हो जाए, तो सैकड़ों छात्रों की सुरक्षित निकासी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आग से अधिक जानें धुएं, घबराहट और भगदड़ के कारण जाती हैं। यदि भवन में पर्याप्त वेंटिलेशन, फायर एग्जिट और आपातकालीन व्यवस्था न हो तो कुछ ही मिनटों में स्थिति भयावह रूप ले सकती है।

फायर NOC है या सिर्फ कागजों में सुरक्षा?

शहर के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल सभी कोचिंग क्लासेस और शिक्षण संस्थानों का विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट कराए। यह जांच की जाए कि:

क्या सभी संस्थानों के पास वैध फायर NOC है?

क्या भवनों में पर्याप्त अग्निशमन यंत्र उपलब्ध हैं?

क्या फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर कार्यरत हैं?

क्या आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की व्यवस्था है?

क्या छात्रों और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है?

क्या अग्निशमन विभाग द्वारा नियमित निरीक्षण किया जाता है?

हजारों अभिभावकों की बढ़ी चिंता

लखनऊ हादसे के बाद उल्हासनगर के अभिभावकों में भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए कोचिंग क्लासेस भेजते हैं, लेकिन यदि सुरक्षा व्यवस्था ही कमजोर हो तो यह किसी बड़े खतरे को न्योता देने जैसा है।

अभिभावकों का मानना है कि जिस तरह स्कूलों के लिए सुरक्षा मानक अनिवार्य हैं, उसी प्रकार कोचिंग संस्थानों के लिए भी कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए और उनके पालन की नियमित निगरानी होनी चाहिए।

प्रशासन के लिए चेतावनी या इंतजार किसी हादसे का?

उल्हासनगर में अब तक किसी बड़े कोचिंग अग्निकांड की घटना सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में लापरवाही अक्सर हादसे के बाद ही उजागर होती है। ऐसे में प्रशासन, उल्हासनगर महानगरपालिका, अग्निशमन विभाग और संबंधित अधिकारियों को समय रहते व्यापक निरीक्षण अभियान चलाकर सुरक्षा मानकों की समीक्षा करनी चाहिए।

बड़ा सवाल

क्या उल्हासनगर में लखनऊ जैसी त्रासदी को रोकने के लिए प्रशासन अभी से सक्रिय होगा, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुलेगी?

लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि शिक्षा संस्थानों में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई भी छोटी चूक बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।














सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल का जनहित अभियान: 29 जून 2026 को निःशुल्क मोतियाबिंद जांच, ऑपरेशन संबंधी परामर्श भी मिलेगा।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

समाज के प्रत्येक वर्ग तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के उद्देश्य से सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल द्वारा 29 जून (सोमवार) को निःशुल्क मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक आयोजित होगा, जिसमें नेत्र रोगों से संबंधित समस्याओं का प्रारंभिक परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा।

हॉस्पिटल प्रशासन के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ मोतियाबिंद की समस्या आम होती जा रही है। समय पर जांच और उपचार न होने पर दृष्टि प्रभावित हो सकती है। इसी उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में अनुभवी नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मनीष मिरानी द्वारा मरीजों की जांच की जाएगी तथा उन्हें उचित उपचार संबंधी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

शिविर के दौरान मरीजों की मोतियाबिंद की प्रारंभिक स्क्रीनिंग की जाएगी, जिससे रोग की स्थिति का पता लगाया जा सके। जिन मरीजों को ऑपरेशन की आवश्यकता होगी, उन्हें आधुनिक तकनीक से उपलब्ध उपचार और ऑपरेशन पैकेज की विस्तृत जानकारी भी दी जाएगी।

सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल ने बताया कि संस्थान हमेशा से गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। अस्पताल में सुरक्षित, आधुनिक और दर्दरहित उपचार पद्धतियों के माध्यम से मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

हॉस्पिटल प्रशासन ने विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दृष्टि संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों से इस निःशुल्क शिविर का लाभ उठाने की अपील की है। अस्पताल का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार से मोतियाबिंद के कारण होने वाली दृष्टि हानि को रोका जा सकता है तथा लोगों को बेहतर और स्वस्थ जीवन प्रदान किया जा सकता है।

संपर्क एवं पंजीकरण

शिविर में भाग लेने के इच्छुक नागरिक पूर्व पंजीकरण अथवा अधिक जानकारी के लिए निम्न नंबर पर संपर्क कर सकते हैं:

डॉ. मनीष मिरानी

📞  8237898959

       8108098576

स्थान: सुरेखा क्रिटिकेयर हॉस्पिटल

टाउन हॉल के पास,

उल्हासनगर-3

"साफ दृष्टि, बेहतर जीवन" के संदेश के साथ आयोजित यह शिविर समाज में नेत्र स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।














उल्हासनगर में ‘अल्टरनेट साइड’ योजना के नाम पर ₹50,000 हज़ार करोड़ के कथित भूमि घोटाले का आरोप, SDO कार्यालय की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर में वैकल्पिक भूखंड (अल्टरनेट साइड) योजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई सामाजिक संगठनों और शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस योजना के तहत वर्षों से बड़े पैमाने पर भूमि संबंधी गड़बड़ियां की गई हैं। आरोप लगाने वालों का दावा है कि इस कथित अनियमितता का आर्थिक दायरा करीब ₹50,000 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।

शिकायतों के अनुसार, कुछ बिल्डरों, प्रभावशाली लोगों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से योजना का लाभ नियमों के विपरीत तरीके से उठाया गया। आरोप है कि एक ही मूल भूखंड के आधार पर बार-बार वैकल्पिक भूखंड हासिल किए गए और उनके हस्तांतरण के जरिए भारी आर्थिक फायदा कमाया गया।

आरोपों का आधार

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में वैकल्पिक भूखंड प्राप्त करने के बाद संबंधित लाभार्थियों ने उन भूखंडों का हस्तांतरण या विक्रय कर दिया, लेकिन बाद में फिर उसी मूल दावे के आधार पर नए भूखंडों की मांग की गई। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर ऐसी मांगों को स्वीकृति भी दी गई।

इसके अलावा यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जिन जमीनों के बदले वैकल्पिक भूखंड दिए गए, उनमें से कई मामलों में मूल भूमि का न तो विधिवत अधिग्रहण किया गया और न ही उस पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित किया गया। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।

निष्पक्ष जांच की मांग

मामले को लेकर अब स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है। शिकायतकर्ताओं ने ACB, CID, SIT या CBI जैसी एजेंसियों से पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सभी दस्तावेजों, मंजूरियों और भूमि अभिलेखों की गहन जांच की जाए, तो कई अहम तथ्य उजागर हो सकते हैं।

फिलहाल संबंधित विभागों या अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

यदि लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला महाराष्ट्र के सबसे बड़े कथित भूमि घोटालों में से एक के रूप में सामने आ सकता है।














उल्हासनगर-५ स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला प्रकरण: कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी, कानूनी हलकों में बढ़ी हलचल!


(फाइल फोटो) 


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित स्वामी शांतिप्रकाश गौशाला से जुड़े कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों के आरोपों ने अब नया मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार, मामले को लेकर कानूनी गतिविधियां तेज हो गई हैं और इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया जा चुका है अथवा जल्द ही याचिका दायर किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

जानकार सूत्रों का दावा है कि गौशाला के संचालन, वित्तीय प्रबंधन, अनुदान राशि के उपयोग, लेखा-जोखा तथा अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में नियमों की अनदेखी तथा वित्तीय पारदर्शिता को लेकर संदेह व्यक्त किया गया है। इन आरोपों की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग भी लगातार जोर पकड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, मामले से संबंधित दस्तावेज, वित्तीय अभिलेख और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी एकत्रित कर कानूनी स्तर पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। यदि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन होता है, तो न्यायालय संबंधित पक्षों से जवाब तलब कर सकता है तथा आरोपों की जांच के लिए सक्षम एजेंसियों को आवश्यक निर्देश भी दे सकता है।

स्थानीय स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। सामाजिक संगठनों, गौसेवा से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा नागरिकों के बीच यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कई लोगों का मानना है कि यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो इससे गौशाला के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू उजागर हो सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर, संबंधित पक्षों की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न्यायालय अथवा किसी जांच एजेंसी द्वारा भी फिलहाल कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण में और भी महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं, जिससे मामले की दिशा और गंभीरता स्पष्ट हो सकेगी। यदि याचिका औपचारिक रूप से दायर होती है, तो यह मामला क्षेत्र की सबसे चर्चित कानूनी और प्रशासनिक बहसों में से एक बन सकता है।

(अस्वीकरण: यह समाचार सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व संबंधित अधिकारियों, न्यायालय अथवा जांच एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा की जानी चाहिए।)














उल्हासनगर मनपा के PWD विभाग में करोड़ों के कथित फर्जी बिलों का खेल, 'शंकर' नामक व्यक्ति पर नेटवर्क संचालित करने का आरोप।


उल्हासनगर | दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर महानगरपालिका के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) में कथित तौर पर करोड़ों रुपये के फर्जी बिलों से जुड़े एक बड़े घोटाले की चर्चा जोर पकड़ रही है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि "शंकर" नाम का एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख संचालक है, जो लंबे समय से कथित रूप से जाली बिलों के माध्यम से सरकारी धन के दुरुपयोग में शामिल रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस मामले में विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ठेकेदारी कार्यों से जुड़े भुगतान के नाम पर फर्जी बिल तैयार किए गए और इसके एवज में कथित रूप से कमीशन का लेन-देन भी हुआ।

कार्यालय और आवास की जांच से हो सकते हैं बड़े खुलासे

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, यदि संबंधित व्यक्ति के कार्यालय और निवास स्थान की गहन एवं निष्पक्ष जांच की जाए, तो कथित फर्जी बिलों, संदिग्ध दस्तावेजों तथा वित्तीय लेन-देन से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं। सूत्रों का यह भी दावा है कि हाल के दिनों में संबंधित व्यक्ति ने अपना कार्यालय दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर लिया है, जिससे मामले को लेकर और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने उठाई जांच की मांग

मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में नाराजगी देखी जा रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

सरकारी धन के उपयोग पर उठे सवाल

इस कथित घोटाले ने महानगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली और सरकारी धन के उपयोग को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह सार्वजनिक धन और जनविश्वास दोनों के साथ गंभीर खिलवाड़ है।

फिलहाल मामले में संबंधित अधिकारियों या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां और प्रशासन इस प्रकरण में क्या कदम उठाते हैं।














महाराष्ट्र में प्रीपेड स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं, महावितरण ने हाईकोर्ट में दी जानकारी।


नागपुर: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र में प्रीपेड इलेक्ट्रिक स्मार्ट मीटरों को लेकर चल रहे विरोध और आशंकाओं के बीच महावितरण (MSEDCL) ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए स्पष्ट किया है कि वर्तमान में राज्य में किसी भी उपभोक्ता के लिए प्रीपेड स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं हैं। कंपनी ने अदालत को बताया कि प्रीपेड मीटर केवल उन्हीं ग्राहकों को उपलब्ध कराए जाएंगे जो स्वयं इसकी मांग करेंगे।

महावितरण के इस बयान को लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्मार्ट मीटरों को लेकर विरोध प्रदर्शन और जनजागरण अभियान चलाए जा रहे हैं।

जनहित याचिका के बाद अदालत में सुनवाई

यह मामला विदर्भ वीज ग्राहक संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से अदालत के समक्ष पहुंचा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रीपेड मीटर लागू करने का निर्णय बिना पर्याप्त अध्ययन और जनहित के व्यापक मूल्यांकन के लिया गया है।

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता ने कहा कि प्रीपेड मीटर व्यवस्था से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। यदि रिचार्ज समाप्त हो जाता है तो बिजली आपूर्ति स्वतः बंद हो सकती है, जिससे आम नागरिकों, वरिष्ठ नागरिकों और ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य के सभी नागरिक डिजिटल भुगतान या ऑनलाइन लेनदेन करने में सक्षम नहीं हैं। बड़ी संख्या में लोगों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा स्मार्ट मीटर व्यवस्था के कारण मीटर रीडिंग लेने और बिजली बिल वितरित करने वाले हजारों कर्मचारियों के रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।

फिलहाल केवल पोस्टपेड स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं

महावितरण ने अदालत को बताया कि वर्तमान में राज्यभर में केवल पोस्टपेड स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। इन मीटरों के माध्यम से उपभोक्ता पहले की तरह बिजली का उपयोग कर बाद में बिल का भुगतान करते हैं।

जानकारी के अनुसार राज्य में ठेकेदार कंपनियों द्वारा अब तक एक करोड़ से अधिक स्मार्ट मीटर स्थापित किए जा चुके हैं। बिजली मीटर तकनीक के विकास की प्रक्रिया में पहले इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक मीटर, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीटर, उसके बाद डिजिटल और कम्युनिकेशन आधारित मीटर लगाए गए और अब स्मार्ट मीटरों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।

उपभोक्ताओं के अधिकारों पर हाईकोर्ट के अहम सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने उपभोक्ताओं के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या किसी उपभोक्ता को स्मार्ट मीटर लगाने से इनकार करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है? क्या स्मार्ट मीटर स्थापित करने से पहले उपभोक्ता की अनुमति लेना अनिवार्य है? क्या ऐसा कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद है?

खंडपीठ ने इन सभी सवालों पर याचिकाकर्ता को आगामी सोमवार तक विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आशंकाओं और निराधार आरोपों के आधार पर किसी योजना का विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता।

राज्यभर में बहस तेज

स्मार्ट मीटरों को लेकर महाराष्ट्र में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। विपक्षी दलों और विभिन्न उपभोक्ता संगठनों ने स्मार्ट मीटर योजना पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार और महावितरण इसे बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं।

अब सभी की नजरें हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां उपभोक्ताओं के अधिकारों, स्मार्ट मीटरों की वैधता और प्रीपेड व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।














उल्हासनगर मनपा और पुलिस के दावों की खुली पोल, फर्जी डॉक्टर अब भी कर रहे इलाज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और दर्जनों शिकायतों के बावजूद अवैध चिकित्सा का कारोबार खुलेआम जारी रहने का मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस में मामले दर्ज होने और महानगरपालिका द्वारा कार्रवाई के दावे किए जाने के बावजूद कई कथित फर्जी डॉक्टर अब भी बिना मान्यता प्राप्त डिग्री और आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता के मरीजों का उपचार कर रहे हैं। इससे नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, शहर में ऐसे कई व्यक्तियों की पहचान की गई थी जो बिना वैध मेडिकल लाइसेंस के क्लीनिक संचालित कर रहे थे। इनमें से कई के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं और कुछ मामलों में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की। इसके बावजूद संबंधित क्लीनिकों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से नागरिकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

26 फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें, फिर भी जारी है प्रैक्टिस

जानकारी के मुताबिक, शहर में करीब 26 कथित फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतें की गई थीं। जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई थीं। आरोप है कि इनमें से कुछ लोग बिना किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा डिग्री के मरीजों को दवाइयां लिख रहे हैं, बीमारियों का उपचार कर रहे हैं और चिकित्सा परामर्श भी दे रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है, जबकि वास्तविकता में कई क्लीनिक आज भी संचालित हो रहे हैं। इससे लोगों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

महानगरपालिका प्रशासन पर उठे सवाल

फर्जी डॉक्टरों के मामले में महानगरपालिका प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर कार्रवाई और निरीक्षण के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।

सामाजिक संगठनों और नागरिकों का आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कठोर कदम उठाए होते, तो लोगों की जान और स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे गंभीर जोखिमों को रोका जा सकता था।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जताई चिंता

चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बिना योग्य डॉक्टरों द्वारा किया जाने वाला उपचार मरीजों के लिए घातक साबित हो सकता है। गलत निदान, अनुचित दवाइयों का उपयोग और आपातकालीन परिस्थितियों में सही चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण मरीजों की जान तक खतरे में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अवैध क्लीनिकों को तत्काल सील कर दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

कड़ी कार्रवाई की मांग

शहर के नागरिकों ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस प्रशासन से मांग की है कि फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाकर सभी अवैध क्लीनिकों की जांच की जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई की जाए जिससे भविष्य में कोई भी व्यक्ति लोगों की जान से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके।

फिलहाल यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है और नागरिक प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर बनाए हुए हैं।














उल्हासनगर शाहाड भूमि विवाद में बड़ा एक्शन: कारोबारी नंद जेठानी समेत चार पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर के चर्चित भूमि विवाद मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। हिल लाइन पुलिस स्टेशन ने विवादित भूमि के सर्वेक्षण और कथित कब्जे से जुड़े मामले में प्रमुख व्यवसायी नंद जेठानी, धीरज जेठानी सहित चार आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के गंभीर आरोपों के तहत मामला दर्ज किया है। इस कार्रवाई के बाद शहर के व्यावसायिक और रियल एस्टेट जगत में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465, 467, 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग), 426 (नुकसान पहुंचाना) और 34 (सामूहिक आपराधिक मंशा) के तहत एफआईआर दर्ज की है।

शिकायतकर्ता ने लगाए गंभीर आरोप

यह मामला उल्हासनगर निवासी और निर्माण व्यवसायी अनिल आहूजा की शिकायत पर दर्ज किया गया है। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने कथित रूप से एक ऐसी पावर ऑफ अटॉर्नी का उपयोग किया, जिसकी वैधता समाप्त हो चुकी थी, और उसी के आधार पर विवादित भूमि का सरकारी सर्वेक्षण कराकर उस पर कब्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया को अंजाम दिया।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस कथित कार्रवाई से न केवल उन्हें आर्थिक और संपत्ति संबंधी नुकसान हुआ, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और प्रक्रियाओं का भी दुरुपयोग किया गया, जिससे शासन को भी हानि पहुंची।

शाहाड स्थित 25 गुंठा भूमि को लेकर विवाद

एफआईआर के अनुसार, विवादित संपत्ति शाहाड गांव, उल्हासनगर स्थित सर्वे नंबर 171/C की लगभग 25 गुंठा भूमि है। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह जमीन उनके परिवार की संपत्ति है।

मामले में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2001 में शिकायतकर्ता के पिता स्वर्गीय श्रीचंद भुलचंद आहूजा और उनके चाचा प्रकाश आहूजा ने भूमि के प्रबंधन संबंधी अधिकार नंद रामचंद जेठानी को पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से प्रदान किए थे।

पावर ऑफ अटॉर्नी की वैधता पर विवाद

शिकायतकर्ता का कहना है कि पावर ऑफ अटॉर्नी देने वाले दोनों व्यक्तियों के निधन के बाद उक्त दस्तावेज स्वतः प्रभावहीन और अवैध हो गया था। इसके बावजूद आरोपियों ने कथित रूप से उसी दस्तावेज का उपयोग करते हुए 21 मार्च 2022 को सिटी सर्वे कार्यालय में भूमि सर्वेक्षण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।

इसके बाद 13 मई 2022 को भूमि का सर्वेक्षण कराया गया और शिकायतकर्ता के अनुसार, इसी प्रक्रिया के माध्यम से संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने का प्रयास किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पूरी कार्रवाई भ्रामक दस्तावेजों और गलत तथ्यों के आधार पर की गई।

चार आरोपियों के खिलाफ मामला

एफआईआर में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है, उनमें:

धीरज जेठानी

नंद जेठानी

जगेश रघुनाथ गायकवाड़

एक अज्ञात व्यक्ति

शामिल हैं।

सरकारी प्रक्रिया के दुरुपयोग की भी जांच

पुलिस सूत्रों के अनुसार, मामले में यह भी जांच की जा रही है कि भूमि सर्वेक्षण और उससे संबंधित राजस्व प्रक्रिया के दौरान किन-किन दस्तावेजों का उपयोग किया गया तथा क्या संबंधित अधिकारियों को सही जानकारी उपलब्ध कराई गई थी या नहीं। जांच के दौरान दस्तावेजों की वैधता, पावर ऑफ अटॉर्नी की कानूनी स्थिति और भूमि स्वामित्व से जुड़े रिकॉर्ड की भी समीक्षा की जाएगी।

पुलिस ने शुरू की विस्तृत जांच

हिल लाइन पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और जांच प्रारंभ कर दी गई है। इस प्रकरण की जांच पुलिस उपनिरीक्षक सुरवाडे कर रहे हैं। पुलिस का कहना है कि सभी दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
















उल्हासनगर-5 के जींस मार्केट में एक कारोबारी संकट की चर्चाएं तेज, सट्टेबाजी में नुकसान और बकाया भुगतान को लेकर उठे सवाल।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर-5 स्थित देश के प्रमुख रेडीमेड एवं जींस व्यापार केंद्रों में से एक जींस मार्केट इन दिनों एक व्यापारी परिवार को लेकर चल रही चर्चाओं के कारण सुर्खियों में है। बाजार के व्यापारिक गलियारों में पिछले कुछ समय से एक प्रमुख जींस व्यापारी और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर विभिन्न प्रकार की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं और दावों की अभी तक किसी भी आधिकारिक स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है।

व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, संबंधित व्यापारी के पुत्र को कथित तौर पर IPL सट्टेबाजी में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में चर्चा है कि इस नुकसान का प्रभाव परिवार के व्यवसाय पर भी पड़ा है, जिसके कारण कारोबारी गतिविधियों और वित्तीय लेन-देन पर दबाव बढ़ गया है।

सूत्रों का कहना है कि डेनिम रोड क्षेत्र के कई कपड़ा व्यापारियों का भुगतान लंबे समय से लंबित बताया जा रहा है। इसी वजह से व्यापारिक समुदाय के बीच संबंधित कारोबारी की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। कुछ व्यापारियों का दावा है कि बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण संबंधित व्यापारी गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है और भविष्य में उसके सामने दिवालियापन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

बाजार में यह चर्चा भी जोरों पर है कि उक्त व्यापारी पहले अपनी दुकान का संचालन "K" अक्षर से शुरू होने वाले एक नाम से करता था और अब उसने उसी अक्षर से शुरू होने वाले नए नाम के साथ व्यापारिक गतिविधियां प्रारंभ की हैं। व्यापारिक हलकों में इसे लेकर भी कई तरह की चर्चाएं और अटकलें लगाई जा रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, संबंधित दुकान दूध नाका रोड और आश्रम रोड के बीच स्थित क्षेत्र में, डिस्को टी के आसपास संचालित होने की चर्चा है। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि अगले महीने रीजेंसी एंटीलिया में आयोजित होने वाले बड़े जींस व्यापार मेले में उक्त कारोबारी नए नाम और नई पहचान के साथ भाग लेने की तैयारी कर रहा है।

"इस पूरे घटनाक्रम के बीच जींस मार्केट के एक अन्य बड़े कारोबारी का नाम भी चर्चा में है। व्यापारिक हलकों में कहा जा रहा है कि उनके नाम की शुरुआत 'के' अक्षर से होती है, हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है"। कुछ व्यापारियों का दावा है कि संबंधित पक्षों के बीच पूर्व में कारोबारी साझेदारी अथवा वित्तीय संबंध रहे हैं। हालांकि, इन संबंधों की प्रकृति और वर्तमान स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। बाजार में इस विषय को लेकर विभिन्न प्रकार की अटकलें और चर्चाएं जारी हैं।

व्यापारिक जानकारों का मानना है कि यदि बाजार में चल रही चर्चाओं में किसी प्रकार की सच्चाई है, तो इसका प्रभाव केवल एक व्यापारी या परिवार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे जींस व्यापार क्षेत्र में विश्वास और लेन-देन की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर कई व्यापारी यह भी कह रहे हैं कि बिना आधिकारिक दस्तावेजों और पुष्ट जानकारी के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

फिलहाल, संबंधित व्यापारी, उसके परिवार अथवा अन्य चर्चित पक्षों की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न ही किसी सरकारी एजेंसी, बैंक अथवा न्यायिक मंच द्वारा दिवालियापन या वित्तीय अनियमितता से जुड़ी कोई पुष्टि की गई है।

अस्वीकरण: यह समाचार व्यापारिक सूत्रों, बाजार में चल रही चर्चाओं और अपुष्ट दावों पर आधारित है। समाचार में उल्लिखित तथ्यों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।














कुंभ 2027 की तैयारियों में बड़ा फैसला: मुख्यमंत्री कार्यालय के OSD रामेश्वर नाईक बने विशेष समन्वयक, संत समाज और प्रशासन के बीच निभाएंगे अहम भूमिका।


 

मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2027 में आयोजित होने वाले विश्व प्रसिद्ध नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय में कार्यरत विशेष कार्य अधिकारी (OSD) रामेश्वर नाईक को कुंभ मेले के लिए विशेष समन्वयक (Coordinator) नियुक्त किया गया है। मुख्यमंत्री की स्वीकृति से जारी इस आदेश को कुंभ मेले की तैयारियों के लिए एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

22 जून 2026 को जारी आदेश में कहा गया है कि कुंभ मेले की सफलता में साधु-संतों, महंतों और विभिन्न अखाड़ों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विशाल धार्मिक आयोजन को सुचारु, सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए संत समाज, अखाड़ों, कुंभमेला प्राधिकरण, स्थानीय प्रशासन तथा राज्य शासन के बीच प्रभावी संवाद और समन्वय बनाए रखना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से रामेश्वर नाईक को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।

संत समाज, अखाड़ों और प्रशासन के बीच बनेंगे प्रमुख कड़ी

सरकारी आदेश के अनुसार रामेश्वर नाईक साधु-संतों, विभिन्न अखाड़ों, कुंभमेला प्राधिकरण और राज्य सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का कार्य करेंगे। कुंभ मेले से जुड़े धार्मिक, प्रशासनिक और व्यवस्थागत विषयों पर समन्वय बनाए रखने के साथ-साथ वे विभिन्न पक्षों की मांगों और सुझावों को संबंधित विभागों तक पहुंचाने तथा उनके समाधान की प्रक्रिया को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

कुंभ मेले जैसे विशाल आयोजन में कई बार धार्मिक परंपराओं, व्यवस्थाओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती होती है। ऐसे में सरकार द्वारा एक समर्पित समन्वयक की नियुक्ति को दूरदर्शी निर्णय माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी हुआ आदेश

मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा जारी आदेश पर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. श्रीकर परदेशी के हस्ताक्षर हैं। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह नियुक्ति मुख्यमंत्री की मंजूरी से की गई है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि राज्य सरकार ने कुंभ 2027 की तैयारियों को प्राथमिकता देते हुए प्रारंभिक स्तर से ही समन्वय तंत्र को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं।

राज्य के शीर्ष अधिकारियों को भेजी गई प्रतिलिपि

इस आदेश की प्रतिलिपि महाराष्ट्र शासन के मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव, दोनों उपमुख्यमंत्रियों के कार्यालयों, नगर विकास विभाग, जलसंपदा विभाग, नासिक विभागीय आयुक्त, नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभमेला प्राधिकरण, नासिक महानगरपालिका, जिलाधिकारी कार्यालय, पुलिस आयुक्त, पुलिस महानिरीक्षक और पुलिस अधीक्षक सहित सभी प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों को भेजी गई है।

इससे स्पष्ट है कि सरकार कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर बहुस्तरीय समन्वय व्यवस्था विकसित करना चाहती है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या व्यवस्थागत बाधा उत्पन्न न हो।

करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना

नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेला देश ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। इस आयोजन में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु, साधु-संत, महंत और अखाड़ों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ऐसे में सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल, आवास और बुनियादी सुविधाओं की व्यापक व्यवस्था करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि धार्मिक संगठनों और प्रशासन के बीच समय रहते प्रभावी संवाद स्थापित हो जाए तो आयोजन को अधिक सुचारु और व्यवस्थित बनाया जा सकता है। रामेश्वर नाईक की नियुक्ति को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा

सरकार के इस फैसले को राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि कुंभ 2027 को लेकर सरकार अब तैयारी के अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है और आने वाले महीनों में बुनियादी ढांचे, सड़क विकास, यातायात प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधाओं से जुड़े कई बड़े निर्णय लिए जा सकते हैं।

कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा रामेश्वर नाईक को कुंभ मेले का समन्वयक नियुक्त किए जाने का निर्णय आगामी नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ 2027 की तैयारियों को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है। सरकार को उम्मीद है कि इस नियुक्ति से संत समाज, अखाड़ों और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा और दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजनों में से एक कुंभ मेला सफलतापूर्वक संपन्न कराया जा सकेगा।















कला भारती के सदस्य अभिषेक कोली भाजपा में शामिल, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प के साथ भव्य कार्यक्रम संपन्न।


 


नवी मुंबई: दिपिका पारकर

राष्ट्रसेवा, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को केंद्र में रखकर मुंबई में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान कला भारती एसोसिएशन के सदस्य अभिषेक कोली ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में औपचारिक रूप से प्रवेश किया। इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण, स्वरोजगार, उद्यमिता विकास और सामाजिक जागरूकता से जुड़े विभिन्न विषयों पर व्यापक मार्गदर्शन दिया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और उद्यमियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का उद्देश्य केवल राजनीतिक विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सशक्त बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस प्रयास करना भी था। इस दौरान महिलाओं को आर्थिक साक्षरता, केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं, GEM पोर्टल, मुद्रा योजना, स्वरोजगार के अवसर, उद्यमिता विकास, स्वास्थ्य एवं पोषण जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई। आयोजकों ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत के निर्माण में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करना ही इस पहल का प्रमुख लक्ष्य है।

इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र सरकार के सांस्कृतिक कार्य मंत्री आशिष शेलार, मुंबई भाजपा अध्यक्ष एवं विधायक अमित साटम, विधान परिषद सदस्य उमा खापरे, मुंबई भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष योजना ठोकले, विधान परिषद सदस्य माधवी नाइक, भाजपा के पदाधिकारी तथा अन्य कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आयोजन में कला भारती एसोसिएशन की संस्थापक एवं अध्यक्ष उषा बाजपेयी के मार्गदर्शन में नगरसेविका स्वप्ना म्हात्रे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांस्कृतिक कार्य मंत्री आशिष शेलार ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा राष्ट्रहित और समाजसेवा की भावना से कार्य करने वाले लोगों का स्वागत करती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश ने विकास और जनकल्याण के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित लोगों के लिए भाजपा एक सशक्त मंच है। उन्होंने कला भारती एसोसिएशन के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि संस्था महिलाओं को सशक्त बनाकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का सराहनीय प्रयास कर रही है।

वहीं, मुंबई की महापौर ऋतु तावड़े ने युवाओं की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए कहा कि भाजपा हमेशा नई पीढ़ी को अवसर देने और उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा से जोड़ने में विश्वास रखती है। उन्होंने अभिषेक कोली के भाजपा में प्रवेश का स्वागत करते हुए कहा कि युवा नेतृत्व समाज और राजनीति दोनों के लिए नई ऊर्जा लेकर आता है। उन्होंने उन्हें जनसंपर्क बढ़ाने, संगठन के साथ मिलकर कार्य करने और जमीनी स्तर पर जनता के बीच अपनी पहचान मजबूत करने का संदेश दिया।

महापौर ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व की भी सराहना करते हुए कहा कि राज्य में युवाओं को अधिक अवसर प्रदान करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेताओं रविंद्र चव्हाण, अमित साटम और चित्रा वाघ के योगदान की भी प्रशंसा की।

कला भारती एसोसिएशन की संस्थापक एवं अध्यक्ष उषा बाजपेयी ने कहा कि महिला सशक्तिकरण केवल एक नारा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की बुनियादी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक अवसर, प्रशिक्षण और उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। उनके अनुसार विकसित भारत के सपने को साकार करने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

भाजपा में शामिल होने के बाद अभिषेक कोली ने कहा कि राष्ट्रसेवा की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भाजपा का दामन थामा है। उन्होंने कहा कि कला भारती एसोसिएशन और भाजपा मिलकर समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर कलाकारों और युवाओं के लिए नए अवसर उपलब्ध कराने का कार्य करेंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संगठन के माध्यम से समाजहित और राष्ट्रहित के कार्यों को और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकेगा।

कार्यक्रम का सबसे प्रेरणादायक आकर्षण “उड़ान” दिव्यांग संगीत समूह (ब्लाइंड ऑर्केस्ट्रा) की प्रस्तुति रही। समूह के कलाकारों ने अपने संगीत और प्रतिभा से उपस्थित लोगों को भावुक और प्रेरित किया। कार्यक्रम में इस समूह का विशेष सम्मान भी किया गया। आयोजकों ने कहा कि यह सम्मान समाज में प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति के महत्व को रेखांकित करने का प्रयास है।

इसके अलावा देश के विभिन्न राज्यों से आए महिला एवं पुरुष उद्यमियों, हस्तशिल्प कलाकारों और समाजसेवियों को भी सम्मानित किया गया। गुजरात, महेश्वर, संभाजीनगर, पुणे सहित विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक कला, हस्तकला और महिला उद्यमिता को मंच प्रदान कर स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया गया।

कार्यक्रम का समापन महिला सशक्तिकरण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रसेवा के संकल्प के साथ हुआ। आयोजकों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार की पहलें समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के साथ-साथ महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।














FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे को मिल सकती है Z+ सुरक्षा, सख्त कार्रवाईयों के बीच सुरक्षा बढ़ाने पर मंथन।


मुंबई: दिनेश मीरचंदानी

महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त एवं वरिष्ठ IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे को Z+ श्रेणी की सुरक्षा दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियां उनकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीरता से विचार कर रही हैं तथा इस संबंध में उच्च स्तर पर चर्चा जारी है।

जानकारी के मुताबिक, हाल के महीनों में तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में FDA ने राज्यभर में गुटखा, तंबाकू, निकोटीनयुक्त पान मसाला और अन्य प्रतिबंधित उत्पादों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया है। कई जिलों में बड़े पैमाने पर छापेमारी, जब्ती और कानूनी कार्रवाई के कारण अवैध कारोबार से जुड़े नेटवर्क पर दबाव बढ़ा है। इसी पृष्ठभूमि में उनकी सुरक्षा को लेकर समीक्षा किए जाने की बात सामने आ रही है।

सूत्रों का कहना है कि विभिन्न एजेंसियों द्वारा प्राप्त इनपुट और सुरक्षा आकलन रिपोर्टों के आधार पर मुंढे की सुरक्षा बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो उन्हें Z+ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की जा सकती है, जो देश में उपलब्ध सबसे उच्च सुरक्षा श्रेणियों में से एक मानी जाती है।

तुकाराम मुंढे अपनी कठोर प्रशासनिक कार्यशैली, पारदर्शिता और नियमों के कड़ाई से पालन के लिए जाने जाते हैं। अपने प्रशासनिक करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए भ्रष्टाचार, अवैध कारोबार और नियमों के उल्लंघन के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। FDA आयुक्त के रूप में भी उन्होंने राज्यभर में कई चर्चित कार्रवाईयों को अंजाम दिया है, जिसके चलते वे लगातार सुर्खियों में रहे हैं।

हाल ही में प्रतिबंधित गुटखा और तंबाकू उत्पादों के खिलाफ कार्रवाई को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए थे। इसके अलावा अवैध कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है। माना जा रहा है कि इसी कारण सुरक्षा एजेंसियां उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं।

हालांकि, Z+ सुरक्षा को लेकर अभी तक राज्य सरकार, गृह विभाग अथवा संबंधित सुरक्षा एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी होने और आवश्यक प्रशासनिक मंजूरी मिलने के बाद अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।

यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो तुकाराम मुंढे उन चुनिंदा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की सूची में शामिल हो जाएंगे जिन्हें विशेष सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। फिलहाल पूरे मामले पर प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है।














उल्हासनगर में सेवा और समर्पण का अनूठा उदाहरण: संपादक शिव कुमार मिश्रा का जन्मदिन सामाजिक सरोकारों के साथ धूमधाम से मनाया गया।


 






उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी उल्हास जनपथ के संपादक शिव कुमार मिश्रा का जन्मदिन सामाजिक सेवा और जनकल्याण के कार्यों के साथ अत्यंत उत्साह एवं भव्यता से मनाया गया। जन्मदिन के अवसर पर उल्हास जनपथ कार्यालय में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और शिव कुमार मिश्रा को शुभकामनाएं एवं बधाइयां दीं।

कार्यक्रम की सबसे विशेष बात यह रही कि जन्मदिन को केवल उत्सव तक सीमित न रखते हुए इसे समाजसेवा से जोड़ा गया। इस अवसर पर आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद विद्यार्थियों को स्कूल बैग, पुस्तकें एवं पेंसिल सेट वितरित किए गए, ताकि उनकी शिक्षा में किसी प्रकार की बाधा न आए और वे बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें।

इसके साथ ही जरूरतमंद महिलाओं को दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुओं से युक्त राशन किट प्रदान की गईं, जबकि वरिष्ठ नागरिकों को मानसून को ध्यान में रखते हुए छतरियां वितरित की गईं। इस पहल की उपस्थित लोगों ने जमकर सराहना की और इसे समाज के प्रति संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

कार्यक्रम का सबसे आकर्षक और भावुक क्षण तब देखने को मिला जब सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत प्रथम एवं द्वितीय कक्षा की बालिकाओं के लिए विशेष लकी ड्रॉ आयोजित किया गया। लकी ड्रॉ के माध्यम से चयनित छात्राओं को साइकिलें भेंट की गईं। इस उपहार से बालिकाओं और उनके अभिभावकों के चेहरे खुशी से खिल उठे। उपस्थित लोगों ने कहा कि इस प्रकार की पहल न केवल बेटियों को प्रोत्साहित करती है, बल्कि शिक्षा के प्रति समाज में सकारात्मक संदेश भी देती है।

कार्यक्रम में मौजूद सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक और विभिन्न क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने शिव कुमार मिश्रा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उनके स्वस्थ, सुखद एवं दीर्घायु जीवन की कामना की। साथ ही समाजहित में लगातार किए जा रहे उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सेवा, सहयोग और मानवता की भावना को मजबूत करते हैं।

जन्मदिन समारोह सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का संदेश देते हुए संपन्न हुआ। उपस्थित लोगों ने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी शिव कुमार मिश्रा इसी तरह समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्गों के लिए प्रेरणादायी कार्य करते रहेंगे।























सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में उत्कृष्ट योगदान के लिए डॉ. सागर प्रकाश घाडगे को मिला प्रतिष्ठित "भारत भूषण सम्मान 2026"


नई दिल्ली: दिनेश मीरचंदानी

देश के सामाजिक, मानवीय और राष्ट्रहित से जुड़े कार्यों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले प्रतिष्ठित समाजसेवी एवं जनहितैषी व्यक्तित्व डॉ. सागर प्रकाश घाडगे को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित "भारत भूषण सम्मान" से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें सामाजिक सुधार, श्रमिक कल्याण, नैतिक सुशासन, राष्ट्र निर्माण, जनसेवा तथा मानव एवं पशु कल्याण के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय और प्रभावशाली योगदान के लिए प्रदान किया गया है।

भारत गौरव फाउंडेशन द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान देश के उन विशिष्ट व्यक्तित्वों को समर्पित है जिन्होंने अपने कार्यों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने, नागरिक जागरूकता बढ़ाने तथा राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. घाडगे का चयन उनके वर्षों से चले आ रहे समर्पित सामाजिक कार्यों, जनहित के मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए किए गए प्रयासों को ध्यान में रखते हुए किया गया।

डॉ. सागर प्रकाश घाडगे ने अपने कार्यकाल के दौरान सामाजिक न्याय, समान अवसर, श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा जनकल्याण से जुड़े अनेक विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने, जागरूकता फैलाने तथा सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य किया है। उनके नेतृत्व में संचालित विभिन्न जनहितकारी अभियानों ने अनेक लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

विशेष रूप से मानव और पशु कल्याण के क्षेत्र में उनके प्रयासों की व्यापक सराहना की गई है। समाज के कमजोर एवं जरूरतमंद वर्गों के प्रति उनकी संवेदनशीलता तथा सेवा भाव ने उन्हें एक जिम्मेदार और प्रेरणादायी सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया है। उनके कार्यों में सदैव पारदर्शिता, नैतिकता, ईमानदारी और राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा है।

इस अवसर पर जारी आधिकारिक प्रशस्ति में कहा गया है—

"सामाजिक सुधार, श्रमिक कल्याण, नैतिक सुशासन, राष्ट्र निर्माण और मानवीय सेवा के प्रति उनकी असाधारण प्रतिबद्धता तथा एक अधिक समावेशी, न्यायसंगत और प्रगतिशील समाज के निर्माण में उनके अनुकरणीय योगदान के लिए डॉ. सागर प्रकाश घाडगे को भारत भूषण सम्मान 2026 से सम्मानित किया जाता है।"

भारत भूषण सम्मान को देश के प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक माना जाता है, जिसका उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्वों को सम्मानित करना है जिनकी सेवाएं व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित न रहकर व्यापक समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। डॉ. घाडगे का यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक है, बल्कि समाजसेवा और जनकल्याण के क्षेत्र में कार्यरत हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के दौर में जब समाज को संवेदनशील, जिम्मेदार और दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता है, तब डॉ. सागर प्रकाश घाडगे जैसे व्यक्तित्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं। उनका जीवन और कार्य यह संदेश देता है कि समर्पण, सेवा, साहस और नैतिक मूल्यों के आधार पर समाज में सार्थक एवं स्थायी परिवर्तन संभव है।

देश के विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक और जनसेवी संगठनों ने डॉ. घाडगे को इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान के लिए बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और निरंतर जनसेवा की कामना की है।

डॉ. सागर प्रकाश घाडगे को "भारत भूषण सम्मान 2026" प्राप्त होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

"समाज सेवा • न्याय के प्रति प्रतिबद्धता • राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण'














उल्हासनगर के कथित बोगस सनद मामले में पत्रकार दिलीप मालवणकर ने मुख्यमंत्री और महसूल मंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने मामले में हजारों करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।


उल्हासनगर: दिनेश मीरचंदानी

उल्हासनगर शहर में कथित बोगस सनद (फर्जी प्रमाणपत्र) प्रकरण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। पत्रकार एवं अन्याय विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष दिलीप मालवणकर ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि वर्षों से चल रही कथित अनियमितताओं के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया है। उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की मांग की है।

मालवणकर का आरोप है कि उल्हासनगर महानगरपालिका का टाउन प्लानिंग विभाग लंबे समय से विवादों के घेरे में रहा है। बिना वैध अनुमति निर्मित इमारतों को नियमित करने, एफएसआई (फ्लोर स्पेस इंडेक्स) में कथित हेरफेर तथा टीडीआर (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) से जुड़े मामलों में समय-समय पर गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। उनका कहना है कि विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति और पदस्थापन को लेकर भी प्रतिस्पर्धा रहती है तथा इन पदों के लिए बड़े पैमाने पर लेनदेन होने की चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं।

पूर्व प्रशासक के कार्यकाल पर सवाल

दिलीप मालवणकर ने आरोप लगाया कि पूर्व प्रशासक जगतसिंह गिरासे के कार्यकाल के दौरान कथित रूप से सैकड़ों गैरकानूनी सनदें जारी की गईं, जिनकी विभागीय जांच अब तक पूरी नहीं हो सकी है। उनका दावा है कि इन मामलों में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने बाकी हैं और जांच लंबित रहने से अनेक प्रश्न अनुत्तरित बने हुए हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान प्रांत अधिकारी (एसडीओ) विजयानंद शर्मा के कार्यकाल में भी कथित रूप से इसी प्रकार की प्रक्रिया जारी है। मालवणकर का कहना है कि यदि पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हो सकते हैं।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी होने का आरोप

मालवणकर के अनुसार, कई मामलों में प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। उनका आरोप है कि कथित रूप से फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए गए, जिससे सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन हुआ। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ मामलों में अपील स्तर तक कथित लेनदेन की व्यवस्था होने की चर्चाएं सामने आई हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के दुरुपयोग का आरोप

दिलीप मालवणकर ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2005 से पूर्व के लंबित मामलों के निपटारे को लेकर दिए गए निर्देशों का कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से दुरुपयोग किया गया। आरोप है कि इसी प्रावधान का सहारा लेकर संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर आवेदन प्रस्तुत किए गए और बाद में प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए।

मुख्यमंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग

मालवणकर ने मुख्यमंत्री तथा राज्य के महसूल मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि पूर्व प्रशासक जगतसिंह गिरासे और वर्तमान प्रांत अधिकारी विजयानंद शर्मा के कार्यकाल में जारी सभी सनदों और प्रमाणपत्रों की विस्तृत जांच कराई जाए। उन्होंने संबंधित कार्यालयों की सीसीटीवी फुटेज की जांच, दस्तावेजों का सत्यापन, आर्थिक लेनदेन की पड़ताल तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है।

अधिकारियों की प्रतिक्रिया का इंतजार

फिलहाल इन आरोपों को लेकर संबंधित अधिकारियों या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, इस मुद्दे ने शहर की राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिकों के बीच नई बहस को जन्म दे दिया है। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मामला उल्हासनगर के सबसे बड़े कथित प्रशासनिक और राजस्व घोटालों में से एक साबित हो सकता है।